नई दिल्ली,17 अक्टूबर 2026। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने शनिवार को लॉ स्टूडेंट से कहा कि आप किसी के साथ असहमत हो सकते हैं लेकिन उसकी गरिमा बनाए रखें। कोई भी फैसला देने से पहले सामने वाले को भी सुनें। चीफ जस्टिस नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी बेंगलुरु के 34वें एनुअल दीक्षांत समारोह में शामिल हुए थे। चीफ जस्टिस ने कहा कि कानूनी शिक्षा सिर्फ एकेडमिक नॉलेज तक सीमित नहीं होनी चाहिए। छात्रों को अलग-अलग विचारों को समझना जरूरी है। इससे पहले यूनिवर्सिटी के 700 से ज्यादा मौजूदा और पूर्व छात्रों ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई थी। इसके चलते 27 अगस्त को यूनिवर्सिटी ने 12 सितंबर को होना वाला दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया था। हालांकि, पिछले महीने यूनिवर्सिटी ने दीक्षांत समारोह रद्द करने का अपना फैसला वापस ले लिया।
न्याय के लिए खड़े होने का साहस जरूरी : कानूनी शिक्षा का उद्देश्य केवल आपराधिक या संवैधानिक कानून के सिद्धांतों को सीखना नहीं है। इसका मकसद ऐसे लोगों से संवाद करने का अनुभव हासिल करना भी है,जो दुनिया को हमसे अलग नजरिए से देखते हैं। कानून और न्यायिक फैसलों का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है। न्याय के लिए खड़े होने का साहस और अनसुनी आवाजों की चिंताओं को सुनने की विनम्रता भी जरूरी है।
समाज में योगदान देने की भी जरूरत है : छात्रों को अपने सिद्धांतों से समझौता करने और प्रोफेशनल लाइफ में शॉर्टकट से बचना चाहिए। कानूनी पेशे के जरिए अन्याय को दूर करने,व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने और संविधान को बनाए रखने से वकीलों को संतुष्टि मिल सकती है। राष्ट्र हमसे सिर्फ कानून के पेशेवर के तौर पर नहीं,बल्कि समाज में योगदान देने की भी उम्मीद करता है।
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