


- घटती-घटना ने पहले किया खुलासा,पुलिस बाद में जागी…अब गैंगस्टर भी फरार,उसे पनाह देने के आरोपित भी लापता…
- छह दिन की चुप्पी,फिर एफआईआर…लेकिन तब तक वासेपुर का सजायाफ्ता गैंगस्टर पुलिस की पकड़ से दूर…
- अंबिकापुर में 13 साल तक छिपा रहा सजायाफ्ता गैंगस्टर? पुलिस की देरी ने खड़े किए कई बड़े सवाल…
- जब तक पुलिस जागी,खेल खत्म हो चुका था…सजायाफ्ता गैंगस्टर और उसे संरक्षण देने के आरोपित दोनों फरार…
- पहले खबर को नजरअंदाज किया, फिर एफआईआर लिखी…अब फरार गैंगस्टर और उसका नेटवर्क तलाश रही पुलिस…
- 13 साल तक शहर में रहा सजायाफ्ता,किसी को भनक नहीं…अब एफआईआर के बाद खुल रही हैं परतें
- पनाह देने वाला वैदुल नामक बस संचालक फरार,सजायाफ्ता गैंगस्टर भी गायब…पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती…
- खबर पहले आई,कार्रवाई बाद में हुई…क्या इसी देरी ने फरार करा दिया सजायाफ्ता गैंगस्टर?
- सिस्टम से ज्यादा तेज निकला गैंगस्टर? छह दिन बाद दर्ज हुई एफआईआर,अब पूरा नेटवर्क जांच के घेरे में…
-संवाददाता-
अंबिकापुर,08 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। झारखंड के धनबाद स्थित बहुचर्चित वासेपुर दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा प्राप्त फरार दोषी साबिर आलम के मामले ने अब केवल एक अपराधी की फरारी का रूप नहीं रखा है,बल्कि इसने सरगुजा पुलिस की कार्यप्रणाली,सूचना तंत्र,अंतरराज्यीय समन्वय और कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं,सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पुलिस की एफआईआर पर भरोसा किया जाए तो वर्ष 2013 से एक सजायाफ्ता और भगोड़ा अपराधी अंबिकापुर में पहचान छिपाकर रह रहा था, कारोबार कर रहा था और स्थानीय स्तर पर अपना नेटवर्क तैयार कर चुका था,फिर भी किसी एजेंसी को इसकी भनक तक नहीं लगी।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि दैनिक घटती-घटना ने इस मामले का खुलासा सबसे पहले 1 जुलाई 2026 के अंक में किया था,लेकिन पुलिस ने उस समय कोई संज्ञान नहीं लिया। इसके बाद 5 जुलाई को दैनिक घटती-घटना ने नए तथ्यों के साथ दूसरी बार मामला प्रमुखता से प्रकाशित किया,तब तक कई अन्य मीडिया संस्थानों ने भी खबर प्रकाशित कर दी थी। इसके बाद पुलिस ने अपराध क्रमांक 454/2026 दर्ज किया, लेकिन एफआईआर में यह उल्लेख किया कि जानकारी समाचार प्रकाशित होने पर मिली, यही वह बिंदु है जिस पर अब पत्रकारिता और पुलिस कार्रवाई दोनों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
राजहंस नाम पर भी उठे सवाल,जूदेव परिवार की प्रतिष्ठा को पहुंची ठेस की चर्चा- स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि जिन आरोपियों पर पुलिस ने कार्रवाई शुरू की है, वे लंबे समय से ‘राजहंस’ नाम से बसों का संचालन कर रहे थे, बताया जाता है कि ‘राजहंस’नाम मूल रूप से जशपुर के जूदेव राजपरिवार से जुड़ी एक प्रतिष्ठित ट्रांसपोर्ट पहचान रही है,ऐसे में अब यह सवाल उठने लगा है कि यदि किसी व्यक्ति या समूह ने इस नाम का उपयोग कर अपने व्यवसाय का संचालन किया और बाद में गंभीर आपराधिक मामलों में उसका नाम सामने आया,तो इससे उस प्रतिष्ठित नाम और उसकी साख पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है,दैनिक घटती-घटना ने पूर्व में भी समाचार प्रकाशित कर यह मुद्दा उठाया था कि कुछ लोग राजहंस नाम का उपयोग कर उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहे हैं,अब ताजा घटनाक्रम के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि प्रतिष्ठित संस्थाओं और परिवारों के नाम का दुरुपयोग रोकने के लिए भी प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
