



- खबर छापो, शिकायत करो…हम देख लेंगे! शिवप्रसादनगर में कथित ‘कॉन्फिडेंस’ ने सहकारिता पर ही सवाल खड़े कर दिए
- धान किसानों का…पैसा समिति का और कॉन्फिडेंस इतना…‘कार्रवाई नहीं होगी!’ आखिर भरोसा किस पर?
- शिवप्रसादनगर में ‘कॉन्फिडेंस’ हाई, कार्रवाई जीरो! आखिर किसके भरोसे चल रहा खेल?
- खबर छापो, शिकायत करो… कुछ नहीं होगा!—शिवप्रसादनगर में कथित बेखौफ दावों से मचा सवालों का बाजार
- धान खरीदी केंद्र में इतना आत्मविश्वास क्यों? कार्रवाई नहीं होगी के कथित दावे ने खड़े किए गंभीर सवाल
- शिकायत से बेफिक्र, कार्रवाई से बेखौफ! शिवप्रसादनगर में कथित ‘पहुंच’ का राज क्या है?
- ऊपर तक पैसा पहुंचता है…कथित चर्चाओं ने खोली सहकारिता की ‘पहुंच’ वाली कहानी!
- शिवप्रसादनगर में हिसाब मांगो तो जवाब…‘कुछ नहीं होगा ‘! आखिर किसका संरक्षण?
- करोड़ों के खर्च पर सवाल,आमसभा का पता नहीं और कार्रवाई का डर भी नहीं! शिवप्रसादनगर में क्या चल रहा है?
- आमसभा हुई या कागजों में पूरी? हमाली भुगतान से समिति खाते तक शिवप्रसादनगर में नए सवाल
- पहले खर्च,फिर हिसाब? शिवप्रसादनगर समिति में भुगतान और कार्यवाही की पारदर्शिता पर सवाल
- प्रभारी कहते हैं ‘बहाली हो गई’, अधिकारी कहते हैं ‘नहीं हुई’—शिवप्रसादनगर में सच किस फाइल में?
- सहकारिता में ‘जीरो टॉलरेंस’ या ‘जीरो एक्शन’? शिवप्रसादनगर के कथित आत्मविश्वास ने उठाए सवाल
- जितनी शिकायत करनी है करो…क्या शिवप्रसादनगर में कार्रवाई से पहले ही तय हो जाता है नतीजा?
- अब वार्षिक आमसभा,हमाली भुगतान,किसानों के हस्ताक्षर और बहाली के परस्पर विरोधी दावों ने खोला नया मोर्चा
- यदि सचमुच कहा गया कि ‘पैसा वहां तक पहुंचता है जहां कार्रवाई की बागडोर है’,तो यह केवल समिति पर आरोप नहीं बल्कि पूरी जांच व्यवस्था को चुनौती
- दावा सही है या महज डींग…निष्पक्ष जांच से ही खुलेगा राज…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/शिवप्रसादनगर,01 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता की दुनिया में शायद आत्मविश्वास की भी अपनी अलग किस्म होती है, सामान्य व्यक्ति के खिलाफ शिकायत हो जाए तो वह दस्तावेज तलाशता है, नोटिस आने की चिंता करता है और यह सोचता है कि जांच में क्या जवाब देगा? लेकिन शिवप्रसादनगर से विभागीय सूत्रों के हवाले से जो कथित बातचीत सामने आ रही है,उसे सही मानें तो यहां चिंता का विषय जांच नहीं,बल्कि यह भरोसा है कि ‘जांच हो भी गई तो क्या होगा? सूत्रों का दावा है कि धान खरीदी केंद्र से जुड़े जिम्मेदार लोगों की कथित बातचीत में बड़े आत्मविश्वास से यह कहा जाता है कि खबर जितनी छापनी है छापो,शिकायत जितनी करनी है करो, कुछ नहीं होगा और कोई कार्रवाई नहीं होगी, इतना ही नहीं, कथित बातचीत में यह तक कहे जाने का दावा है कि पैसा वहां तक पहुंच जाता है, जहां कार्रवाई की बागडोर होती है, यह कथन प्रमाणित तथ्य नहीं बल्कि सूत्रों के हवाले से सामने आया दावा है और इसकी स्वतंत्र जांच जरूरी है, लेकिन यदि किसी जिम्मेदार व्यक्ति ने वास्तव में ऐसी बात कही है तो सवाल गंभीर है की आखिर कार्रवाई नहीं होने का यह ‘गारंटी कार्ड’ सोहराब को किसने दिया? अगर कोई संरक्षण नहीं है तो इतना आत्मविश्वास क्यों? और अगर संरक्षण है तो किस स्तर का?
