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सूरजपुर@ जांच में दोषी,एफआईआर और सेवा समाप्ति के बाद फिर क्यों खुला फसल बीमा घोटाले का पिटारा?

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  • 35.78 लाख के फसल बीमा घोटाले के आरोपियों की ‘री-एंट्री’ की तैयारी! पुराने दोषियों के लिए नई जांच का खेल?
  • जिस जांच में दोषी पाए गए,उसी मामले में फिर जांच क्यों? फसल बीमा प्रकरण में सीईओ की कवायद पर सवाल
  • 5 जून 2023 की कार्रवाई के बाद 23 जनवरी 2026 का आदेश,अब नई जांच से किसकी राह आसान होगी?
  • फसल बीमा घोटाले में ‘री-एंट्री’ का रास्ता! पहले जांच में दोषी,अब कनिष्ठ अधिकारियों से दोबारा जांच
  • 35.78 लाख के खेल में जांच पर जांच! पुराने दोषियों की वापसी की कवायद ने बढ़ाया रहस्य…
  • पहले जिला प्रशासन की जांच, फिर बैंक की कार्रवाई…अब दोबारा जांच क्यों? फसल बीमा प्रकरण में उठे बड़े सवाल

ओंकार पाण्डेय
सूरजपुर,17 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक से जुड़े करीब 35.78 लाख रुपये के फसल बीमा प्रकरण में एक बार फिर ऐसी गतिविधियां सामने आने की जानकारी है,जिसने पूरे मामले को नए सवालों के घेरे में ला दिया है,मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि यह कोई ऐसा प्रकरण नहीं है जिसमें पहली बार जांच शुरू हो रही हो, उपलब्ध दस्तावेजों में जिला प्रशासन की जांच,बैंक की विभागीय कार्रवाई,पुलिस में एफआईआर, निलंबन और अंततः सेवा समाप्ति तक की कार्रवाई दर्ज है, इसके बाद मामला सहकारी न्यायिक प्रक्रिया में गया और 23 जनवरी 2026 को संयुक्त पंजीयक, सहकारी संस्थाएं, सरगुजा संभाग, अंबिकापुर के समक्ष आदेश भी पारित हुआ,अब इसी पूरे घटनाक्रम के बीच कथित तौर पर एक नई जांच टीम गठित किए जाने की चर्चा है। दैनिक घटती-घटना को विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्रीकांत चंद्राकर के स्तर से पुराने प्रकरण की दोबारा जांच कराने की तैयारी की गई है,सूत्रों का दावा है कि भैयाथान शाखा के शाखा प्रबंधक तथा सूरजपुर शाखा के शाखा प्रबंधक को इसकी जिम्मेदारी दी गई है,यह भी कहा जा रहा है कि प्रक्रिया को गोपनीय रखने और ऐसी रिपोर्ट तैयार कराने के निर्देश दिए गए हैं,जिससे सेवा से पृथक कर्मचारियों के पक्ष में रास्ता खुल सके,इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और बैंक प्रबंधन की आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है,दस्तावेजों में दर्ज घटनाक्रम और नई कवायद को साथ रखने पर मूल सवाल यही है की जब जांच, एफआईआर और विभागीय कार्रवाई पहले ही हो चुकी है, तो दोबारा जांच की जरूरत क्यों पड़ी?
