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सूरजपुर/भैयाथान,@जमीन तीन की,धान एक के खाते में…! शिवप्रसादनगर में 136 क्विंटल का ऐसा गणित,जिसे समझने में सहकारिता भी उलझ गई

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  • 3.13 हेक्टेयर जमीन में तीन हिस्सेदार,136 क्विंटल धान की बिक्री एक खाते में…शिवप्रसादनगर में किस नियम का गणित?
  • सामूहिक जमीन, अलग-अलग हिस्से और एक खाते में पूरा धान,शिवप्रसादनगर समिति में उठे गंभीर सवाल
  • साधना के खाते में 136 क्विंटल धान,जमीन में हदीश-रिजवान भी हिस्सेदार,सहकारिता के गणित पर सवाल
  • हदीश, साधना और रिजवान की साझी जमीन, लेकिन धान बिक्री सिर्फ साधना के नाम,कहां गया बाकी दो हिस्सों का हिसाब?
  • 45.20 क्विंटल की तीन-तीन पात्रता,फिर एक ही नाम पर 136 क्विंटल बिक्री शिवप्रसादनगर में धान का नया गणित
  • धान तीन हिस्सों का, पैसा एक खाते में! हदीश-साधना-रिजवान की जमीन ने खोले सहकारिता के नए सवाल
  • जमीन तीन की तो धान भी तीन का होना था साहब! फिर 136 क्विंटल एक खाते में कैसे पहुंच गया?
  • 3.13 हेक्टेयर भूमि में हदीश,साधना और रिजवान का बराबर हिस्सा,प्रत्येक की 45.20 क्विंटल पात्रता, रिकॉर्ड में पूरी 136 क्विंटल बिक्री साधना के नाम होने के दावे ने खड़े किए सवाल
  • हदीस अंसारी, साधना कुशवाहा और रिजवान के नाम 3.13 हेक्टेयर भूमि—तीनों की बराबर हिस्सेदारी 45.20-45.20 क्विंटल पात्रता, लेकिन बिक्री एक नाम से होने का सवाल, समिति प्रभारी मोहम्मद सोहराब और खरीदी प्रभारियों की जमीन साझेदारी ने बढ़ाई बेचैनी

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,17 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर जिले के भैयाथान क्षेत्र की आदिम जाति सेवा सहकारी समिति शिवप्रसादनगर में धान खरीदी का गणित अब इतना दिलचस्प हो गया है कि कैलकुलेटर भी शायद पहले यह पूछे कि जमीन किसकी है और धान किसका! उपलब्ध दस्तावेजों और किसान सूचना पोर्टल से सामने आए आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो मामला केवल जमीन खरीद का नहीं रह जाता, बल्कि भूमि हिस्सेदारी, फसल पात्रता,धान बिक्री और भुगतान की दिशा तक पहुंच जाता है। मामले में उपलब्ध जानकारी के अनुसार हदीस अंसारी, साधना कुशवाहा और रिजवान अंसारी के नाम से कुल लगभग 3.13 हेक्टेयर यानी करीब 7.7 एकड़ भूमि दर्ज है,इसमें धान का रकबा करीब 2.63 हेक्टेयर बताया गया है और कुल धान विक्रय पात्रता 136 क्विंटल है, रिकॉर्ड के अनुसार 136 क्विंटल धान का विक्रय भी किया गया,कागज का गणित यहां तक बिल्कुल साफ है, तीन हिस्सेदार,कुल जमीन एक,धान की पात्रता 136 क्विंटल, उलझन वहां शुरू होती है जहां बिक्री का नाम सामने आता है,पहली नजर में यह सामान्य कृषि रिकॉर्ड जैसा दिखाई दे सकता है, आखिर संयुक्त जमीन खरीदना कोई अपराध नहीं और सह-खातेदार होना भी अपने आप में कोई गुनाह नहीं, मगर जब हिस्सेदारी अलग-अलग हो,पात्रता अलग-अलग बने और धान की बिक्री एक ही नाम से होने की बात सामने आए,तब सहकारिता के गणित में एक नया अध्याय खुलता है, जमीन तीन की,धान एक का कैसे? सबसे बड़ा सवाल यही है की जब जमीन में तीन लोगों का हिस्सा है,तो धान की बिक्री और उसका भुगतान किसके नाम हुआ और क्यों?