‘धान खरीदी केंद्र’ है या कार्रवाई से प्रतिरक्षा का प्रशिक्षण केंद्र?- धान खरीदी में जिम्मेदारी मिलने का मतलब किसानों की उपज और शासन की राशि से जुड़े काम को संभालना है, यहां प्रत्येक क्विंटल और प्रत्येक भुगतान का हिसाब होना चाहिए, लेकिन शिवप्रसादनगर को लेकर सामने आ रहे आरोपों को देखें तो चर्चा हिसाब से ज्यादा उस कथित आत्मविश्वास की है, जिसमें मानो कार्रवाई पहले ही निष्प्रभावी घोषित कर दी गई हो, व्यंग्य में कहें तो यहां शायद नया प्रशासनिक सिद्धांत तैयार हो गया है—पहले खर्च करो, फिर सवाल उठें तो कहो खबर छपने दो, शिकायत होने दो और अंत में आत्मविश्वास से घोषणा कर दो कि कार्रवाई नहीं होगी! लेकिन शासन इसी सिद्धांत पर नहीं चलता, रिकॉर्ड और कानून यह नहीं देखते कि कौन कितने आत्मविश्वास से बैठा है, यदि सक्षम स्तर पर निष्पक्ष जांच हो तो बैंक स्टेटमेंट, कैशबुक,भुगतान वाउचर,मजदूरी रजिस्टर, प्रस्ताव-ठहराव, कार्यवाही पंजी और प्राप्तकर्ता का खाता अपने आप बोलने लगते हैं।
महफिल में ‘ऊपर तक पैसा’ पहुंचाने की कथित चर्चा—फिर तो जांच नीचे से नहीं,ऊपर तक होनी चाहिए-विभागीय सूत्रों के अनुसार कथित बातचीत केवल ‘कार्रवाई नहीं होगी’ तक सीमित नहीं है, दावा है कि किस अधिकारी को कितना दिया, कहां कितना खर्च हुआ और किस स्तर तक पैसा पहुंचा—इस तरह की बातें भी चर्चाओं में कही जाती हैं,इन दावों को बिना प्रमाण किसी अधिकारी के खिलाफ तथ्य की तरह प्रकाशित करना उचित नहीं होगा, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं है,यदि ऐसी चर्चा में कहा जा रहा है तो शिकायत की जाँच किस स्तर पर और किस अधिकारी के टेबल है,जिसे ये पता चल सके की कार्यवाही का रुकावट का स्तर कौन है जो सोहराब जाँच व कार्यवाही न होने का भरोसा दिलाता है?
‘जीरो टॉलरेंस’ बोर्ड पर लिखा है या फाइल में भी लागू होता है?-भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का अर्थ केवल भाषण में कठोर शब्द होना नहीं है, उसकी वास्तविक परीक्षा तब होती है जब किसी छोटे कस्बे या गांव की सहकारी समिति के खाते पर सवाल उठता है, शिवप्रसादनगर में लगातार वित्तीय और प्रशासनिक सवाल सामने आने के बावजूद यदि कोई व्यक्ति वास्तव में महफिल में यह कहने की स्थिति में है कि ‘कुछ नहीं होगा ‘,तो सरकार और सहकारिता विभाग के लिए चिंता आरोप से ज्यादा इस मानसिकता की होनी चाहिए,या तो वह व्यक्ति केवल हवा में डींग मार रहा है, या उसे किसी संरक्षण का भ्रम है,या फिर उसके दावे के पीछे वास्तव में कुछ ऐसा है जिसकी जांच जरूरी है, तीनों स्थितियों में विभाग की चुप्पी उचित उत्तर नहीं हो सकती।
