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- ‘शीशे का खिलौना था…कुछ न कुछ तो होना था’-कोरिया के इस आदेश पर क्यों सटीक बैठ रहा है यह गीत?
- शिक्षक को सोनहत WCD परियोजना का प्रभार,वित्तीय अधिकार दिए जाने पर उठे सवाल…
- आज स्कूल, कल साक्षरता…अब महिला एवं बाल विकास विभाग भी!
- शिक्षक से जिला अधिकारी तक…अब महिला एवं बाल विकास विभाग की कमान भी!
- ‘ये क्या हुआ, कैसे हुआ…’ शिक्षक को मिला दूसरे विभाग का प्रभार,आदेश पर उठे सवाल
- आज स्कूल,कल साक्षरता…अब महिला एवं बाल विकास विभाग भी!
- एक शिक्षक,कई जिम्मेदारियां,कोरिया के आदेश ने खड़े किए बड़े सवाल
- शिक्षक को सोनहत WCD परियोजना का प्रभार, वित्तीय अधिकारों पर भी सवाल
- प्रतिनियुक्ति के बाद एक और प्रभार, आखिर किस नियम के तहत?
- गुरुजी संभालेंगे अब हर विभाग? कोरिया के आदेश ने छेड़ी नई बहस
- स्कूल से साक्षरता और अब महिला-बाल विकास तक…जिम्मेदारियों का विस्तार क्यों?
- एक आदेश,कई सवालः शिक्षक को महिला एवं बाल विकास परियोजना का प्रभार
- शिक्षा विभाग के शिक्षक को महिला एवं बाल विकास विभाग के सोनहत परियोजना का प्रभार देने के आदेश ने खड़े किए सवाल, वित्तीय अधिकारों को लेकर भी उठ रही आपत्तियां
-रवि सिंह-
कोरिया,11 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। ‘ये क्या हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ… जब हुआ, तब हुआ,छोड़ो,ये न सोचो… हमने जो देखा था, सुना था,क्या बताएं वो क्या था…सपना सलोना था, खत्म तो होना था, हुआ…इस फिल्मी गीत की ये पंक्तियां इन दिनों कोरिया जिले में जारी एक प्रशासनिक आदेश पर बिल्कुल सटीक बैठती नजर आ रही हैं,वजह यह कि एक ऐसा आदेश सामने आया है,जिसने विभागीय व्यवस्था,प्रतिनियुक्ति,प्रशासनिक दायित्व और वित्तीय अधिकारों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं,सवाल यह नहीं कि किसी अधिकारी या कर्मचारी को अतिरिक्त जिम्मेदारी क्यों दी गई, बल्कि सवाल यह है कि यह जिम्मेदारी किस नियम, किस प्रक्रिया और किस अधिकार के तहत दी गई? मामला एक शासकीय माध्यमिक विद्यालय के प्रधान पाठक का है,जो पहले से ही जिला साक्षरता अधिकारी के पद पर प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत बताए जा रहे हैं, अब उन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग की सोनहत परियोजना का प्रभार दिए जाने की बात सामने आई है। इससे भी बड़ा सवाल तब खड़ा होता है,जब इस प्रभार के साथ वित्तीय जिम्मेदारियों अथवा आहरण-वितरण से जुड़े अधिकार दिए जाने की स्थिति सामने आती है, यही वह बिंदु है,जहां यह आदेश महज एक सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था न रहकर विभागीय अधिकारों और वित्तीय प्रक्रिया का विषय बन जाता है।
एक शिक्षक, तीन जिम्मेदारियां और सवालों का दायरा
सामान्य तौर पर किसी कर्मचारी को उसकी मूल जिम्मेदारी से अलग किसी अन्य विभाग में प्रतिनियुक्ति या अतिरिक्त प्रभार दिया जा सकता है, लेकिन ऐसी व्यवस्था में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित कर्मचारी का मूल पद क्या है, वर्तमान में वह किस पद पर कार्यरत है,किस आदेश के तहत प्रतिनियुक्त है और नए प्रभार के लिए किस नियम के तहत अधिकृत किया गया है,मौजूदा मामले में चर्चा इसलिए तेज है क्योंकि संबंधित व्यक्ति मूल रूप से शिक्षा विभाग से जुड़े हैं,वे प्रधान पाठक के पद पर पदस्थ रहे हैं और जिला साक्षरता अधिकारी के रूप में प्रतिनियुक्ति पर कार्य करने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में महिला एवं बाल विकास विभाग की परियोजना का प्रभार दिए जाने पर स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि—क्या यह केवल प्रशासनिक प्रभार है या इसके साथ वित्तीय एवं आहरण-वितरण संबंधी अधिकार भी प्रदान किए गए हैं? यदि वित्तीय अधिकार भी दिए गए हैं, तो फिर अगला सवाल है कि ऐसे अधिकार देने के लिए लागू वित्तीय नियमों में क्या प्रावधान है?