3.13 हेक्टेयर जमीन, तीन हिस्से और प्रत्येक का लगभग 1.04 हेक्टेयर हिस्सा
उपलब्ध विवरण के अनुसार कुल 3.13 हेक्टेयर भूमि में तीनों का हिस्सा लगभग बराबर बताया गया है, प्रत्येक के हिस्से में लगभग 1.04 हेक्टेयर भूमि आती है,इसी अनुपात में प्रत्येक के हिस्से का धान रकबा लगभग 0.88 हेक्टेयर तथा धान विक्रय पात्रता 45.20 क्विंटल बताई गई है,यानी कागज पर तीनों के हिस्से बराबर—जैसे सहकारिता ने गणित की किताब खोलकर बराबर-बराबर बांट दिया हो,इस हिसाब से कागज पर गणित बिल्कुल सीधा है, साधना कुशवाहा का हिस्सा—लगभग 1.04 हेक्टेयर भूमि,0.88 हेक्टेयर धान रकबा और 45.20 क्विंटल पात्रता, हदीस अंसारी का हिस्सा—लगभग 1.04 हेक्टेयर भूमि, 0.88 हेक्टेयर धान रकबा और 45.20 क्विंटल पात्रता, रिजवान अंसारी का हिस्सा—लगभग 1.04 हेक्टेयर भूमि,0.88 हेक्टेयर धान रकबा और 45.20 क्विंटल पात्रता, तीनों की पात्रता जोड़ने पर कुल आंकड़ा लगभग 135.60 क्विंटल,जिसे रिकॉर्ड में 136 क्विंटल के आसपास माना गया है,कागज का हिसाब इतना साफ है कि जोड़ने वाला भी खुश हो जाए,लेकिन कहानी का असली मोड़ अब शुरू होता है।
जमीन तीन की, धान एक के खाते में क्यों?
सहकारिता का यह नया गणित किस किताब में है?- यदि तीनों व्यक्ति जमीन के सह-खातेदार हैं और प्रत्येक के हिस्से की धान पात्रता अलग-अलग बनती है, तो सामान्य सवाल यह है कि धान की बिक्री भी संबंधित खातेदारों के नाम से क्यों नहीं हुई? आखिर सरकारी व्यवस्था में हिसाब-किताब का इतना महत्व है कि एक बोरा कम-ज्यादा होने पर रजिस्टर तक जाग जाता है,फिर तीन हिस्सों की पात्रता एक नाम पर पहुंच जाए तो रजिस्टर को नींद क्यों आ गई—यह जांच का विषय है,उपलब्ध जानकारी के अनुसार धान की बिक्री साधना कुशवाहा के नाम से हुई और भुगतान भी उसी खाते में जाने की बात सामने आ रही है,यदि यह तथ्य रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो सवाल बेहद सीधा है की क्या पूरी 3.13 हेक्टेयर जमीन पर उत्पादित धान को अकेले साधना कुशवाहा के नाम बेचने की अनुमति थी? यदि अनुमति थी तो उसका आधार क्या था? क्योंकि सरकारी दफ्तरों में मौखिक अनुमति की उम्र आमतौर पर उतनी ही होती है जितनी चाय के कप में गर्मी की—फाइल में कुछ देर बाद सबूत चाहिए, क्या हदीस अंसारी और रिजवान अंसारी ने अपने हिस्से का धान साधना कुशवाहा को बेचने अथवा उसके नाम से बेचने के लिए अधिकृत किया था? क्या इसका कोई लिखित प्राधिकरण है? क्या खरीदी केंद्र के रिकॉर्ड में तीनों सह-खातेदारों की सहमति दर्ज है? और सबसे महत्वपूर्ण है की यदि धान तीनों का था तो भुगतान भी तीनों को अलग-अलग क्यों नहीं किया गया?
