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रायपुर@क्या डिग्री सत्यापन में सिर्फ विश्वविद्यालय की मान्यता देखी गई या डिग्री प्राप्ति वर्ष की वैधता भी जांची गई?

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  • सूत्रों के हवाले से सामने आई नोटशीट पर उठे गंभीर प्रश्न
  • सर्वेश यादव और सिद्धार्थ पाण्डेय की शैक्षणिक योग्यताओं के सत्यापन को लेकर नई बहस,अब पूरे रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच की उठी मांग…
  • खाद्य विभाग की भर्ती में नया खुलासा! डिग्री सत्यापन की नोटशीट ने बढ़ाई मुश्किलें
  • डिग्री की नहीं, सिर्फ विश्वविद्यालय की
  • मान्यता पूछी गई? नोटशीट से उठे बड़े सवाल
  • सत्यापन या सिर्फ औपचारिकता? नोटशीट
  • में दर्ज टिप्पणियों ने बढ़ाया भर्ती विवाद
  • खाद्य विभाग में डिग्री सत्यापन
  • पर सवाल, क्या ‘डिग्री वर्ष’ की जांच
  • करना ही भूल गया विभाग?
  • सूत्रों से मिली नोटशीट ने खोली सत्यापन
  • प्रक्रिया की परतें,अब निष्पक्ष जांच की मांग तेज
  • नोटशीट का नया खुलासाः विश्वविद्यालय की मान्यता देखी, डिग्री वर्ष की वैधता पर क्यों नहीं हुआ सवाल?
  • खाद्य विभाग की भर्ती में नया ‘ट्विस्ट’! नोटशीट के एक पन्ने ने
  • खड़े किए कई गंभीर सवाल
  • सूत्रों के हवाले से सामने आए दस्तावेज में डिग्री सत्यापन प्रक्रिया पर उठे सवाल
  • विशेषज्ञ बोले—विश्वविद्यालय की मान्यता और डिग्री की वर्षवार वैधता दो अलग-अलग विषय हैं
  • पूरे मामले की स्वतंत्र जांच जरूरी

