दुर्घटना के बाद परिवहन विभाग की परमिट व्यवस्था कठघरे में,समय-सारिणी की समीक्षा की मांग…
यात्री बसों में सेवा की प्रतिस्पर्धा या रफ्तार की होड़? दस मिनट के अंतराल पर परमिट का मामला गरमाया
सड़क पर बसों की रेस रोकिए! परमिट और समय-सारिणी की समीक्षा करे परिवहन विभाग
-रवि सिंह-
एमसीबी/मनेंद्रगढ़,01 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)। मनेंद्रगढ़ से केल्हारी जा रही यात्री बस के सेमरमथानी मोड़ के पास पेड़ से टकराने की घटना ने एक बार फिर यात्री परिवहन व्यवस्था और बसों के संचालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,हादसे में दो लोगों की मौत और करीब 20 यात्रियों के घायल होने की सूचना सामने आई है,इनमें चार घायलों की हालत गंभीर बताई जा रही है, हालांकि, मृतकों और घायलों की संख्या की अंतिम आधिकारिक पुष्टि संबंधित प्रशासन से होना शेष है।
इस दुर्घटना के बाद अब केवल चालक की भूमिका या सड़क की स्थिति पर ही सवाल नहीं उठ रहे, बल्कि परिवहन विभाग की परमिट आवंटन व्यवस्था भी चर्चा के केंद्र में आ गई है,सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार,कुछ मार्गों पर बसों को महज दस-दस मिनट के अंतराल पर परमिट जारी किए जाने की बात सामने आ रही है,यदि यह स्थिति सही है तो इसकी गंभीरता से समीक्षा जरूरी है,क्योंकि कम समय के अंतराल पर बसों का संचालन बस संचालकों के बीच यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है,सवाल यह है कि क्या परिवहन विभाग परमिट जारी करते समय मार्ग की भौगोलिक परिस्थितियों,सड़क की स्थिति,यात्रा में लगने वाले वास्तविक समय और पहले से संचालित बसों की समय-सारिणी का पर्याप्त आकलन कर रहा है? क्या परमिट जारी करने का उद्देश्य यात्रियों को बेहतर परिवहन सुविधा देना है या फिर बिना समुचित समय-अंतराल के बसों की संख्या बढ़ाते जाना?
दस मिनट का अंतराल,सड़कों पर बसों के बीच प्रतिस्पर्धा!
बस संचालन में समय-सारिणी का अपना महत्व है, यदि एक ही मार्ग पर एक बस के कुछ ही मिनट बाद दूसरी बस को भी संचालन की अनुमति मिलती है, तो यात्रियों को अपने वाहन में बैठाने को लेकर संचालकों और चालकों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा होने की आशंका रहती है,ऐसी स्थिति में समय पर पहुंचने और अधिक यात्रियों को बैठाने का दबाव चालक के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है,यात्रियों को अपने वाहन में बैठाने की होड़, निर्धारित समय से पहले निकलने की कोशिश, तेज गति से बस चलाना और रास्ते में दूसरी बस से आगे निकलने का प्रयास जैसी स्थितियां यात्री सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं,हालांकि, सेमरमथानी मोड़ पर हुई दुर्घटना का कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा,लेकिन परमिट और समय-सारिणी से जुड़े सवालों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती,सूत्रों का दावा है कि कुछ मार्गों पर बसों को दस मिनट के आसपास के अंतराल पर परमिट दिए गए हैं,यदि ऐसा है तो परिवहन विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन परिस्थितियों और किस आधार पर इतनी कम समय दूरी वाली समय-सारिणी निर्धारित की गई है।
पहाड़ी और घाटी वाले मार्गों पर अलग व्यवस्था की जरूरत
