खबर प्रकाशित होने के बाद मची खलबली,ग्राम संगठनों और स्व-सहायता समूहों की फाइलों के साथ एएफएलसीआरपी व पीआरपी की भूमिका जांचने की मांग
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,19 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। आजीविका मिशन ‘बिहान योजना’ में कथित अनियमितताओं को लेकर खबर प्रकाशित होने के बाद अब योजना के तहत स्व-सहायता समूहों को वितरित किए गए ऋण की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई है,विकासखंड खड़गवां में संचालित चारों क्लस्टरों के ग्राम संगठनों और उनसे जुड़े स्व-सहायता समूहों को दिए गए ऋण की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठ रही है,मांग है कि ऋण स्वीकृति से लेकर राशि के वास्तविक वितरण और उसके उपयोग तक की पूरी जानकारी का दस्तावेजों से मिलान कराया जाए।
बताया जा रहा है कि यदि चारों क्लस्टरों में ग्राम संगठनवार और समूहवार ऋण वितरण की फाइलों की जांच की जाए तो प्रक्रिया में सामने आने वाली वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है, जांच के दायरे में ऋण प्रस्ताव,समूह की बैठक पुस्तिका, प्रस्ताव पारित करने की प्रक्रिया,ऋण आवेदन,बैंक खाते,स्वीकृति आदेश,राशि हस्तांतरण और ऋण के उपयोग से जुड़े दस्तावेजों को शामिल करने की मांग की जा रही है।
लोन वितरण की पूरी प्रक्रिया खंगालने की मांग-सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार,स्व-सहायता समूहों को दिए गए ऋण की जांच केवल कागजी रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहनी चाहिए,प्रत्येक समूह के सदस्यों से सीधे जानकारी लेकर यह पता लगाया जाना चाहिए कि समूह के नाम पर कितनी राशि स्वीकृत हुई, वास्तव में कितनी राशि बैंक खाते में पहुंची और उसका उपयोग किस कार्य के लिए किया गया, इसके साथ ही बैंक खातों के लेन-देन,समूह के रजिस्टर,बैठक पुस्तिका और विभागीय रिकॉर्ड का आपस में मिलान कराने की मांग की जा रही है,यदि रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर मिलता है तो संबंधित स्तर की जिम्मेदारी भी तय किए जाने की आवश्यकता होगी।
एएफएलसीआरपी और पीआरपी की भूमिका भी जांच के घेरे में- ऋण वितरण की प्रक्रिया में फील्ड स्तर पर काम करने वाले एएफएलसीआरपी और पीआरपी की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं,जांच की मांग करने वालों का कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि समूहों के ऋण प्रकरण तैयार करने और प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में किस-किस स्तर के लोगों की भूमिका रही,सवाल यह भी है कि जिन समूहों के नाम पर ऋण स्वीकृत हुआ, क्या वास्तव में उन्हीं समूहों और उनके सदस्यों को राशि मिली? क्या समूह की बैठक में विधिवत प्रस्ताव पारित किया गया था? क्या ऋण की राशि का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए किया गया, जिसके लिए उसे स्वीकृत किया गया था?
‘लोन की जानकारी मत देना’ वाली चर्चा ने बढ़ाए सवाल-इस पूरे मामले में सबसे गंभीर चर्चा यह है कि कुछ फील्ड स्तर पर कार्यरत लोगों द्वारा कथित तौर पर स्व-सहायता समूहों के सदस्यों से कहा जा रहा है कि यदि कोई लोन से संबंधित जानकारी लेने आए तो जानकारी साझा न करें,हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है,लेकिन यदि ऐसा निर्देश वास्तव में दिया गया है तो यह पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है,सरकारी योजना के तहत समूहों को उपलब्ध कराई गई राशि से संबंधित जानकारी जांच से क्यों छिपाई जाए, यह सवाल भी अब उठने लगा है। ऐसे में निष्पक्ष जांच के दौरान समूह के सदस्यों से स्वतंत्र रूप से बयान लेना महत्वपूर्ण होगा।
गांव-गांव जाकर हो भौतिक सत्यापन-जांच की मांग करने वालों का कहना है कि केवल कार्यालय में रखी फाइलों की जांच से पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी, इसके लिए चारों क्लस्टरों के अंतर्गत आने वाले ग्राम संगठनों और स्व-सहायता समूहों का भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए,प्रत्येक समूह से पूछा जाए कि उसे कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी राशि प्राप्त हुई,राशि का उपयोग कहां किया गया और वर्तमान में ऋण की स्थिति क्या है, बैंक रिकॉर्ड और विभागीय दस्तावेजों से इन बयानों का मिलान कराने पर वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
प्रशासन के सामने कई सवाल-अब सवाल यह है कि खड़गवां विकासखंड के चारों क्लस्टरों में स्व-सहायता समूहों को अब तक कुल कितनी राशि का ऋण वितरित किया गया? प्रत्येक समूह के ऋण प्रस्ताव और बैंक रिकॉर्ड का सत्यापन कब हुआ? एएफएलसीआरपी और पीआरपी स्तर पर प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका की जांच क्यों न कराई जाए? क्या प्रत्येक समूह का गांव-गांव जाकर भौतिक सत्यापन होगा? और यदि किसी समूह के नाम पर ऋण दर्शाया गया हो,लेकिन समूह को राशि प्राप्त ही न हुई हो तो उसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
बिहान योजना का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है,ऐसे में ऋण वितरण में किसी भी स्तर की अनियमितता का सीधा असर योजना से जुड़ी महिलाओं पर पड़ता है,अब निगाह प्रशासन की संभावित जांच पर है कि चारों क्लस्टरों की फाइलें खुलेंगी और ऋण वितरण की वास्तविक स्थिति सामने आएगी या मामला केवल कागजी रिकॉर्ड तक सीमित रहेगा।
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