

- उत्सव की रोशनी में धुंधला होता मैदान, बोर्ड परीक्षाओं के बीच शोर—चौमुखी विकास कैसे होगा?
- विकसित कोरिया या सिकुड़ता शिक्षा हब? मैदान बना स्थायी आयोजन स्थल
- शिक्षा परिसर पर प्रशासन का कब्ज़ा—चौमुखी विकास का सपना अधूरा
- उत्सव बनाम परीक्षा: मैदान पंडालों के लिए, छात्र शोर में तैयार
- स्कूल का मैदान या प्रशासनिक मंच? शिक्षा पर सवालों की बौछार
- रोशनी, लाउडस्पीकर और परीक्षा—किसे चुनेगा प्रशासन?
- शिक्षा से ज्यादा आयोजन? कोरिया में प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल
- पढ़ाई पर पंडाल भारी—मैदान छिना, विकास की दिशा बदली?
- जब शिक्षा हब बना इवेंट ज़ोन—छात्रों का चौमुखी विकास कैसे होगा?
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर (कोरिया),20 फरवरी 2026(घटती-घटना)। तीन दिवसीय जिला उत्सव खत्म हो चुका है,मंच उतर रहे हैं,पंडाल उखड़ रहे हैं,रोशनी बुझ रही है, लेकिन जो सवाल उठे हैं, वे अभी भी पूरी ताकत से खड़े हैं,क्या प्रशासन को शिक्षा व्यवस्था सुधारने से ज्यादा उसे उपयोग में लेने की जल्दी है?और क्या विकास की गंगा सचमुच बह रही है, या शिक्षा का मैदान ही सूखता जा रहा है?यह प्रश्न इसलिए तीखा है क्योंकि बैकुंठपुर शहर का वह इलाका,जिसे वर्षों पहले शिक्षा हब के रूप में विकसित करने की दूरदृष्टि के साथ तैयार किया गया था,आज वही क्षेत्र प्रशासनिक आयोजनों का स्थायी मंच बनता जा रहा है।
दूरदृष्टि से बना शिक्षा हब—अब बहुउद्देशीय ‘इवेंट ज़ोन’?- रामानुज हायर सेकेंडरी स्कूल की स्थापना और उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय का निर्माण—यह महज भवन नहीं थे, यह एक विचार था, महाविद्यालय का नाम रामानुज प्रताप सिंह देव के नाम पर रखा गया, यह उस शैक्षणिक विरासत का प्रतीक था, जिसमें बैकुंठपुर को शिक्षा के केंद्र के रूप में देखा गया, इसी परिसर के आसपास दो बड़े शासकीय स्कूल, एक बड़ा छात्रावास और खेलकूद के लिए विस्तृत मैदान विकसित किए गए, यह मैदान केवल खेल के लिए नहीं थे—यहां स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, परेड, एनसीसी, वार्षिक समारोह और दैनिक शारीरिक गतिविधियां होती रहीं, आज तस्वीर बदली हुई दिखती है, वही मैदान, जो छात्रों के चौमुखी विकास का आधार थे, अब बड़े आयोजनों, मंचों, पंडालों और प्रशासनिक कार्यक्रमों के लिए बार-बार आरक्षित हो रहे हैं, 365 दिनों में अधिकांश समय मैदान “एंगेज” रहने की शिकायतें स्थानीय स्तर पर आम हैं।
परीक्षा से ठीक पहले उत्सव—प्राथमिकताएं किसकी?- 17 से 19 फरवरी तक चला तीन दिवसीय जिला उत्सव—और 20 फरवरी से बोर्ड परीक्षाएं। यह कैलेंडर किसी से छिपा नहीं था, फिर भी परीक्षा से ठीक पहले शिक्षा परिसर के पास बड़े मंच, लाइटिंग, भीड़ और देर रात तक गूंजते लाउडस्पीकर—क्या यह समय चयन छात्रों की तैयारी के अनुरूप था? छात्रावास में रह रहे परीक्षार्थियों के लिए अंतिम सप्ताह सबसे महत्वपूर्ण होता है, ऐसे समय में ध्वनि विस्तारकों की आवाजें, ट्रैफिक, भीड़ और देर रात तक चलने वाले कार्यक्रम एकाग्रता पर असर डालते हैं, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जिन छात्रों को परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना था, वे शोर और व्यवधान के बीच तैयारी करने को विवश रहे, प्रशासन का तर्क हो सकता है कि सांस्कृतिक आयोजन जिले की पहचान बढ़ाते हैं, पर्यटन को प्रोत्साहन देते हैं, स्थानीय कलाकारों को मंच मिलता है। यह सब महत्वपूर्ण है। पर क्या यह शिक्षा की कीमत पर होना चाहिए?