जनपद सीईओ की भूमिका भी चर्चा में…
इस आदेश को लेकर प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि जिस परियोजना का संचालन महिला एवं बाल विकास विभाग की निर्धारित प्रशासनिक संरचना के तहत होना है, वहां अन्य विभाग से प्रतिनियुक्त कर्मचारी को किस स्तर का अधिकार दिया गया है? यदि परियोजना अधिकारी का नियमित पद उपलब्ध है, तो उसके रहते किसी अन्य विभाग के कर्मचारी को प्रभार देने का कारण क्या था? यदि पद रिक्त था,तो क्या विभागीय स्तर पर योग्य अधिकारियों/कर्मचारियों की उपलब्धता का परीक्षण किया गया? और यदि प्रशासनिक आवश्यकता के कारण वैकल्पिक व्यवस्था करनी ही थी,तो उसके लिए सक्षम स्तर से अनुमति ली गई थी या नहीं? इन सवालों का जवाब आदेश और संबंधित विभागीय रिकॉर्ड से ही मिल सकता है।
वित्तीय अधिकार सबसे अहम सवाल
पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वित्तीय अधिकार हैं,किसी परियोजना का प्रभार संभालना और सरकारी राशि के आहरण-वितरण का अधिकार प्राप्त करना दो अलग-अलग प्रशासनिक स्थितियां हो सकती हैं,इसलिए यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संबंधित आदेश में कौन-कौन से अधिकार दिए गए हैं,क्या संबंधित व्यक्ति—परियोजना के प्रशासनिक कार्य देखेंगे? कर्मचारियों की निगरानी करेंगे? योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालेंगे? भुगतान संबंधी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करेंगे? सरकारी राशि आहरित कर सकेंगे? डीडीओ के रूप में कार्य करेंगे? या केवल अस्थायी रूप से कार्यालयीन कार्यों का संचालन करेंगे? इनमें से प्रत्येक अधिकार की प्रकृति अलग है और उसके लिए लागू नियमों की स्थिति भी अलग हो सकती है।
‘शीशे का खिलौना था…’ सवाल व्यवस्था पर है…गीत की दूसरी पंक्ति…
‘हम क्यों शिकवा करें, झूठा क्या हुआ,जो दिल टूटा… शीशे का खिलौना था,कुछ न कुछ तो होना था,हुआ…’ इस पूरे प्रकरण की प्रशासनिक तस्वीर को एक व्यंग्यात्मक आईना दिखाती है,क्योंकि यदि विभागीय व्यवस्था में पद,दायित्व और अधिकारों की सीमाएं स्पष्ट हैं तो फिर उन्हें लेकर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन यदि एक विभाग के कर्मचारी को दूसरे विभाग की परियोजना का प्रभार देने के साथ वित्तीय अधिकार भी दिए जा रहे हैं,तो नियमों की पारदर्शिता और आदेश की वैधानिकता स्पष्ट करना प्रशासन की जिम्मेदारी बन जाती है,यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष की योग्यता पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की प्रक्रिया पर है।
हमने जो देखा था,सुना था…क्या बताएं वो क्या था..