दस्तावेज नंबर 1 : 5 जून 2023 का बैंक आदेश क्रमांक 383
इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित अंबिकापुर, क्र./स्थापना/2023-24/383, दिनांक 05.06.2023 आदेश है, इस आदेश में वर्ष 2019-20 के फसल बीमा राशि के फर्जी आहरण से संबंधित जांच का हवाला देते हुए कहा गया है कि कलेक्टर, जिला सूरजपुर द्वारा गठित जांच दल की रिपोर्ट में 35.78 लाख रुपये की राशि के लिए चार कर्मचारियों को दोषी पाया गया था, आदेश में यह भी दर्ज है कि तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश प्रसाद कुशवाहा, लिपिक सूबेदार सिंह,संस्था प्रबंधक राम कुमार सिंह और भृत्य सुनील यादव को निलंबित किया गया,इनके विरुद्ध थाना झिलमिली में एफआईआर दर्ज कराई गई, आदेश के अनुसार संबंधित राशि के संबंध में अंतिम सुनवाई की प्रक्रिया भी की गई,दस्तावेज के अनुसार जगदीश प्रसाद कुशवाहा को अंतिम सुनवाई का अवसर दिया गया था, आदेश में यह भी दर्ज है कि निर्धारित समय दिए जाने के बावजूद राशि जमा नहीं की गई,इसके बाद अधिकृत अधिकारी की बैठक दिनांक 05.06.2023 में जांच प्रतिवेदन के आधार पर सेवा से पृथक करने का निर्णय लिया गया, आदेश के अनुसार कुशवाहा की सेवाएं 05.06.2023 से समाप्त की गईं तथा गबन राशि की वसूली के लिए पृथक वैधानिक कार्रवाई किए जाने की बात भी कही गई, यानी उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह केवल आरोप लगाए जाने का प्रारंभिक चरण नहीं था, जांच प्रतिवेदन, बैंक का विभागीय आदेश और पुलिस कार्रवाई—तीनों स्तर पर मामला आगे बढ़ चुका था,यही कारण है कि अब प्रस्तावित नई जांच को लेकर सवाल और गंभीर हो जाते हैं।
दस्तावेज नंबर 2 : जिला कलेक्टर सूरजपुर की जांच और जांच दल
उपलब्ध रिकॉर्ड में कार्यालय कलेक्टर, जिला सूरजपुर (छत्तीसगढ़) की ओर से जांच दल गठित किए जाने संबंधी पत्र भी है, इसमें 2019-20 के फसल बीमा प्रकरण में किसानों के खातों में जमा फसल बीमा राशि के कथित अनियमित आहरण की जांच के लिए अधिकारियों की टीम बनाए जाने का उल्लेख है, दस्तावेज में जांच दल से शिकायत की जांच कर निर्धारित अवधि में प्रतिवेदन प्रस्तुत करने को कहा गया था,इस दस्तावेज का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि बाद के बैंक आदेश में इसी जांच दल की रिपोर्ट को कार्रवाई का आधार बनाया गया है, यानी 5 जून 2023 का बैंक आदेश किसी अनाम या मौखिक शिकायत के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार जिला प्रशासन द्वारा गठित जांच दल की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए जारी किया गया था।
दस्तावेज नंबर 3 : न्यायालय संयुक्त पंजीयक का प्रकरण क्रमांक 17/55(2)/2023
इस प्रकरण का अगला महत्वपूर्ण दस्तावेज है, न्यायालय संयुक्त पंजीयक, सहकारी संस्थाएं, सरगुजा संभाग, अंबिकापुर प्रकरण क्रमांक 17/55(2)/2023, उपलब्ध आदेश में वादी के रूप में जगदीश प्रसाद कुशवाहा तथा प्रतिवादी के रूप में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित अंबिकापुर शाखा,जिला सरगुजा का उल्लेख है, इस प्रकरण में 5 जून 2023 के सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती दी गई, आदेश के रिकॉर्ड में सुनवाई की विभिन्न तिथियों,दस्तावेजों,साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों का उल्लेख है,यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है कि सेवा समाप्ति के बाद मामला सहकारी न्यायिक प्रक्रिया में भी पहुंचा और वहां दस्तावेजों के आधार पर सुनवाई हुई,यही वह बिंदु है जहां नई जांच की कथित कवायद सबसे अधिक सवाल खड़े करती है, यदि न्यायालयीन आदेश का पालन करते हुए कर्मचारी को उचित अवसर देना है,तो बैंक को यह स्पष्ट करना होगा कि उसके लिए नई तथ्यात्मक जांच क्यों जरूरी है,क्या कोई नया तथ्य सामने आया है? क्या पुरानी जांच में कोई गंभीर प्रक्रियागत त्रुटि पाई गई है? या केवल बचाव का अवसर देने के नाम पर पुराने निष्कर्षों की दोबारा समीक्षा की जा रही है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब बैंक प्रबंधन को दस्तावेजों के साथ देना चाहिए।
हमसे बड़े अधिकारियों ने जांच की है’-फिर कनिष्ठ अधिकारियों से जांच क्यों?