मनेंद्रगढ़-केल्हारी सहित क्षेत्र के कई मार्गों पर जंगल, पहाड़ी, मोड़ और घाटी जैसी भौगोलिक परिस्थितियां हैं, ऐसे रास्तों पर बस संचालन सामान्य मैदानी मार्गों की तरह नहीं किया जा सकता, सड़क की चौड़ाई,तीखे मोड़, दृश्यता, ढलान और मौसम जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बसों की गति और समय-सारिणी निर्धारित करना आवश्यक है,यदि दो बसों के बीच पर्याप्त समय का अंतर नहीं होगा तो आगे चल रही बस के पीछे दूसरी बस के पहुंचने और उसे ओवरटेक करने की प्रतिस्पर्धा की आशंका बढ़ सकती है,ऐसे मार्गों पर कुछ मिनट का अंतराल कागज पर भले ही सामान्य दिखाई दे,लेकिन वास्तविक सड़क परिस्थितियों में उसका असर अलग हो सकता है,इसलिए परिवहन विभाग को प्रत्येक मार्ग की लंबाई,यात्रा में लगने वाले औसत समय,सड़क की स्थिति और बसों की संख्या के आधार पर परमिट तथा समय-सारिणी की समीक्षा करनी चाहिए।
परमिट जारी करने में पारदर्शिता पर भी उठ रहे सवाल
परिवहन विभाग की परमिट प्रक्रिया को लेकर कुछ स्तरों पर आर्थिक लेन-देन और मनमाने तरीके से परमिट जारी किए जाने के आरोप भी चर्चा में हैं, हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और दस्तावेजी प्रमाण सामने आना अभी आना बाकि है, ऐसे में संबंधित विभाग को परमिट जारी करने की प्रक्रिया, आवेदन,स्वीकृति और समय-सारिणी का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए,यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि एक ही मार्ग पर कितनी बसों को परमिट जारी किए गए हैं,उनके संचालन का समय क्या है और परमिट देते समय यात्रियों की सुविधा तथा सुरक्षा को किस आधार पर प्राथमिकता दी गई, यदि नियमों की अनदेखी या किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
30 से 45 मिनट का अंतराल तय करने पर हो विचार
बसों के बीच समय-सारिणी में पर्याप्त अंतर रखना यात्री सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, स्थानीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि एक ही मार्ग पर संचालित बसों के परमिट और समय-सारिणी की समीक्षा कर उनके बीच कम से कम 30 से 45 मिनट का अंतराल रखने की व्यवहारिक संभावना पर विचार किया जाए, हालांकि,यह अंतराल सभी मार्गों के लिए एक जैसा तय करने के बजाय सड़क की स्थिति,मार्ग की दूरी,यात्रा के वास्तविक समय और यात्रियों की संख्या के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए, परिवहन विभाग को बस संचालकों की सुविधा से पहले यात्रियों की सुरक्षा और सुगम परिवहन को प्राथमिकता देनी होगी।
हादसे के बाद विभाग की जिम्मेदारी भी तय हो…
सेमरमथानी मोड़ पर हुई दुर्घटना की निष्पक्ष जांच के साथ यह भी जरूरी है कि संबंधित मार्ग पर संचालित सभी यात्री बसों के परमिट,फिटनेस, बीमा,चालक का लाइसेंस,समय-सारिणी और तकनीकी स्थिति की जांच की जाए,बसों की गति पर निगरानी,ओवरलोडिंग की रोकथाम और चालकों द्वारा यातायात नियमों के पालन को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए,सबसे अहम बात यह है कि परिवहन विभाग केवल दुर्घटना के बाद जांच और कार्रवाई तक सीमित न रहे,बल्कि ऐसी परिस्थितियों की पहचान करे जिनसे दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है,परमिट जारी करने की प्रक्रिया में यदि समय-अंतराल और मार्ग की वास्तविक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है तो उसमें सुधार किया जाना चाहिए, आखिर बसों को परमिट देने का उद्देश्य यात्रियों को सुरक्षित और सुविधाजनक परिवहन उपलब्ध कराना है,न कि सड़कों पर बस संचालकों के बीच ऐसी प्रतिस्पर्धा पैदा करना जिसमें समय और यात्रियों की होड़ के बीच सुरक्षा पीछे छूट जाए, सेमरमथानी हादसे ने इस व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत को फिर सामने ला दिया है,अब देखना होगा कि परिवहन विभाग इन सवालों पर गंभीरता से विचार करता है या फिर यह मामला भी दुर्घटना के बाद होने वाली औपचारिक कार्रवाई तक ही सीमित रह जाता है।
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