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भैयाथान/सूरजपुर@घटती-घटना की खबर से हिला सहकारिता महकमा! मृत किसान के केसीसी ऋण मामले में जितवेश को नोटिस…अब बाकी जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब?

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  • आखिर खुली सहकारिता विभाग की नींद! घटती-घटना की खबर पर बैंक ने जितवेश श्रीवास्तव को थमाया नोटिस
  • अब सवाल—क्या केवल एक कर्मचारी को नोटिस देकर होगी खानापूर्ति या ऋण स्वीकृति से लेकर रकम निकासी और कथित फर्जी हस्ताक्षर तक पूरे मामले की होगी निष्पक्ष जांच?
  • मृत किसान के केसीसी ऋण का मामला गरमायाः खबर के बाद बैंक हरकत में, जितवेश श्रीवास्तव से दो दिन में जवाब तलब
  • खबरों का असर : मृत किसान के नाम पर ऋण मामले में बैंक की कार्रवाई, अब स्पष्टीकरण के घेरे में जितवेश श्रीवास्तव
  • क्या एक नोटिस से दब जाएगा मृत किसान के KCC ऋण का रहस्य? पूरे मामले की जांच और अन्य जिम्मेदारों पर कार्रवाई का इंतजार…
  • मृत किसान के नाम पर फण,खाते से निकासी और हस्ताक्षरों पर सवाल! खबर के बाद बैंक ने जारी किया कारण बताओ नोटिस…
  • सहकारिता में कथित घोटाले पर आखिर जागा बैंक! जितवेश को नोटिस,अब बाकी जिम्मेदारों की बारी कब?
  • पहले शिकायतों पर खामोशी,अब खबर छपते ही नोटिस! क्या सहकारिता विभाग करेगा पूरे खेल का पर्दाफाश?
  • ओंकार पाण्डेय-
    भैयाथान/सूरजपुर,01 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)।
    मृत किसान के नाम पर केसीसी ऋण स्वीकृत होने, खाते से लाखों रुपये के आहरण,शिकायत के बाद रकम जमा होने और फिर शिकायत वापसी के लिए कथित फर्जी हस्ताक्षर किए जाने जैसे गंभीर आरोपों से घिरे सोनपुर सहकारी समिति के मामले में आखिरकार लंबे इंतजार के बाद सहकारिता विभाग और बैंक प्रबंधन की नींद खुलती दिखाई दे रही है,लगातार खबरों के प्रकाशन और सवाल उठाए जाने के बाद जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित, अंबिकापुर की शाखा भैयाथान ने तत्कालीन समिति प्रबंधकीय कार्यकाल से जुड़े जितवेश श्रीवास्तव,सामान्य सहायक,आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर को ऋण वितरण के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया है,खास बात यह है कि बैंक ने अपने नोटिस में 26 अक्टूबर 2026 को दैनिक घटती-घटना में प्रकाशित समाचार का स्पष्ट उल्लेख करते हुए उस पर संज्ञान लिया है।
    बैंक द्वारा 27 अक्टूबर 2026 को जारी नोटिस में संबंधित कर्मचारी से ऋण वितरण में कथित अनियमितता के संबंध में स्पष्ट कारण और प्रमाण सहित दो दिनों के भीतर शाखा कार्यालय में स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने को कहा गया है,नोटिस की प्रतिलिपि उपायुक्त एवं उप पंजीयक, सहकारी संस्थाएं,जिला सूरजपुर को भी भेजी गई है,यानी समाचार प्रकाशन के अगले ही दिन बैंक की ओर से जवाब तलब करने की कार्रवाई सामने आई है,यह कार्रवाई इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल एक शिकायतकर्ता की आवाज या समाचार-पत्र में उठाए गए सवालों तक सीमित नहीं रह गया है,बैंक ने प्रकाशित खबर का संज्ञान लेकर संबंधित कर्मचारी से जवाब मांगना जरूरी समझा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या दो दिनों में मांगा गया स्पष्टीकरण ही इस गंभीर प्रकरण का अंत होगा,या इसके बाद उन तमाम लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी, जिनके कार्यकाल, हस्ताक्षर, अनुमोदन और बैंकिंग प्रक्रिया से यह पूरा मामला जुड़ा हुआ है?
