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कोरिया@ 8 साल से जमे इंजीनियर,निकाय बना ‘निजी प्रोजेक्ट’!

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  • तबादला आदेश फेल,‘तिगड़ी सिस्टम’ पास-शिवपुर चरचा का हाल बेहाल
  • इंजीनियर का राज,कंटीजेंसी का ताज—निकाय में नियम बेअसर
  • जहां आदेश हार गया, ‘सेटिंग’ जीत गई—शिवपुर चरचा पालिका की कहानी
  • गिट्टी से गवर्नेंस तक ‘सेटिंग’, 8 साल से जमे इंजीनियर पर सवाल
  • निकाय में तिगड़ी का खेल इंजीनियर,कंटीजेंसी और सीएमओ पर घमासान
  • तबादला हुआ कागज पर,इंजीनियर जमे मैदान पर!
  • शिवपुर चरचा पालिका : विकास कम,‘व्यवस्था’ ज्यादा चर्चा में
  • नियमों को धता,जुगाड़ को सत्ता—निकाय में अजीब व्यवस्था


कोरिया,29 अप्रैल 2026(घटती-घटना)।
कोरिया जिले के शिवपुर चरचा नगर पालिका में इन दिनों विकास से ज्यादा चर्चा उस ‘स्थायित्व मॉडल’ की हो रही है, जिसे देखकर प्रबंधन के बड़े-बड़े सिद्धांत भी शरमा जाएं,यहां एक इंजीनियर आठ साल से जमे हुए हैं, दो-दो तबादला आदेशों को ऐसे धता बता चुके हैं जैसे वे सुझाव मात्र हों, और विभाग अंततः ‘समझौता’ कर बैठा, उनके साथ एक कंटीजेंसी कर्मचारी हैं, जिनका पद भले छोटा हो, लेकिन प्रभाव इतना बड़ा कि हर निर्णय में उनकी मौजूदगी अनिवार्य बताई जाती है, और इस पूरी तिकड़ी के ऊपर हैं सीएमओ, जिन पर आरोप है कि वे सबकुछ जानते हुए भी ‘सब ठीक है’ की मुद्रा में हैं, व्यंग्य यह कि यहां नियम किताबों में चलते हैं और व्यवस्था ‘नेटवर्क’ पर।
तबादला आदेश बनाम जमीनी हकीकतः दो आदेश,आठ साल और वही कुर्सी
नगरीय निकायों में स्थानांतरण एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया है—कम से कम कागजों में, शिवपुर चरचा में यह प्रक्रिया एक ‘केस स्टडी’ बन चुकी है, आरोप है कि संबंधित इंजीनियर के दो-दो तबादला आदेश जारी हुए,लेकिन वे आज भी उसी कुर्सी पर विराजमान हैं, सवाल यह नहीं कि आदेश जारी क्यों हुए—सवाल यह है कि लागू क्यों नहीं हुए? क्या आदेश कमजोर थे या इच्छाशक्ति? या फिर ‘व्यवस्था’ इतनी मजबूत है कि आदेशों को भी इंतजार करना पड़ता है? व्यंग्य में कहा जाए तो यहां तबादला आदेश ‘ड्राफ्ट’ में रहते हैं और स्थायित्व ‘फाइनल’ में।
इंजीनियर का ‘एक्सटेंडेड रोल’ः तकनीक से ट्रेड तक- इंजीनियर का काम तकनीकी स्वीकृतियां देना, गुणवत्ता देखना और कार्यों की निगरानी करना होता है,लेकिन शिवपुर चरचा में आरोप है कि यह भूमिका ‘एक्सटेंडेड’ हो चुकी है अब इसमें सप्लाई मैनेजमेंट भी शामिल है,स्थानीय सूत्र बताते हैं कि ठेकेदारों को एक विशेष क्रेशर से गिट्टी लेने के लिए कहा जाता है, अगर यह सही है, तो यह केवल सलाह नहीं, बल्कि ‘अनिवार्य विकल्प’ जैसा बन जाता है, अब सवाल उठता है क्या यह तकनीकी निर्णय है या आर्थिक? और अगर सप्लाई का रास्ता तय है, तो प्रतिस्पर्धा कहां गई? व्यंग्य यह कि यहां टेंडर कम और ‘ट्रेंड’ ज्यादा चलता है जहां सामग्री का रास्ता पहले से तय रहता है।
कंटीजेंसी कर्मचारीः पद छोटा,प्रभाव बड़ा- इस पूरे मामले में सबसे रोचक किरदार है कंटीजेंसी कर्मचारी, मानदेय सीमित, पद अस्थायी, लेकिन प्रभाव स्थायी और व्यापक, बताया जाता है कि हर निर्णय में उनकी उपस्थिति रहती है, और उन्हें निकाय का ‘सबसे विश्वस्त’ माना जाता है, अब सवाल यह है कि यह विश्वास कैसे बना? क्या यह अनुभव का परिणाम है या ‘एक्सेस’ का? व्यंग्य यह कि यहां कंटीजेंसी कर्मचारी ‘कंट्रोल रूम’ बन गया है जहां से फैसलों की दिशा तय होती है।
सीएमओ की भूमिका : स्थानीय होने का ‘लाभ’ या ‘लापरवाही’?- सीएमओ इस पूरी कहानी का तीसरा और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, आरोप है कि गृह जिले में पदस्थ होने के कारण वे निश्चिंत हैं और अनियमितताओं के बावजूद सख्त रुख नहीं अपनाते,स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि ‘दिखावा ज्यादा,कार्रवाई कम’ नजर आती है,अब सवाल यह है क्या स्थानीय होना प्रशासनिक ताकत बन गया है? या फिर यह निष्पक्षता में बाधा बन रहा है? व्यंग्य यह कि यहां निगरानी ‘लोकल’ है और जवाबदेही ‘ग्लोबल’ हो गई है—कहीं भी फिट नहीं बैठती।