सबसे पहले खबर आई, लेकिन पुलिस नहीं जागी…
29 जून 2026 को हुई घटना की जानकारी सबसे पहले दैनिक घटती-घटना तक पहुंची, अखबार ने 1 जुलाई को पूरे घटनाक्रम को प्रमुखता से प्रकाशित करते हुए यह सवाल उठाया कि झारखंड के चर्चित वासेपुर प्रकरण का सजायाफ्ता अपराधी अंबिकापुर में कैसे रह रहा है और स्थानीय स्तर पर उसे कौन संरक्षण दे रहा है,उधर, सूत्रों के अनुसार झारखंड पुलिस भी इस मामले में स्थानीय पुलिस से संपर्क कर रही थी और आवश्यक कार्रवाई के लिए आवेदन एवं जानकारी साझा कर रही थी, इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई,परिणाम यह हुआ कि जब तक पुलिस सक्रिय होती, तब तक घटनाक्रम पूरी तरह बदल चुका था।
एफआईआर ने स्वयं स्वीकार किया—साबिर आलम वर्षों से अंबिकापुर में था-थाना अंबिकापुर में दर्ज अपराध क्रमांक 454/2026 के अनुसार पुलिस जांच में यह तथ्य सामने आने का दावा किया गया कि झारखंड के धनबाद निवासी साबिर आलम वर्ष 2001 के चर्चित दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास का दोषी है,उच्च न्यायालय द्वारा भगोड़ा घोषित किया जा चुका है और उसकी संपत्ति कुर्क करने के आदेश भी जारी हुए थे, एफआईआर में यह भी दर्ज है कि वर्ष 2013 से वह मोमिनपुरा,अंबिकापुर में पहचान छिपाकर रह रहा था,यदि यह तथ्य सही है तो यह केवल एक व्यक्ति के फरार रहने का मामला नहीं बल्कि पूरे सत्यापन तंत्र की विफलता का विषय बन जाता है।
बैतूल खान के खिलाफ एफआईआर, लेकिन बाकी नाम ‘अज्ञात’ क्यों?– एफआईआर में बस संचालक बैतूल खान का नाम दर्ज किया गया है, जबकि ‘अन्य अज्ञात सहयोगी’ लिखा गया है, दूसरी ओर पुलिस के अधिकृत सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जांच में कई अन्य व्यक्तियों से भी पूछताछ की गई है,स्थानीय स्तर पर जिन नामों की चर्चा हो रही है उनमें जावेद आलम सहित कई अन्य लोगों का उल्लेख किया जा रहा है,यदि पुलिस के पास अन्य लोगों के संबंध में भी तथ्य और साक्ष्य उपलब्ध हैं तो फिर एफआईआर में केवल एक नाम और बाकी‘अज्ञात’ क्यों लिखा गया? यह प्रश्न भी अब चर्चा का विषय बन गया है।
स्थानीय सूत्रों का दावासिर्फ शरण नहीं,वर्षों में खड़ा हुआ आर्थिक नेटवर्क
मामले से जुड़े स्थानीय सूत्रों का दावा है कि साबिर आलम अकेला नहीं था,उसके साथ जुड़े कुछ लोगों ने वर्षों में परिवहन, बस संचालन, एंबुलेंस संचालन,अचल संपत्ति और अन्य व्यवसायों में भी प्रभाव बढ़ाया,कुछ सूत्रों का यह भी कहना है कि झारखंड के एक अन्य वांछित अपराधी साकिब अफजल उर्फ‘नेता’ का नाम भी स्थानीय चर्चाओं में सामने आता रहा है,हालांकि इस संबंध में पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है और इसकी जांच होना बाकी है।
धनबाद पुलिस आरोपी तक पहुंच गई,लेकिन फिर क्या हुआ?