न्यूज डेस्क
रायपुर,25 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में वर्ष 2015-16 की भर्ती प्रक्रिया,वरिष्ठता विवाद और पदोन्नति को लेकर पहले से चल रहे विवाद के बीच अब एक और दस्तावेज सामने आया है,जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है, दैनिक घटती-घटना को सूत्रों के माध्यम से विभागीय नोटशीट का एक अंश प्राप्त हुआ है, जिसमें दो अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यताओं के सत्यापन का उल्लेख किया गया है,प्रथम दृष्टया इस नोटशीट की भाषा और उसमें दर्ज टिप्पणियां सत्यापन प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े करती हैं,हालांकि, दैनिक घटती-घटना इस दस्तावेज की स्वतंत्र पुष्टि का प्रयास कर रहा है,यदि यह नोटशीट विभागीय रिकॉर्ड का हिस्सा है, तो इसमें दर्ज तथ्यों की निष्पक्ष जांच आवश्यक हो जाती है।
दस्तावेज क्या कहता है?
सूत्रों से प्राप्त नोटशीट के अनुसार खाद्य सुरक्षा अधिकारी के 71 पदों पर भर्ती के लिए वर्ष 2015 में दस्तावेज सत्यापन किया गया था, दस्तावेज में उल्लेख है कि दस्तावेज सत्यापन के दौरान सर्वेश कुमार यादव एवं सिद्धार्थ पाण्डेय की शैक्षणिक योग्यताओं के संबंध में संबंधित विश्वविद्यालयों एवं संस्थाओं से जानकारी मांगी गई थी,बाद में प्राप्त जवाबों तथा त्रष्ट एवं दूरस्थ शिक्षा परिषद की वेबसाइट पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर दोनों की डिग्रियों को मान्यता प्राप्त होना बताया गया, यहीं से पूरा विवाद शुरू होता है।
सबसे बड़ा सवाल-आखिर पूछा क्या गया था?
नोटशीट में जिन बिंदुओं का उल्लेख है,उससे प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि संबंधित विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से यह जानकारी प्राप्त की गई कि उन्हें मान्यता प्राप्त थी या नहीं,लेकिन दस्तावेज में यह स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं दिखता कि संबंधित अधिकारियों ने यह भी पूछा था या नहीं कि संबंधित अभ्यर्थी ने जिस वर्ष डिग्री प्राप्त की, उस वर्ष उस विशेष पाठ्यक्रम को वैध मान्यता प्राप्त थी या नहीं? क्या उस समय विश्वविद्यालय को उस पाठ्यक्रम को दूरस्थ शिक्षा से संचालित करने की अनुमति थी? क्या संबंधित डिग्री उस भर्ती के लिए लागू नियमों एवं स्नस्स््रढ्ढ के निर्धारित मानकों के अनुरूप थी? यही वे प्रश्न हैं, जिनका उत्तर अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है।
विश्वविद्यालय की मान्यता और डिग्री की मान्यता एक ही बात नहीं…
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी विश्वविद्यालय को मान्यता प्राप्त होना और किसी विशेष डिग्री अथवा पाठ्यक्रम का किसी विशेष वर्ष में वैध होना दो अलग-अलग विषय हैं, यदि किसी विश्वविद्यालय को किसी अवधि में मान्यता प्राप्त रही हो, तो भी यह आवश्यक नहीं कि उसके प्रत्येक पाठ्यक्रम या प्रत्येक सत्र को स्वतः वैध माना जाए, कई मामलों में प्रोग्राम-वार और वर्ष-वार मान्यता की स्थिति अलग हो सकती है,इसी कारण किसी भी भर्ती में केवल विश्वविद्यालय की सामान्य मान्यता देखना पर्याप्त नहीं माना जाता,बल्कि संबंधित अभ्यर्थी की डिग्री,उसका विषय,प्राप्ति वर्ष तथा उस समय लागू मान्यता की भी जांच की जाती है।
पहले भी न्यायालय तक पहुंच चुका है मामला
उल्लेखनीय है कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की भर्ती और वरिष्ठता विवाद पहले ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है, वर्ष 2026 में उच्च न्यायालय ने 2015 और 2016 की अलग-अलग भर्ती प्रक्रियाओं से नियुक्त अधिकारियों को एक ही वरिष्ठता सूची में सम्मिलित करने पर आपत्ति दर्ज करते हुए संबंधित आदेश निरस्त कर पुनर्विचार के निर्देश दिए थे, इसी न्यायालयीन पृष्ठभूमि के बीच अब यह नया दस्तावेज सामने आने से पूरे मामले पर और अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
लीगल नोटिस के बाद और बढ़ा महत्व
दैनिक घटती-घटना द्वारा प्रकाशित खोजी समाचारों के बाद संबंधित दो अधिकारियों की ओर से समाचार पत्र को ?50 लाख की क्षतिपूर्ति मांगते हुए कानूनी नोटिस भी भेजा गया है, समाचार पत्र का कहना है कि उसकी रिपोर्टिंग उपलब्ध दस्तावेजों,भर्ती नियमों और सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों पर आधारित है तथा यदि संबंधित पक्ष अपना पक्ष देना चाहे तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा, अब जब यह नोटशीट भी चर्चा में है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच पहले से कहीं अधिक आवश्यक प्रतीत होती है।
अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल
– क्या डिग्री सत्यापन में केवल विश्वविद्यालय की सामान्य मान्यता देखी गई?
– क्या संबंधित डिग्री के प्राप्ति वर्ष की वैधता की अलग से पुष्टि की गई थी?
– क्या संबंधित पाठ्यक्रम को उस समय Distance Mode में संचालित करने की अनुमति थी?
– क्या FSSAI और भर्ती नियमों के अनुरूप शैक्षणिक पात्रता का स्वतंत्र परीक्षण हुआ?
– यदि हुआ, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
जांच से ही स्पष्ट होगी सच्चाई-दैनिक घटती-घटना किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का दावा नहीं कर रहा, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों और सामने आ रहे तथ्यों के आधार पर जनहित से जुड़े प्रश्न उठा रहा है,यदि पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप रही है, तो निष्पक्ष जांच संबंधित अधिकारियों और विभाग दोनों के लिए सबसे बड़ा प्रमाण होगी,वहीं यदि जांच में कोई प्रक्रिया संबंधी त्रुटि सामने आती है,तो उसका निराकरण भी आवश्यक होगा,अब पूरा मामला केवल दो अधिकारियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी भर्ती प्रक्रिया,दस्तावेज सत्यापन की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन चुका है,ऐसे में शासन और खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के लिए सबसे उचित कदम यही होगा कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच कराकर सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए।
क्या सत्यापन प्रक्रिया अधूरी रही?
सूत्रों के हवाले से प्राप्त नोटशीट के आधार पर अब यह प्रश्न उठ रहा है कि कहीं सत्यापन प्रक्रिया केवल सामान्य जानकारी तक सीमित तो नहीं रही? यदि संबंधित अधिकारियों ने केवल इतना पूछा कि विश्वविद्यालय मान्यता प्राप्त था या नहीं, लेकिन यह नहीं पूछा कि संबंधित अभ्यर्थी द्वारा प्राप्त डिग्री उस वर्ष वैध थी या नहीं, तो क्या ऐसी जांच पूर्ण और पर्याप्त मानी जा सकती है? यह प्रश्न अब पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गया है।


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