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सार्वजनिक चर्चा और वास्तविक प्रशासनिक आदेश के बीच अंतर साफ किया जाना चाहिए,यदि आदेश में केवल परियोजना का प्रशासनिक प्रभार दिया गया है,तो उसे वित्तीय अधिकारों के बराबर नहीं माना जा सकता,वहीं यदि आदेश में स्पष्ट रूप से वित्तीय शक्तियां,आहरण-वितरण अधिकारी की जिम्मेदारी अथवा सरकारी धन के संचालन से संबंधित अधिकार दिए गए हैं,तो मामला निश्चित रूप से अधिक गंभीर हो जाता है, इसलिए पूरे मामले में सबसे पहले मूल आदेश की शब्दावली सामने आना जरूरी है,यही दस्तावेज बताएगा कि संबंधित व्यक्ति को वास्तव में क्या अधिकार दिए गए हैं।
सपना सलोना था… खत्म तो होना था…
गीत की यह पंक्ति यहां एक अलग अर्थ पैदा करती है, यदि प्रशासनिक व्यवस्था नियमों और पारदर्शिता पर आधारित है तो किसी भी आदेश पर सवाल उठने का अवसर नहीं होना चाहिए,लेकिन जब एक आदेश से कई विभागों की जिम्मेदारियां एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द दिखाई देने लगें,तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे,क्या यह केवल अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था है? क्या कोई विशेष परिस्थिति थी? क्या संबंधित विभाग ने अपनी सहमति दी? क्या सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ली गई? क्या वित्त विभाग के लागू निर्देशों के अनुरूप वित्तीय शक्तियां निर्धारित की गईं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आदेश में दी गई वित्तीय शक्तियां संबंधित पदधारी की वैधानिक स्थिति के अनुरूप हैं?
पहले भी उठते रहे हैं प्रतिनियुक्ति और अटैचमेंट पर सवाल
जिले में लंबे समय से कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति,संलग्नीकरण और मूल विभाग से अलग जिम्मेदारियां दिए जाने को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं,ऐसे मामलों में सबसे बड़ी समस्या तब पैदा होती है,जब अस्थायी व्यवस्था धीरे-धीरे स्थायी जैसी स्थिति ग्रहण कर लेती है और वर्षों तक कर्मचारी अपने मूल पद और मूल विभाग से अलग कार्य करते रहते हैं,यदि किसी कर्मचारी को दूसरे विभाग में लंबे समय तक रखा जाता है,तो प्रशासन को समय-समय पर यह समीक्षा करनी चाहिए कि क्या अब भी उस प्रतिनियुक्ति की आवश्यकता है? क्या मूल विभाग में उसकी सेवाओं की जरूरत नहीं है? क्या जिस विभाग में उसे रखा गया है, वहां नियमित पदस्थापना की प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए?
अब जवाब आदेश से चाहिए,चर्चाओं से नहीं
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी है कि इसे व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष का मुद्दा न बनाकर नियम और प्रक्रिया का विषय माना जाए, प्रशासन यदि स्पष्ट कर दे कि संबंधित कर्मचारी को किस पद पर,किस आदेश से और कितनी अवधि के लिए प्रतिनियुक्त किया गया है तथा सोनहत महिला एवं बाल विकास परियोजना का प्रभार देते समय कौन-कौन से अधिकार सौंपे गए हैं,तो अधिकांश सवालों का जवाब अपने आप मिल जाएगा,विशेष रूप से यदि वित्तीय अधिकार दिए गए हैं तो संबंधित वित्तीय प्रत्यायोजन आदेश, ष्ठष्ठह्र संबंधी प्रावधान और सक्षम स्वीकृति भी स्पष्ट होनी चाहिए,क्योंकि अंततः सरकारी व्यवस्था में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘ये क्या हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ…?’ बल्कि जवाब साफ होना चाहिए— ‘नियम के तहत हुआ,आदेश के तहत हुआ और पूरी प्रक्रिया के साथ हुआ।’ और यदि ऐसा है, तो फिर ‘शीशे का खिलौना था, कुछ न कुछ तो होना था…’ जैसी पंक्तियों में छिपा व्यंग्य भी अपने आप खत्म हो जाएगा।
राजनीतिक संरक्षण के आरोपों की भी हो निष्पक्ष जांच
इस पूरे मामले को लेकर कुछ स्तरों पर राजनीतिक प्रभाव अथवा विशेष कृपा के आरोप भी लगाए जा रहे हैं,हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए,यदि प्रशासन के पास आदेश जारी करने के पीछे स्पष्ट प्रशासनिक कारण और नियमसम्मत आधार है,तो उसे सार्वजनिक करने में किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए,यही पारदर्शिता ऐसे आरोपों का सबसे बेहतर जवाब भी हो सकती है।
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