विभागीय सूत्रों का दावा है कि प्रस्तावित जांच से जुड़े अधिकारियों में भी इस बात को लेकर असहजता है कि जिस प्रकरण की जांच पहले ही वरिष्ठ/सक्षम स्तर के अधिकारियों द्वारा की जा चुकी है, उसी मामले की दोबारा जांच उनसे कराई जा रही है,सूत्रों के अनुसार अधिकारियों ने यह भी कहा कि इस प्रकरण में पहले ही जांच हो चुकी है और वे पूर्व जांच से नीचे के स्तर पर हैं,इसलिए दोबारा जांच की भूमिका स्पष्ट नहीं है,इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है,यदि यह बात सही है तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या कनिष्ठ स्तर के अधिकारियों की नई रिपोर्ट के आधार पर पूर्व में गठित उच्च स्तरीय जांच के निष्कर्षों को बदला जा सकता है? यदि पूर्व जांच में कोई गंभीर त्रुटि थी तो उस जांच को गलत ठहराने के लिए विधिवत आदेश, सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और स्पष्ट प्रक्रिया होनी चाहिए, केवल एक नई समिति गठित कर देने से पहले की जांच स्वतः गलत नहीं हो जाती।
मामला क्या है और 35.78 लाख रुपये का सवाल कहां से आया?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2019-20 में भैयाथान शाखा के अंतर्गत किसानों की फसल बीमा राशि के कथित फर्जी आहरण का मामला सामने आया, इसी मामले में जिला सूरजपुर प्रशासन द्वारा गठित जांच दल ने करीब 35.78 लाख रुपये की राशि से संबंधित अनियमितता का उल्लेख किया,उपलब्ध बैंक आदेश में यह भी दर्ज है कि जांच दल ने चार कर्मचारियों को इस राशि से जुड़ी अनियमितता के लिए दोषी पाया था,इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आधार ‘जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित अंबिकापुर,आदेश क्रमांक/स्थापना/2023-24/383, दिनांक 05.06.2023 है, इस आदेश में तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश प्रसाद कुशवाहा, लिपिक सूबेदार सिंह, संस्था प्रबंधक राम कुमार सिंह तथा भृत्य सुनील यादव के विरुद्ध की गई कार्रवाई का उल्लेख है,आदेश में कहा गया है कि जिला कलेक्टर द्वारा गठित जांच दल की रिपोर्ट के आधार पर संबंधित कर्मचारियों को निलंबित किया गया तथा थाना झिलमिली में एफआईआर दर्ज कराई गई, पुलिस प्रकरण में धोखाधड़ी सहित विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी, उपलब्ध समाचार सामग्री में थाना झिलमिली के अपराध क्रमांक 117/21 तथा संबंधित धाराओं का उल्लेख किया गया है, इसी समाचार सामग्री के अनुसार दो आरोपियों में सूबेदार सिंह और सुनील यादव की गिरफ्तारी हुई थी, जबकि तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश प्रसाद कुशवाहा के फरार होने की जानकारी सामने आई थी,बाद में पुलिस द्वारा कुशवाहा को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किए जाने और जेल भेजे जाने की खबर भी प्रकाशित हुई थी।