जानकारी के अनुसार झारखंड पुलिस को विश्वसनीय सूचना मिली कि सजायाफ्ता आरोपी अंबिकापुर में रह रहा है,टीम ने कार्रवाई की,आरोपी पुलिस के कब्जे में भी आ गया, लेकिन इसी दौरान स्थानीय स्तर पर विरोध हुआ और आरोपी पुलिस की गिरफ्त से निकल गया, इसके बाद संयुक्त सर्च ऑपरेशन चला, लेकिन तब तक आरोपी गायब हो चुका था।
आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए बस परमिट निरस्त करने और संपत्ति कुर्क करने की उठी मांग…
मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद अब स्थानीय स्तर पर यह मांग भी जोर पकड़ने लगी है कि केवल अपराध दर्ज कर लेने से आरोपियों तक पहुंचना संभव नहीं होगा, लोगों का कहना है कि यदि नामजद आरोपी और उनके सहयोगी लगातार फरार हैं, तो उनके आर्थिक और व्यावसायिक संसाधनों पर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए,मांग उठ रही है कि जिन बसों और परिवहन व्यवसाय का संचालन आरोपियों या उनसे जुड़े लोगों द्वारा किया जा रहा है,उनके परमिट की वैधानिक समीक्षा कर आवश्यक होने पर उन्हें निरस्त किया जाए,ताकि फरारी के दौरान आर्थिक गतिविधियां जारी न रह सकें, साथ ही,यदि जांच और न्यायालयीन प्रक्रिया के दौरान विधिक आधार बनता है, तो झारखंड की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी आरोपियों की संपत्तियों की कुर्की जैसी वैधानिक कार्रवाई पर विचार किया जाए,स्थानीय लोगों का मानना है कि आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश और कानूनी दबाव बढ़ने से फरार आरोपियों के सामने आत्मसमर्पण या गिरफ्तारी से बच पाना कठिन हो सकता है,हालांकि ऐसी किसी भी कार्रवाई का अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय और संबंधित वैधानिक प्राधिकारियों द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों एवं कानून के प्रावधानों के अनुसार ही लिया जा सकता है।
5 जुलाई तक भी नहीं लिया संज्ञान,फिर दूसरे अखबार के बाद दर्ज हुई एफआईआर
दैनिक घटती-घटना ने 5 जुलाई को दूसरी बार विस्तृत समाचार प्रकाशित किया, इस बीच अन्य मीडिया संस्थानों ने भी समाचार प्रकाशित कर दिया था, इसके बाद अंबिकापुर पुलिस ने अपराध दर्ज किया,लेकिन एफआईआर में यह उल्लेख किया गया कि समाचार प्रकाशित होने पर जांच की गई और अपराध दर्ज किया गया,यहीं से नया विवाद शुरू होता है,यदि 1 जुलाई को प्रकाशित समाचार पर कार्रवाई होती,यदि झारखंड पुलिस की सूचना पर समय रहते स्थानीय पुलिस सक्रिय होती, तो क्या सजायाफ्ता अपराधी पुलिस के हाथ से निकल पाता? क्या उसे भगाने वालों तक भी तत्काल पहुंचा जा सकता था? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
क्या केवल अपराधदर्ज कर देने से पूरी होगी जिम्मेदारी?
अब लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इतनी गंभीर घटना केवल एफआईआर दर्ज कर देने से समाप्त मानी जाएगी? एक ऐसा व्यक्ति जो न्यायालय से आजीवन कारावास प्राप्त कर चुका हो, वर्षों तक शहर में रह सके, स्थानीय स्तर पर अपना नेटवर्क बना सके और फिर पुलिस कार्रवाई के दौरान फरार भी हो जाए, क्या इसे सामान्य घटना माना जा सकता है? जनता जानना चाहती है,यदि इतने बड़े अपराधी को शहर में रहने दिया गया तो जिम्मेदारी किसकी थी? यदि समय रहते कार्रवाई होती तो क्या आरोपी भाग पाता? क्या पुलिस अब भी उसे खोज पाएगी? या फिर यह मामला भी केवल कागजों में दर्ज होकर धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाएगा?
अब स्थिति और भी गंभीर…
आज स्थिति यह है कि सजायाफ्ता गैंगस्टर साबिर आलम फरार है, एफआईआर में नामजद बैतूल खान भी फरार बताया जा रहा है,जिन अन्य लोगों की भूमिका की जांच की चर्चा है, उनमें से भी कई लोग कथित रूप से उपलब्ध नहीं हैं,यानी पुलिस के सामने अब केवल एक नहीं बल्कि कई फरार व्यक्तियों को खोजने की चुनौती है।
अब जांच का दायरा केवल फरारी नहीं होना चाहिए…
कानूनी जानकारों का मानना है कि अब जांच केवल आरोपी को पकड़ने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए,यह भी जांच होना आवश्यक है कि उसे शरण किसने दी? आर्थिक सहायता किसने दी? पहचान छिपाने में किसने मदद की? स्थानीय स्तर पर उसका नेटवर्क कैसे बना? यदि पुलिस कार्रवाई में बाधा पहुंची तो उसमें कौन-कौन शामिल थे? इतने वर्षों तक स्थानीय सत्यापन व्यवस्था उसे क्यों नहीं पकड़ सकी?
जनता उत्तर चाहती है,केवलकार्रवाई का आश्वासन नहीं…
इस पूरे मामले ने पुलिस व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं यदि समय पर कार्रवाई होती तो शायद आज सजायाफ्ता अपराधी पुलिस की गिरफ्त में होता और उसे कथित रूप से फरार कराने वाले भी कानून के शिकंजे में होते,अब जबकि एफआईआर दर्ज हो चुकी है, जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रहती है या पूरे नेटवर्क की तह तक जाकर यह स्पष्ट करती है कि आखिर एक सजायाफ्ता गैंगस्टर वर्षों तक अंबिकापुर में कैसे रहा, किसके संरक्षण में रहा और पुलिस की आंखों के सामने से आखिर कैसे निकल गया।
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