    खबरें प्रकाशित होती रहीं,कार्रवाई का इंतजार लंबा होता गया…
    सोनपुर सहकारी समिति का यह मामला कोई सामान्य ऋण विवाद नहीं है,शिकायतकर्ता देवी प्रसाद का आरोप है कि उनके पिता हरिप्रसाद की मृत्यु 10 मई 2021 को हो चुकी थी, इसके बावजूद उनके नाम पर 1 जून 2021 को 75 हजार रुपये और 11 जून 2021 को 54 हजार रुपये का केसीसी ऋ ण स्वीकृत किया गया,कुल 1 लाख 29 हजार रुपये के ऋ ण वितरण पर सवाल उठाए गए हैं, शिकायतकर्ता ने मृत्यु के बाद बैंक खाते से रकम निकाले जाने का भी विवरण दिया है,उनके अनुसार 25 मई 2021 को 17 हजार रुपये,3 जून को 49 हजार रुपये, 4 जून को 26 हजार रुपये,17 जून को 49 हजार रुपये, 21 जून को 5 हजार रुपये और 23 अगस्त 2021 को 18 हजार 500 रुपये खाते से निकाले गए,यदि शिकायत में दिए गए ये विवरण बैंक रिकॉर्ड से प्रमाणित होते हैं,तो यह केवल ऋ ण स्वीकृति का मामला नहीं रहेगा,बल्कि मृत खाताधारक के खाते से हुए लेन-देन की पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक होगी,वर्ष 2024 में शिकायतकर्ता को 1 लाख 72 हजार 860 रुपये बकाया होने का नोटिस मिला, इसके बाद उन्होंने 22 जुलाई 2024 को जनदर्शन में शिकायत की,शिकायतकर्ता का आरोप है कि शिकायत के बाद 26 जुलाई 2024 को 1 लाख 29 हजार रुपये जमा कराए गए, इसके बाद भी अक्टूबर 2026 में समिति की ओर से 64 हजार 512 रुपये बकाया होने का नोटिस जारी किया गया, शिकायतकर्ता ने दोबारा आपत्ति जताई और अक्टूबर 2026 में शिकायत की,उनका आरोप है कि 17 अक्टूबर 2026 को 69 हजार 175 रुपये उनके नाम से जमा दर्शाए गए,जबकि उन्होंने इस जमा प्रक्रिया के लिए अपनी सहमति या जानकारी दिए जाने से इनकार किया है, इतना ही नहीं, 21 अक्टूबर 2026 को शिकायत वापस लेने संबंधी पत्र उच्च कार्यालय को भेजे जाने और उस पर उनके कथित फर्जी हस्ताक्षर होने का आरोप भी लगाया गया है,शिकायतकर्ता ने जमा पर्ची,शिकायत वापसी पत्र और पूर्व में किए गए हस्ताक्षरों में अंतर होने का दावा किया है,इन आरोपों की पुष्टि या खंडन केवल दस्तावेजों के मिलान, मूल रिकॉर्ड की जांच और आवश्यकता पड़ने पर हस्तलेखन विशेषज्ञ की राय से ही हो सकता है।
    क्या एक कर्मचारी को नोटिस देकर पूरे मामले पर पर्दा डाल दिया जाएगा?
    बैंक ने जितवेश श्रीवास्तव को नोटिस जारी कर दिया है, लेकिन इस प्रकरण में कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब केवल एक कर्मचारी के स्पष्टीकरण से मिलना पर्याप्त नहीं होगा। यदि मृत किसान के नाम पर केसीसी ऋ ण स्वीकृत हुआ,तो ऋ ण प्रस्ताव किसने तैयार किया? किसने उसका सत्यापन किया? किस अधिकारी या कर्मचारी ने ऋ ण स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी की? खाते से रकम निकालने के लिए कौन-कौन से दस्तावेज लगाए गए? निकासी के समय खाताधारक की मृत्यु की जानकारी संबंधित संस्था या बैंक को थी या नहीं? और यदि जानकारी थी तो लेन-देन कैसे हुआ? इसी तरह शिकायत के बाद 1 लाख 29 हजार रुपये जमा कराने और फिर 69 हजार 175 रुपये जमा होने के पीछे क्या परिस्थितियां थीं? इन जमा राशियों का स्रोत क्या था? किसने जमा किया? जमा पर्चियों पर किसके हस्ताक्षर हैं? शिकायतकर्ता की कथित सहमति के बिना शिकायत वापसी का पत्र कैसे तैयार हुआ और किस आधार पर उसे उच्च कार्यालय भेजा गया? ये सवाल केवल जितवेश श्रीवास्तव तक सीमित नहीं हैं। ऋ ण स्वीकृति,सत्यापन,भुगतान,खाते से आहरण और बाद में रकम जमा कराने की पूरी प्रक्रिया में जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका रही, उनकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए,यदि जांच केवल एक व्यक्ति से स्पष्टीकरण मांगकर समाप्त कर दी जाती है,तो वास्तविक जिम्मेदारी तय करने का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
    शिकायत के बाद भी वैधानिक कार्रवाई क्यों नहीं?