क्या नई जांच सिर्फ प्रक्रिया है या ‘री-एंट्री’ का रास्ता?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई जांच का वास्तविक उद्देश्य क्या है,क्या यह केवल कर्मचारी को उसका वैधानिक बचाव का अवसर देने के लिए है, या फिर पूर्व में सेवा से पृथक किए गए कर्मचारी की वापसी का रास्ता तैयार करने के लिए? दोनों परिस्थितियों में प्रक्रिया अलग होगी और बैंक को इसका स्पष्ट आधार बताना चाहिए, सूत्रों का दावा है कि नई टीम को ऐसी रिपोर्ट देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है जिससे संबंधित कर्मचारियों के पक्ष में रास्ता खुल सके और उन्हें दोबारा बैंक सेवा में प्रवेश मिल सके, कुछ सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि जांच की जानकारी बाहर न जाने देने के लिए अधिकारियों को निर्देशित किया गया है,इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और दैनिक घटती-घटना इन्हें तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करता,लेकिन यदि ऐसी कोई जांच वास्तव में गठित की गई है तो बैंक प्रबंधन को जांच आदेश सार्वजनिक करना चाहिए,जांच टीम में शामिल अधिकारियों के नाम,जांच का संदर्भ, जांच के प्रश्न,दस्तावेजों का आधार,समयसीमा और यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या नई जांच 5 जून 2023 के आदेश क्रमांक 383 तथा 23 जनवरी 2026 के प्रकरण क्रमांक 17/55(2)/2023 के संदर्भ में है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि नई जांच पुरानी जांच को निरस्त करने के लिए है या केवल प्रक्रिया पूरी करने के लिए।
दस्तावेज नंबर 4 : 23 जनवरी 2026 का संयुक्त पंजीयक आदेश
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ताजा और महत्वपूर्ण दस्तावेज ‘कार्यालय संयुक्त पंजीयक, सहकारी संस्थाएं, सरगुजा संभाग, अंबिकापुर क्र./संपर./ विधि/2026/51, दिनांक 23.01.2026, प्रकरण क्रमांक 17/55(2)/2023’ है, यह प्रकरण छत्तीसगढ़ सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 की धारा 55(2) के तहत प्रस्तुत किया गया था, इस आदेश में जगदीश प्रसाद कुशवाहा द्वारा जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित अंबिकापुर के आदेश क्रमांक/स्थापना/2023-24/383,दिनांक 05.06.2023 के विरुद्ध प्रस्तुत मामले का उल्लेख है, आदेश के अनुसार मामले में दोनों पक्षों को सुनवाई के अवसर दिए गए, दस्तावेजों और तर्कों का परीक्षण किया गया तथा पूर्व कार्यवाही से जुड़े बिंदुओं पर विचार किया गया, आदेश के अंतिम हिस्से में यह उल्लेख है कि जिला सहकारी केंद्रीय बैंक कर्मचारी सेवा नियम 1982 के प्रावधानों के अनुरूप निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए कर्मचारी को अपने बचाव का समुचित एवं पर्याप्त अवसर देकर विधिवत कार्रवाई की जा सकती है, दोनों पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने की बात भी आदेश में दर्ज है, यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है, उपलब्ध 23 जनवरी 2026 के आदेश को सीधे-सीधे ‘बहाली का आदेश’ मानना सही नहीं होगा, इसमें विधिवत प्रक्रिया और कर्मचारी को बचाव का अवसर देने की बात है,इसलिए बैंक को स्पष्ट करना होगा कि नई कार्रवाई 23 जनवरी 2026 के आदेश के किस निर्देश के अनुपालन में की जा रही है, यहीं से अब नई कवायद को लेकर सवाल उठ रहे हैं, यदि 23 जनवरी 2026 के आदेश के अनुपालन के लिए नई जांच आवश्यक थी तो बैंक को जांच का कानूनी आधार, दायरा, संदर्भ और उद्देश्य सार्वजनिक करना चाहिए,केवल आदेश का हवाला देकर किसी नई समिति से पूर्व जांच के निष्कर्षों को बदलने की कोशिश की जा रही है या नहीं, यह स्पष्ट होना चाहिए।
जांच, एफआईआर और कार्रवाई के बाद अब फिर सवाल क्यों?