क्या दूसरे हिस्सेदार की फसलतीसरे व्यक्ति के खाते में बेची गई? खेत से खाते तक जांच जरूरी
यह सवाल इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील हिस्सा है,और यहीं व्यंग्य की असली धार भी है, खेत में तीन हिस्से, कागज पर तीन पात्रताएं और यदि खाते में एक भुगतान निकला तो फिर हिसाब-किताब का पूरा पेड़ उल्टा खड़ा दिखाई देगा, यदि जमीन में तीन सह-खातेदार हैं और प्रत्येक के हिस्से में धान उत्पादन की पात्रता अलग-अलग निर्धारित है,तो यह देखना जरूरी होगा कि किस हिस्से में वास्तव में धान की फसल खड़ी थी, क्या तीनों हिस्सों में धान बोया गया था? क्या डीसीएस द्वारा तीनों हिस्सों का भौतिक सत्यापन किया गया? क्या फसल सत्यापन के समय तीनों हिस्सों की अलग-अलग जांच हुई? क्या खरीदी केंद्र के रिकॉर्ड में तीनों की पात्रता अलग-अलग दर्ज थी? और यदि पात्रता अलग थी तो धान एक ही नाम से क्यों बेचा गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि भूमि रिकॉर्ड में तीन नाम और धान खरीदी रिकॉर्ड में एक नाम होने के पीछे कोई अलग व्यवस्था बनाई गई हो? यह फिलहाल सवाल है, निष्कर्ष नहीं।
धान कारोबार से जुड़े व्यक्ति,समिति प्रभारी और खरीदी प्रभारी की साझेदारी—क्यों?
इस मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि उपयोगकर्ता द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार मोहम्मद सोहराब शिवप्रसादनगर समिति के समिति प्रभारी, जबकि साधना कुशवाहा शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र की प्रभारी और रिजवान अंसारी सवरवां धान खरीदी केंद्र के प्रभारी बताए जाते हैं, दूसरी ओर हदीस अंसारी को क्षेत्र में धान कारोबार से प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में बताया जा रहा है, यहां हदीस अंसारी धान माफिया के तौर पर प्रशिद्ध है, लगाए जा रहे आरोपों/स्थानीय चर्चा के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए, दस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि समिति प्रबंधन या धान खरीदी व्यवस्था से जुड़े व्यक्तियों ने उसी व्यक्ति के साथ करोड़ों की भूमि में साझेदारी की है जिसके धान कारोबार को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं,तो यह हितों के टकराव की जांच का पर्याप्त आधार हो सकता है,यहां फिर सवाल जमीन खरीदने के अधिकार पर नहीं है,सवाल यह है कि धान खरीदी व्यवस्था में जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति उसी क्षेत्र के धान कारोबार से जुड़े व्यक्ति के साथ जमीन में साझेदार क्यों बने? क्या विभाग को इसकी जानकारी थी? क्या किसी अधिकारी ने इस संबंध में कोई आपत्ति दर्ज की? क्या संबंधित व्यक्तियों से हितों के टकराव को लेकर स्पष्टीकरण लिया गया?
समिति प्रबंधक की भूमिका भी जांच के दायरे में क्यों नहीं आए?
यदि समिति प्रबंधक और धान खरीदी प्रभारी से जुड़े लोग उसी भूमि के सह-खातेदार हैं जिस पर धान खरीदी की पात्रता बनी और धान बिक्री हुई, तो समिति स्तर पर इस पूरे रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, समिति के पास किसान पंजीयन,खरीदी रजिस्टर, फसल सत्यापन,स्टॉक,परिवहन और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड होते हैं,इसलिए जांच केवल यह देखने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि धान खरीदा गया या नहीं, जांच यह भी होनी चाहिए कि फसल किसने बोई? जमीन कब खरीदी गई? नामांतरण कब हुआ? फसल पंजीयन कब हुआ? पात्रता किस आधार पर बनी? भौतिक सत्यापन किसने किया? धान किसके नाम बेचा गया? भुगतान किस खाते में गया? और यदि दूसरे सह-खातेदारों की फसल थी तो उनके हिस्से की रकम कहां गई?
क्या यह सिर्फ सुविधा थी या कोई वित्तीय रणनीति?