वार्षिक आमसभा कहीं ‘धान खरीदी के समय एडवांस हस्ताक्षर योजना’ तो नहीं?-शिवप्रसादनगर से सामने आया दूसरा आरोप और भी दिलचस्प है, बताया जा रहा है कि समिति की अनिवार्य वार्षिक आमसभा विधिवत आयोजित किए जाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है,आरोप यहां तक है कि धान खरीदी के समय किसानों से रजिस्टर में हस्ताक्षर पहले ही करा लिए जाते हैं और बाद में उनका उपयोग बैठक की कार्यवाही दिखाने के लिए किया जाता है,यदि आरोप गलत है तो समिति के पास उसे गलत साबित करने का सबसे आसान रास्ता है, बताइए—वार्षिक आमसभा कब हुई? बैठक की सूचना कब निकली? कितने दिन पहले सदस्यों को सूचना दी गई? सूचना की तामिली का रिकॉर्ड कहां है? कितने किसान सदस्य पहुंचे? बैठक कितने बजे शुरू हुई और कितने बजे समाप्त हुई? कार्यवाही किसने लिखी? किस प्रस्ताव पर कितने सदस्यों ने सहमति दी? और उपस्थिति पंजी में दर्ज हस्ताक्षर उसी दिन हुए थे या पहले? यदि रिकॉर्ड व्यवस्थित है तो दस मिनट में सवाल समाप्त हो जाएगा। यदि रिकॉर्ड ही सवाल पैदा करे तो कहानी दूसरी होगी।
किसान धान लेकर आया,हमाली भी दी—फिर समिति ने किस हमाल को भुगतान किया?- हमाली राशि का सवाल शिवप्रसादनगर के मामले को सीधे किसानों की जेब तक ले जाता है,आरोप है कि व्यवहार में किसान धान लेकर आने पर चढ़ाई-उतराई अथवा अन्य मजदूरी का भुगतान स्वयं करता है, जबकि समिति के स्तर से भी हमाली-मजदूरी मद में भुगतान दर्शाए जाने के सवाल उठ रहे हैं, यदि ऐसा हुआ तो हिसाब बेहद सरल है,जिस तारीख को किसान ने धान बेचा, उस तारीख के मजदूर कौन थे? किसान ने किसे भुगतान किया? समिति ने किसे भुगतान किया? भुगतान नकद हुआ या खाते में? मजदूर की उपस्थिति कहां दर्ज है? क्या उसी काम के लिए दो स्रोतों से भुगतान हुआ? यदि किसानों ने भुगतान किया और समिति ने भी उसी काम के लिए भुगतान किया, तो यह जांच का विषय होगा। यदि दोनों भुगतान अलग-अलग कार्यों के लिए थे तो समिति रिकॉर्ड दिखाकर भ्रम दूर कर सकती है, हिसाब साफ है तो विवाद भी साफ हो जाएगा।
‘कुछ नहीं होगा’ का कॉन्फिडेंस कहीं पुरानी कार्रवाई के अनुभव से तो नहीं आया?- किसी व्यक्ति को कार्रवाई नहीं होने का इतना भरोसा अचानक नहीं आता,इसलिए यह भी जांच का विषय है कि पूर्व की शिकायतों पर क्या हुआ,कितनी शिकायतें हुईं? किस अधिकारी को भेजी गईं? किस शिकायत पर जांच अधिकारी नियुक्त हुआ? किसने रिकॉर्ड मांगा? क्या जांच पूरी हुई? यदि हुई तो रिपोर्ट क्या थी? यदि नहीं हुई तो फाइल कहां अटकी? यदि शिकायत गलत थी तो शिकायतकर्ता को बताया गया? और यदि प्रथम दृष्टया तथ्य मिले तो कार्रवाई कहां तक पहुंची? क्योंकि यदि शिकायतें फाइलों में लगातार सोती रहें तो व्यवस्था स्वयं लोगों को यह संदेश देती है कि कुछ नहीं होगा, फिर किसी महफिल में कोई वही बात ऊंची आवाज में बोल दे तो आश्चर्य कैसा?