जब 35.78 लाख रुपये के फसल बीमा प्रकरण में पहले ही विस्तृत जांच समिति गठित की गई थी और जांच के दौरान एक-एक साक्ष्य, दस्तावेज और वित्तीय अनियमितता को जांच प्रतिवेदन में दर्ज किया गया था,तभी मामला एफआईआर तक पहुंचा और आरोपित कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की स्थिति बनी,यदि उस समय संबंधित लोगों को लगता था कि वे दोषी नहीं हैं अथवा जांच में उनके साथ अन्याय हुआ है,तो उन्हें उसी समय अपनी बेगुनाही के पक्ष में सभी साक्ष्य प्रस्तुत करने और जांच के निष्कर्षों को चुनौती देने का पूरा अवसर था,अब सवाल यह है कि वर्षों बाद अचानक ऐसी कौन-सी नई परिस्थिति या नया साक्ष्य सामने आ गया है,जिसके आधार पर पहले से जांचे और कार्रवाई किए जा चुके प्रकरण को फिर से जांच के लिए खोला जा रहा है? क्या पूर्व जांच रिपोर्ट में कोई गंभीर त्रुटि साबित हुई है? क्या उस जांच को सक्षम प्राधिकारी ने निरस्त किया है? या फिर संबंधित आरोपितों को न्यायालय ने इस मामले में दोषमुक्त कर दिया है? यदि न्यायालय ने दोषमुक्त नहीं किया है और पूर्व जांच रिपोर्ट को भी विधिवत निरस्त नहीं किया गया है, तो फिर नई जांच का औचित्य क्या है? क्या केवल दोबारा जांच कर लेने से पहले की जांच में दर्ज निष्कर्ष और जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी? सबसे अहम सवाल यही है कि जिस समय एफआईआर हुई,विभागीय कार्रवाई हुई और सेवा समाप्ति तक की कार्रवाई पहुंची,उस समय अपनी बेगुनाही साबित करने का प्रयास क्यों नहीं किया गया? अब यदि नई जांच हो रही है,तो बैंक प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि नई जांच का आधार क्या है,नया साक्ष्य क्या है और क्या किसी न्यायालय ने संबंधित आरोपितों को इस प्रकरण में दोषमुक्त किया है? वरना यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं पुरानी जांच के निष्कर्षों को बदलकर फिर से ‘री-एंट्री’ का रास्ता तो तैयार नहीं किया जा रहा?
क्या पुरानी जांच को नई रिपोर्ट से बदला जा सकता है?
यदि किसी जांच के आधार पर विभागीय कार्रवाई हुई और बाद में उसमें कमी पाई गई,तो उस कमी को सक्षम प्राधिकारी के आदेश से स्पष्ट किया जाना चाहिए। केवल नई समिति बनाकर पुराने निष्कर्षों के विपरीत रिपोर्ट आने से पहले की कार्रवाई अपने आप समाप्त नहीं हो जाती,नई जांच में पुराने निष्कर्ष सही पाए जाएं तो उन्हें बरकरार रखना होगा। यदि नए दस्तावेज से अलग तथ्य सामने आते हैं तो उसका स्रोत और प्रमाण रिकॉर्ड पर होना चाहिए,और यदि पुरानी जांच प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण थी तो उस त्रुटि की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
भाग-2 में पढि़एः नई जांच की कथित कवायद के पीछे क्या है?
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के सीईओ श्रीकांत चंद्राकर की भूमिका पर उठते सवाल, भैयाथान और सूरजपुर शाखा प्रबंधकों को जांच की जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा,रिपोर्ट को लेकर लगाए जा रहे गंभीर आरोप, 35.78 लाख रुपये की राशि और किसानों के हित से जुड़े सवाल तथा यह बड़ा प्रश्न कि क्या नई जांच वास्तव में न्यायालयीन प्रक्रिया पूरी करने तक सीमित है या पुराने मामले में आरोपित कर्मचारियों की ‘री-एंट्री’ का रास्ता तैयार कर रही है।


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