नई दिल्ली,01 अक्टूबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 2008 के अहमदाबाद बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के एक सदस्य की मौत की सजा पर फिलहाल रोक लगाने का आदेश दिया है। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी। जस्टिस विक्रम नाथ,जस्टिस एजी मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अहमद बावा उर्फ अब्बू अबुबकर बरलेवी की याचिका पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया है। बावा ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है,जिसमें निचली अदालत द्वारा उसे सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा गया था। शीर्ष अदालत ने मामले में निचली अदालत का रिकॉर्ड भी तलब किया है।
38 दोषियों की मौत की
सजा बरकरार रखी थी हाईकोर्ट ने
7 जुलाई को गुजरात हाईकोर्ट ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा था। अदालत ने बड़ी संख्या में लोगों की मौत, हमले की साजिश रचने और आतंक फैलाने का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने 11 अन्य दोषियों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा भी बरकरार रखी थी। अदालत ने कहा था कि गुजरात और केरल में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में उनकी भूमिका और साजिश के लिए रसद संबंधी सहायता मुहैया कराने की बात अभियोजन पक्ष ने साबित की है।
जुलाई 2008 में हुए धमाकों में गई थी 56 लोगों की जान : 26 जुलाई, 2008 को अहमदाबाद के अलग-अलग इलाकों में करीब 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। धमाके उन अस्पतालों में भी हुए थे जहां घायलों को इलाज के लिए ले जाया जा रहा था। यह भारत में किसी आतंकवादी हमले के दौरान चिकित्सा केंद्रों को निशाना बनाए जाने की पहली ऐसी घटनाओं में से एक थी। हाईकोर्ट ने दोषियों की सभी अपीलें खारिज करते हुए विशेष अदालत के फरवरी 2022 के फैसले को बरकरार रखा था। विशेष अदालत ने इंडियन मुजाहिदीन के 38 सदस्यों को मौत की सजा और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
राज्य सरकार ने भी दोषियों के लिए मौत की सजा की मांग की थी। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि कुछ दोषियों का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है और किसी ने पश्चाताप नहीं दिखाया। जेल में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने का भी अदालत ने उल्लेख किया था। अदालत ने कहा था कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिसके आधार पर सजा में नरमी बरती जा सके। हाईकोर्ट ने दोषियों पर लगाए गए जुर्माने को भी बरकरार रखा। अदालत ने कहा था कि अपराध की गंभीरता, सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान और बड़े पैमाने पर हुई मौतों तथा लोगों के घायल होने को देखते हुए ये जुर्माने उचित हैं।
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