    शिकायतकर्ता का कहना है कि 14 अक्टूबर 2026 की शिकायत के बाद आज तक मामले में कोई ठोस वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई,उनका आरोप है कि संबंधित खाते में बकाया राशि जमा कराकर पूरे मामले को दबाने का प्रयास किया गया,यह आरोप भी जांच का विषय है, आखिर शिकायत सामने आने के बाद प्राथमिकता तथ्यों की जांच और जिम्मेदारी तय करने की होनी चाहिए थी
    या बकाया रकम जमा कराकर विवाद को समाप्त मान लेने की? किसी भी वित्तीय अनियमितता की जांच का उद्देश्य केवल खाते में बकाया राशि की पूर्ति कराना नहीं होता, यदि मृत व्यक्ति के नाम पर ऋण स्वीकृत करने, खाते से अनधिकृत आहरण करने या किसी दस्तावेज पर कथित फर्जी हस्ताक्षर करने की बात सामने आती है, तो रकम जमा हो जाने मात्र से उन सवालों का जवाब नहीं मिल जाता,यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कथित अनियमितता किसने की, किसके निर्देश पर हुई और संबंधित प्रक्रिया में किस स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत रही,शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए दबाव और प्रताड़ना के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, उनका दावा है कि उन्हें इतना परेशान किया गया कि घर छोड़कर जाना पड़ा,यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं,तो यह वित्तीय अनियमितता के साथ शिकायतकर्ता को दबाव में लेने का भी गंभीर मामला होगा।
    कई खबरों के प्रकाशन के बाद हरकत में आया जिला सहकारी केंद्रीय बैंक,26 अक्टूबर की खबर का लिया संज्ञान
    सहकारिता में भ्रष्टाचार का सच कब आएगा सामने?

    सहकारी संस्थाओं का उद्देश्य किसानों को राहत देना,कृषि ऋ ण उपलब्ध कराना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है,लेकिन जब इन्हीं संस्थाओं में मृत किसान के नाम पर ऋ ण स्वीकृति,खाते से रकम निकासी और शिकायत वापसी के लिए कथित फर्जी हस्ताक्षर जैसे आरोप सामने आते हैं,तो पूरे सहकारिता तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है,क्या सहकारिता विभाग में किसी भी गंभीर शिकायत पर कार्रवाई के लिए पहले लगातार समाचार प्रकाशित होना जरूरी है? क्या शिकायतकर्ता को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने और अपनी बात साबित करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा? क्या प्रभाव और पहुंच के दम पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लंबे समय तक दबाया जा सकता है? और क्या शिकायत के बाद रकम जमा करा देना ही ऐसे मामलों में जवाबदेही से बचने का रास्ता बन जाएगा? ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सहकारिता संस्थाओं का कामकाज किसानों के विश्वास पर टिका होता है, यदि किसी किसान की मृत्यु के बाद उसके नाम पर ऋ ण स्वीकृत होने के आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो इसका संदेश केवल एक समिति तक सीमित नहीं रहेगा।
    अब असली परीक्षा बैंक और सहकारिता विभाग की
    दैनिक घटती-घटना में लगातार खबरें प्रकाशित होने के बाद बैंक द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस निश्चित रूप से इस प्रकरण का महत्वपूर्ण घटनाक्रम है,लेकिन इसे अंतिम कार्रवाई मान लेना जल्दबाजी होगी,नोटिस जारी होना आरोपों की पुष्टि नहीं है और न ही इससे किसी की दोषसिद्धि होती है,अब यह देखना होगा कि संबंधित कर्मचारी अपने स्पष्टीकरण में क्या तथ्य और दस्तावेज प्रस्तुत करते हैं तथा बैंक उन दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से जांच करता है या नहीं, साथ ही जिला सहकारी केंद्रीय बैंक और सहकारिता विभाग को यह भी स्पष्ट करना होगा कि क्या ऋ ण स्वीकृति और खाते से आहरण की पूरी प्रक्रिया की जांच होगी? क्या संबंधित समय के बैंक स्टेटमेंट,ऋ ण आवेदन,स्वीकृति पत्र,भुगतान वाउचर और जमा पर्चियों का मूल रिकॉर्ड सुरक्षित कर जांचा जाएगा? क्या शिकायत वापसी पत्र पर किए गए हस्ताक्षरों का परीक्षण कराया जाएगा? क्या ऋ ण वितरण और बाद के लेन-देन में शामिल अन्य अधिकारियों-कर्मचारियों से भी जवाब मांगा जाएगा? और क्या शिकायतकर्ता के आरोपों पर समयबद्ध वैधानिक कार्रवाई की जाएगी? लंबे इंतजार के बाद विभाग ने नोटिस जारी कर अपनी सक्रियता तो दिखाई है,लेकिन अब केवल कागजी कार्रवाई से काम नहीं चलेगा,इस प्रकरण में जरूरत है निष्पक्ष जांच,दस्तावेजों के सत्यापन और जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई की,कहीं ऐसा न हो कि पहले स्पष्टीकरण, फिर औपचारिक जांच और अंत में फ ाइल बंद—यही पूरी कार्रवाई बनकर रह जाए,अब देखना यह है कि सहकारिता विभाग मृत किसान के नाम पर हुए कथित ऋण वितरण और बैंक खाते से आहरण के रहस्य को उजागर करता है,या फिर एक नोटिस जारी कर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है,किसानों के विश्वास और सहकारिता व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए इस मामले का सच सामने आना जरूरी है।

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