शिवप्रसादनगर मॉडलः पहले हस्ताक्षर, बाद में बैठक?- आरोपों के मुताबिक यदि किसानों के हस्ताक्षर धान खरीदी के दौरान पहले ही लिए जाते हैं और बाद में वार्षिक आमसभा की कार्यवाही के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, तो यह पूरे प्रकरण का अत्यंत संवेदनशील हिस्सा है,इसकी जांच कठिन भी नहीं है,बैठक की तारीख और हस्ताक्षर करने वाले किसानों के बयान मिलाइए, दस-पंद्रह किसानों से पूछिए कि बैठक में गए थे या नहीं, उनसे पूछिए कि किस विषय पर चर्चा हुई, वित्तीय विवरण पढ़कर सुनाया गया था या नहीं,समिति के खर्च की जानकारी मिली थी या नहीं,यदि सभी बताते हैं कि वे बैठक में उपस्थित थे,प्रक्रिया स्पष्ट थी और प्रस्तावों पर चर्चा हुई, तो आरोप कमजोर पड़ जाएगा, यदि किसान कहें कि हमसे तो धान बेचते समय हस्ताक्षर लिए गए थे,तब मामला अलग दिशा लेगा।
इतना बड़ा ‘कॉन्फिडेंस लेवल’ है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में भी उतना ही कॉन्फिडेंस दिखाइए-इस पूरे मामले का समाधान किसी तीखी बयानबाजी में नहीं है, जिन्हें विश्वास है कि सब कुछ सही हुआ, वे रिकॉर्ड सामने रखें,वार्षिक आमसभा की सूचना,उपस्थिति पंजी,कार्यवाही पंजी, कैशबुक, बचत खाते का स्टेटमेंट,हमाली भुगतान सूची,वेतन भुगतान,वाउचर,प्रस्ताव-ठहराव,धान खरीदी प्रभारी की नियुक्ति अथवा बहाली का आदेश,और जिन खर्चों पर सवाल उठ रहे हैं उनके बिल, इसके बाद पता चल जाएगा कि कॉन्फिडेंस रिकॉर्ड का है या संरक्षण का।
अधिकारियों को पैसा देने का दावा करने वाले से पहले प्रमाण मांगिए, अधिकारियों को भी जवाब देना होगा- इस मामले में एक संतुलित जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ‘ऊपर तक पैसा पहुंचा दिया’ जैसे कथन केवल कथित भुगतानकर्ता पर सवाल नहीं उठाते,वे अधिकारियों की प्रतिष्ठा पर भी सीधा हमला करते हैं, इसलिए किसी अधिकारी को बिना प्रमाण ‘बिका हुआ’ कहना उचित नहीं होगा,लेकिन यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में अधिकारी को रिश्वत देने का दावा किया है तो संबंधित अधिकारी के हित में भी उस दावे की जांच होनी चाहिए,क्योंकि या तो रिश्वत देने वाला सच बोल रहा है—तो कार्रवाई बेहद गंभीर होनी चाहिए, या वह झूठ बोलकर अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल अपनी धाक जमाने के लिए कर रहा है—तो यह भी गंभीर मामला है, दोनों परिस्थितियों में चुप्पी सबसे खराब विकल्प है।
अगली धान खरीदी सिर पर—फिर वही जिम्मेदारी मिली तो पुराने सवालों का क्या होगा?- नई धान खरीदी का समय करीब आने के साथ शिवप्रसादनगर का मामला और महत्वपूर्ण हो जाता है, यदि पिछले सत्र के भुगतान,स्टॉक,हमाली,समिति खाते और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल लंबित हैं तो अगले सत्र में जिम्मेदारी तय करने से पहले रिकॉर्ड की समीक्षा आवश्यक होगी, वरना स्थिति विचित्र होगी—पुराने हिसाब पर जांच नहीं, नया हिसाब संभालने की जिम्मेदारी तैयार, पुरानी शिकायत लंबित,नया सीजन शुरू,पुराने भुगतान सवालों में,नया पैसा खाते में,और फिर अगले साल वही सवाल—धान कितना आया, कितना गया और पैसा कहां गया?
महफिल का दावा सही निकला तो मामला शिवप्रसादनगर से कहीं बड़ा है- इस पूरी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है, यदि महफिल में कही गई कथित बात केवल डींग है तो उसका पर्दाफाश होना चाहिए,लेकिन यदि कोई व्यक्ति सचमुच इसलिए निश्चिंत है कि शिकायत चाहे जितनी हो,वह कार्रवाई रोकवा सकता है, तो मामला एक धान खरीदी केंद्र से कहीं बड़ा हो जाता है,तब सवाल समिति प्रबंधन का नहीं,नियामक व्यवस्था की विश्वसनीयता का होगा,और यदि पैसे के बदले कार्रवाई प्रभावित करने का कोई प्रमाण मिलता है तो जांच उस स्तर तक जानी चाहिए जहां तक प्रमाण ले जाए—चाहे वह नीचे हो या ऊपर।
बचत खाते का पैसा आखिर बचत के लिए था या ‘खर्च करो अभियान’ के लिए?