यहां कई संभावनाएं हो सकती हैं,लेकिन किसी एक संभावना को तथ्य मानना उचित नहीं होगा,हो सकता है कि सह-खातेदारों ने किसी वैध आपसी सहमति के आधार पर एक व्यक्ति को धान बिक्री के लिए अधिकृत किया हो,यह भी संभव है कि बैंकिंग या किसान पंजीयन की किसी प्रक्रिया के तहत एक नाम से बिक्री की अनुमति मिली हो,लेकिन यदि ऐसा है तो उसका लिखित रिकॉर्ड होना चाहिए,यदि लिखित अनुमति है तो सामने लाई जाए,यदि भुगतान के वितरण का रिकॉर्ड है तो वह भी सामने आए,यदि कोई वैधानिक प्राधिकरण नहीं है तो फिर यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि एक व्यक्ति के नाम पर दूसरे सह-खातेदारों की पात्रता का धान कैसे बेचा गया।
आयकर विभाग की कार्रवाई से जोड़कर देखना जल्दबाजी होगी,लेकिन जांच जरूरी
हदीस अंसारी के खातों पर आयकर विभाग की कार्रवाई और करोड़ों की रिकवरी संबंधी दावे को लेकर भी इस पूरे मामले में सवाल उठाए जा रहे हैं, सूत्रों का दावा है की हदीश के सभी बैंक खाते पर आयकर विभाग ने रोक लगाई है,लेकिन यदि खाते पर वास्तविक रोक है और उसी अवधि में संबंधित व्यक्ति के हिस्से की कृषि उपज किसी अन्य व्यक्ति के खाते में बेची गई,तो वित्तीय लेनदेन की जांच बिल्कुल स्वाभाविक है,क्या यह केवल सुविधा थी या किसी भुगतान प्रतिबंध से बचने का प्रयास? इसका जवाब अनुमान से नहीं, बैंक स्टेटमेंट से निकलेगा।
एक तरफ समिति की जिम्मेदारी,दूसरी तरफ निजी संपत्ति का सवाल हितों का हिसाब कौन रखेगा?
सहकारी समिति से जुड़े कर्मचारी और पदाधिकारी निजी संपत्ति नहीं खरीद सकते,ऐसा कोई सामान्य निषेध केवल आरोप के आधार पर नहीं माना जा सकता,लेकिन यदि उनके निजी आर्थिक हित उसी कारोबार से जुड़े व्यक्तियों के साथ जुड़े हों जिसकी निगरानी या खरीदी प्रक्रिया में वे स्वयं जिम्मेदार हैं,तो हितों के टकराव और निष्पक्षता का सवाल जरूर उठता है,यही कारण है कि इस मामले में सहकारिता विभाग को केवल समिति का रिकॉर्ड देखकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए, उसे यह देखना चाहिए कि संबंधित कर्मचारियों की भूमिका क्या थी और जमीन की खरीद के समय उनकी आधिकारिक जिम्मेदारी क्या थी।
किसान के लिए नियम और प्रभावशाली लोगों के लिए रास्ता अलग तो नहीं?
आम किसान को धान बेचने के लिए किसान पंजीयन से लेकर फसल सत्यापन तक कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है,यदि कोई दूसरे के नाम से धान बेचना चाहे तो उस पर सवाल खड़े हो सकते हैं,फिर सह-खातेदारों की भूमि पर उत्पादित धान एक ही व्यक्ति के नाम पर बेचने की व्यवस्था किस आधार पर बनी? क्या यह सभी किसानों के लिए लागू है? अगर हां,तो नियम क्या है? अगर नहीं, तो इस मामले में विशेष अनुमति किसने दी? और अगर कोई अनुमति नहीं थी तो खरीदी किस स्तर पर स्वीकृत हुई? यही वह सवाल है जिसका जवाब शिवप्रसादनगर समिति से लेकर जिला स्तर तक मांगा जाना चाहिए।
यह गणित समझना जरूरी है की जमीन सामूहिक, पात्रता अलग-अलग, बिक्री एक नाम से-
मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि भूमि को सामूहिक रूप से खरीदा गया बताया जा रहा है, लेकिन धान विक्रय पात्रता हिस्से के अनुसार अलग-अलग बनती है और बिक्री एक ही नाम से होने का सवाल सामने आ रहा है, यानी जमीन खरीदते समय तीन हिस्सेदार, पात्रता बनाते समय तीन हिस्से और बिक्री के समय एक नाम, यह कौन-सा नया सहकारी सूत्र है, इसका पाठ्यक्रम अभी तक विभाग ने जारी नहीं किया है, यानी जमीन का गणित कुछ और, धान की पात्रता का गणित कुछ और और भुगतान का रास्ता तीसरा, किसान के लिए नियमों की पूरी किताब, और यहां एक ही नाम में पूरा अध्याय यही विरोधाभास जांच की मांग करता है, यहीं से सवाल उठता है कि आखिर यह व्यवस्था किस नियम के तहत चली? यदि तीनों अलग-अलग व्यक्ति हैं, अलग-अलग परिवारों से हैं और उनके हिस्से भूमि रिकॉर्ड में अलग-अलग दर्ज हैं, तो भूमि को सामूहिक रूप से खरीदने का निर्णय क्यों लिया गया? यह किसी भी व्यक्ति का निजी अधिकार हो सकता है कि वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर जमीन खरीदे, लेकिन जब उसी भूमि पर धान खरीदी व्यवस्था से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका भी सामने आती है, तब हितों के टकराव की संभावना की जांच आवश्यक हो जाती है।
क्या हदीस के खाते पर कार्रवाई के कारण साधना के खाते का इस्तेमाल हुआ?