क्रेशर कनेक्शनः गिट्टी में ‘गणित’ और ‘गठजोड़’ की चर्चा-
क्रेशर से गिट्टी लेने के कथित दबाव ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है, कहा जा रहा है कि संबंधित क्रेशर से ‘अच्छी सेटिंग’ है, और यही कारण है कि निकाय छोड़ने की इच्छा नहीं बनती, यदि एक ही स्रोत से बार-बार सामग्री ली जाती है, तो गुणवत्ता, कीमत और पारदर्शिता—तीनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है, यहां व्यंग्य का तड़का यह है कि सड़कें भले टेढ़ी बनें, लेकिन सप्लाई का रास्ता सीधा और तय रहता है।
राजनीतिक जुगाड़ः हर मौसम में ‘फिट’ रहने की कला-
इंजीनियर को लेकर एक और दिलचस्प पहलू चर्चा में है की उनकी राजनीतिक पकड़, बताया जाता है कि उन्होंने अलग-अलग दलों के नेतृत्व में काम किया है और हर दौर में अपनी जगह बनाए रखी है, कांग्रेस हो या भाजपा दोनों तरफ ‘काम करने का अनुभव’ उनके पास है, और ‘समन्वय’ भी, स्थानीय लोग कहते हैं— ‘सरकार बदलती है, सिस्टम बदलता है, लेकिन यहां कुछ लोग नहीं बदलते।’ व्यंग्य यह कि यहां पदस्थापना चुनाव से नहीं, ‘कनेक्शन’ से तय होती है।
निर्माण कार्यों पर सवाल : गुणवत्ता बनाम ‘व्यवस्था’
नगर पालिका में चल रहे निर्माण कार्यों को लेकर भी शिकायतें सामने आई हैं, लोग कहते हैं कि काम होता तो दिखता है,लेकिन टिकता नहीं, सामग्री की गुणवत्ता, लागत और क्रियान्वयन—तीनों पर सवाल हैं,यदि सप्लाई और स्वीकृति एक ही प्रभाव में हों, तो गुणवत्ता पर असर पड़ना तय है,व्यंग्य में कहें तो—‘काम जल्दी होता है,ताकि दोबारा जल्दी हो सके। ‘
तिगड़ी का ‘मैनेजमेंट मॉडल’ः जिम्मेदारी किसकी?
इंजीनियर,कंटीजेंसी कर्मचारी और सीएमओ तीनों मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते नजर आते हैं, जिसे स्थानीय लोग ‘तिगड़ी’ कहते हैं,अब इस तिगड़ी में जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि निर्णय सामूहिक हैं,लेकिन जवाबदेही व्यक्तिगत नहीं,यहां सबसे बड़ा सवाल यही है जब सब मिलकर काम करते हैं,तो जवाब कौन देगा?
विभागीय आदेशों की स्थितिः पालन या प्रतीक्षा?
तबादला आदेशों का लागू न होना इस बात का संकेत है कि विभागीय आदेशों की प्रभावशीलता पर सवाल हैं,यदि आदेश जारी होने के बाद भी स्थिति नहीं बदलती, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं ‘पालन’ की प्रक्रिया कमजोर है, व्यंग्य यह कि यहां आदेश आते हैं, रजिस्टर में दर्ज होते हैं और फिर ‘समय के साथ समायोजित’ हो जाते हैं।
जांच की मांग : पारदर्शिता ही समाधान
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी जरूरत है—निष्पक्ष जांच, यदि आरोप सही हैं, तो कार्रवाई जरूरी है, और यदि गलत हैं,तो स्पष्टता जरूरी है, पारदर्शिता ही वह रास्ता है,जिससे व्यवस्था पर भरोसा वापस आ सकता है।
विकास होगा या ‘व्यवस्था’ ही चलेगी?
शिवपुर चरचा नगर पालिका का यह मामला केवल एक निकाय की कहानी नहीं है, बल्कि उस प्रवृत्ति का उदाहरण है जहां नियमों से ज्यादा ‘जुगाड़’ प्रभावी दिखता है,आठ साल का स्थायित्व, दो तबादला आदेशों की अनदेखी, सप्लाई पर सवाल और तिगड़ी का प्रभाव-ये सब मिलकर एक ऐसा चित्र बनाते हैं, जो चिंताजनक भी है और व्यंग्यात्मक भी, अब देखना यह है कि क्या इस मामले में वास्तविक सुधार होता है या फिर सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहेगा, क्योंकि अगर व्यवस्था नहीं बदली, तो विकास की परिभाषा भी ‘समायोजित’ होती रहेगी। और अंत में एक सवाल-यहां काम चल रहा है,या सिस्टम चलाया जा रहा है?


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