शिवप्रसादनगर समिति के बचत खाते से बड़ी रकम खर्च किए जाने को लेकर पहले से सवाल उठाए जा रहे हैं,आरोप करोड़ों रुपये तक के भुगतान और कथित संदिग्ध खर्च से जुड़ा है,यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि केवल बैंक खाते से बड़ी राशि निकलना अपने आप भ्रष्टाचार साबित नहीं करता,असली प्रश्न है—राशि किस काम पर और किस दस्तावेज के आधार पर खर्च हुई? अगर भुगतान वैध है तो बिल होगा, मजदूरी है तो मजदूर और मस्टर होगा, वेतन है तो कर्मचारी,नियुक्ति आदेश और वेतन पत्रक होगा,खरीद है तो सामग्री और बिल होगा, परिवहन है तो वाहन,मात्रा और पर्ची होगी, किसी सेवा का भुगतान है तो उसका आदेश और कार्य का प्रमाण होगा,और यदि वार्षिक आमसभा हुई तो संस्था के सदस्यों के सामने वित्तीय विवरण रखने से संबंधित रिकॉर्ड भी होना चाहिए,यानी करोड़ों के सवाल का जवाब करोड़ शब्दों में नहीं चाहिए—कुछ मूल दस्तावेज पर्याप्त होंगे।
बहाली भी ‘श्रॉडिंगर की बिल्ली’ जैसी—प्रभारी के अनुसार हो गई, अधिकारी के अनुसार हुई ही नहीं!
इस पूरे मामले में एक दिलचस्प विरोधाभास और सामने आया है,बताया जा रहा है कि समिति प्रबंधक सोहराब की ओर से कहा जा रहा है कि संबंधित धान खरीदी प्रभारी की बहाली हो चुकी है,जबकि प्राधिकृत अधिकारी अथवा अन्य जिम्मेदार स्तर से बहाली नहीं होने की बात कही जा रही है,अब एक कर्मचारी एक ही समय में बहाल भी कैसे हो सकता है और बहाल नहीं भी? सहकारिता विभाग ने शायद नियुक्ति का कोई नया दर्शन विकसित नहीं किया होगा,सामान्य व्यवस्था में बहाली हुई है तो आदेश होगा, आदेश में क्रमांक होगा,तारीख होगी,सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर होंगे,कार्यभार ग्रहण करने का रिकॉर्ड होगा,यदि इनमें से कुछ नहीं है तो मौखिक बहाली का क्या अर्थ है? और यदि आदेश मौजूद है तो उसे सामने रख देने में समस्या क्या है? यहां बयान नहीं, केवल आदेश तय करेगा कि कौन सही बोल रहा है।
अब ‘धान’ के साथ ‘दावे’ की भी तौल जरूरी
शिवप्रसादनगर में धान तौलने के लिए कांटा मौजूद है, अब जरूरत कथित दावों को भी उसी कठोरता से तौलने की है, ‘कुछ नहीं होगा ‘—किस आधार पर? ‘बहाली हो गई ‘—आदेश कहां है? ‘वार्षिक आमसभा हुई ‘—सूचना और कार्यवाही कहां है? ‘हमाली का भुगतान हुआ ‘—किसे और किस काम का? ‘समिति का खर्च वैध है ‘—बिल-वाउचर कहां हैं? ‘ऊपर तक पैसा पहुंचा’ और कार्यवाही नहीं होती क्या यही इस प्रमाण है? इन सवालों में किसी को पहले से दोषी मानने की जरूरत नहीं,दस्तावेज निकालिए और दूध का दूध,पानी का पानी कर दीजिए,लेकिन यदि रिकॉर्ड मांगने पर रिकॉर्ड न मिले, बैठक पूछने पर तारीख न मिले,बहाली पूछने पर दो जवाब मिलें और कार्रवाई पूछने पर महफिल से जवाब आए कि ‘कुछ नहीं होगा ‘,तो व्यंग्य स्वयं जन्म लेता है,सहकारिता में शायद अब नया नारा लिखना बाकी है- ‘धान का एक-एक दाना तौला जाएगा,बस सवालों का वजन मत पूछिए!’ और शिवप्रसादनगर में सबसे बड़ा प्रश्न अभी भी वहीं खड़ा है इतना कॉन्फिडेंस आखिर किसका है-साफ रिकॉर्ड का, सिस्टम की कमजोरी का या किसी कथित संरक्षण का?
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