सवाल बड़ा है, जवाब बैंक देगा- मामले में एक और गंभीर सवाल तब खड़ा होता है जब हदीस अंसारी के बैंक खातों पर आयकर विभाग की कार्रवाई और लेनदेन प्रतिबंधित होने संबंधी दावे को इस जमीन और धान बिक्री के रिकॉर्ड के साथ जोड़कर देखा जा रहा है, अख़बार किस की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यदि ऐसा प्रतिबंध वास्तव में मौजूद था और उसी अवधि में हदीस के हिस्से की फसल किसी अन्य सह-खातेदार के नाम बेची गई, तो वित्तीय जांच का सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा, तब जांच का विषय होगा, क्या हदीस के हिस्से का धान वास्तव में साधना के नाम बेचा गया? यदि हां, तो इसकी अनुमति किसने दी? धान की बिक्री के बाद प्राप्त राशि का वास्तविक लाभार्थी कौन रहा? क्या राशि साधना के खाते में आई और बाद में हदीस को दी गई? या यह केवल रिकॉर्ड में एक नाम से बिक्री थी जबकि भुगतान और वास्तविक लेनदेन अलग था? इन सवालों का जवाब बैंक स्टेटमेंट और धान खरीदी भुगतान रिकॉर्ड से आसानी से मिल सकता है।
सवाल बहुत हैं…अब जांच कौन करेगा?
इस पूरे मामले में किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना अभी उचित नहीं होगा,लेकिन उपलब्ध आंकड़े और उठ रहे सवाल इतने गंभीर हैं कि उन्हें केवल आरोप कहकर किनारे करना भी उचित नहीं होगा, जांच में कम से कम इन दस्तावेजों का मिलान होना चाहिए की 3.13 हेक्टेयर भूमि की मूल रजिस्ट्री,नामांतरण रिकॉर्ड,तीनों सह-खातेदारों के हिस्से का विवरण,किसान पंजीयन,फसल पंजीयन,डीसीएस सत्यापन,136 क्विंटल धान की खरीदी रसीद,भुगतान रिकॉर्ड, समिति का स्टॉक रजिस्टर और संबंधित बैंक खातों की लेनदेन जानकारी, इसके साथ यदि आयकर विभाग की ओर से हदीस अंसारी के बैंक खातों पर कोई रोक या रिकवरी आदेश जारी हुआ था, तो उस आदेश को भी जांच में शामिल किया जाना चाहिए।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं कि धान किसने बेचा—सवाल यह है कि पैसा किसके पास गया और किस नियम से गया?
शिवप्रसादनगर का यह मामला अब एक साधारण जमीन खरीद या धान बिक्री का मामला नहीं रह गया है, इसमें भूमि स्वामित्व, फसल पात्रता, धान बिक्री, समिति की जिम्मेदारी, खरीदी प्रभारियों की भूमिका और वित्तीय लेनदेन की सभी कडि़यां जांच की मांग कर रही हैं,अगर तीनों की जमीन है तो तीनों की फसल का हिसाब होना चाहिए, अगर तीनों की फसल है तो तीनों के नाम बिक्री या वैध अधिकरण होना चाहिए, अगर एक व्यक्ति के नाम बिक्री हुई है तो उसके पीछे लिखित अधिकार होना चाहिए, और यदि भुगतान एक व्यक्ति को मिला है तो बाकी दो के हिस्से का हिसाब भी होना चाहिए,वरना सवाल यही रहेगा की जमीन सामूहिक, पात्रता अलग-अलग और पैसा एक खाते में आखिर किस नियम का गणित है? और यही वह सवाल है जिसका जवाब अब शिवप्रसादनगर समिति, सहकारिता विभाग और संबंधित जांच एजेंसियों को दस्तावेजों के साथ देना चाहिए।


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