दूसरा मैदान भी गया—सिकुड़ता खुला क्षेत्र- जिले में एक अन्य बड़ा मैदान, जो खेल और शिक्षा गतिविधियों के लिए उपयोगी हो सकता था, अब पुलिस अधीक्षक कार्यालय के निर्माण में चला गया है, अर्थात, शिक्षा और खेल के लिए उपलब्ध खुले स्थान लगातार कम होते जा रहे हैं, जब शहर में वैकल्पिक आयोजन स्थल विकसित नहीं किए जाते, तब शिक्षा परिसर ही सबसे आसान विकल्प बन जाता है, लेकिन “आसान विकल्प” हमेशा “सही विकल्प” नहीं होता।
अतिक्रमण और प्रशासनिक मौन- महाविद्यालय की जमीन पर अतिक्रमण की चर्चाएं भी स्थानीय स्तर पर उठती रही हैं, यदि यह सच है, तो उसे हटाने की पहल क्यों नहीं होती? यदि मैदानों का स्थायी उपयोग प्रशासनिक कार्यक्रमों के लिए हो रहा है, तो क्या उन्हें शिक्षा प्रयोजन के लिए संरक्षित घोषित नहीं किया जाना चाहिए? मौन अक्सर अफवाहों को जन्म देता है, स्पष्ट नीति और सार्वजनिक जानकारी ही विश्वास को मजबूत करती है।
विकसित कोरिया या सिकुड़ता शिक्षा?- बाहर से देखें तो जिले में विकास के कई प्रतीक दिखते हैं—भव्य आयोजन, रोशनी, मंच, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, पर विकास का वास्तविक पैमाना यह है कि अगली पीढ़ी को किस वातावरण में तैयार किया जा रहा है, यदि खेल मैदान सीमित हो रहे हैं, छात्रावास के बच्चे शोर में पढ़ रहे हैं, और परीक्षा से पहले भी आयोजन की प्राथमिकता बनी रहती है, तो यह “विकसित कोरिया” नहीं, “सिकुड़ता शिक्षा परिसर” का संकेत है, चौमुखी विकास का अर्थ केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है; उसमें शैक्षणिक, शारीरिक और मानसिक संतुलन शामिल है, मैदान न मिले तो शारीरिक विकास बाधित, शांति न मिले तो शैक्षणिक विकास बाधित, प्राथमिकता न मिले तो मानसिक संतुलन प्रभावित।
समाधान क्या है?- यह खबर उत्सव या प्रशासन के खिलाफ नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं के संतुलन के पक्ष में है, समाधान स्पष्ट हैं, शिक्षा परिसरों को ‘नो-इवेंट ज़ोन’ घोषित किया जाए, विशेषकर परीक्षा अवधि में, शहर के लिए एक स्थायी स्टेडियम या बहुउद्देशीय आयोजन स्थल विकसित किया जाए, ताकि प्रशासनिक कार्यक्रम वहीं हों, महाविद्यालय और स्कूल की जमीन पर यदि कोई अतिक्रमण है, तो उसे हटाने की पारदर्शी कार्रवाई हो, परीक्षा कैलेंडर के अनुसार बड़े आयोजनों की तिथि तय की जाए, ध्वनि प्रदूषण नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।यदि मुख्यमंत्री के समक्ष मांगों की सूची प्रस्तुत की जाती है, तो उसमें शहर के लिए स्टेडियम या वैकल्पिक आयोजन स्थल की मांग प्रमुखता से शामिल होनी चाहिए थी, यह केवल प्रशासन की सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा की सुरक्षा का प्रश्न है।
रोशनी बनाम भविष्य- उत्सव की रोशनी कुछ दिनों में बुझ जाती है, पर छात्रों का भविष्य वर्षों तक आकार लेता है, जब शिक्षा परिसर ही प्रशासनिक सुविधा का स्थायी केंद्र बन जाए, तो “चौमुखी विकास” का नारा खोखला लगने लगता है, विकास की असली परीक्षा मंच की चकाचौंध में नहीं, बल्कि कक्षा की शांति और खेल के मैदान की उपलब्धता में होती है, अब यह तय करना प्रशासन के हाथ में है क्या शिक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी, या मैदानों को अस्थायी मंचों में बदलने की परंपरा जारी रहेगी? कोरिया का भविष्य पंडालों से नहीं, पुस्तकों और खेल के मैदानों से तय होगा।
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