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कविता @ भीत…

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एक आदमी दब गया,दीवार के नीचे
जैसे चूहे आ गए हो,विशाल मतंग के नीचे
उच्च ध्वनि की गूँज,मृत्तिका की ऊँची पुंज
कराहें निकल पड़ी
रोदन चित्कार सुनाई पड़ी
काल कलवित बेचारा,अपार दुःखों का मारा
कही नही शोर-शराबें
शोक सभाओं की गाजे-बाजे
न कही कवरेज मिला,न मीडिया में सेज मिला
इस विशाल देश में एक परिंदा मरा है
जो नही नामी चेहरा है
कीट-पतंगों की कोई बिसात नही
दरिद्रों की यहाँ कोई जात नहीं
निकाल दिया गया मलवे से
चहुँ ओर शांति पसरा
नही मरा कोई धर्म की बलवे से
न कही प्रश्न उठा,न्याय को न कोई नेता रूठा
न कही कुछ राशि मिला
बरसों से जारी है ये सिलसिला
ये शोषक-भीत हर जगह खड़ा है
जो दरिद्रो को दबाने
प्रति पालिका मुट्ठी में जकड़ा है ।
दफना दिया गया उसे खड्डे में
आज फिर दब गया एक उसी अड्डे में ।।


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