- कोरिया से बलरामपुर तक ‘सरकारी जोड़ी’! तबादला सूची ने फिर खड़े किए ‘सेटिंग’ के सवाल
- तीन साल बाद बदली कुर्सी…लेकिन नहीं बदले साथी! कलेक्टर के बाद अब जिला पंचायत सीईओ भी पहुंचे उसी जिले में…
- तबादला या ‘टीम ट्रांसफर’? कोरिया के दो बड़े अधिकारी अब फिर एक ही जिले में आमने-सामने…
- तबादला नीति या ‘नेटवर्क नीति’? कलेक्टर पहले,सीईओ पीछे-पीछे…प्रशासनिक गलियारों में तेज हुई चर्चा…
- सरकारी तबादले का नया गणित! कोरिया की चर्चित जोड़ी अब बलरामपुर में, उठे कई सवाल…
- आशुतोष चतुर्वेदी का बलरामपुर स्थानांतरण बना चर्चा का विषय,पूर्व कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी पहले से हैं वहीं पदस्थ, प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठे सवाल, सरकार से स्पष्टता की मांग…
- तबादला सूची ने खड़े किए कई सवाल,क्या यह महज संयोग है या फिर प्रशासनिक व्यवस्था पर उठती धारणाओं को बल देने वाला एक और उदाहरण?
-रवि सिंह-
कोरिया,08 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा जारी प्रशासनिक तबादला सूची में कोरिया जिले के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) जिला पंचायत आशुतोष चतुर्वेदी का स्थानांतरण बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में जिला पंचायत सीईओ के पद पर कर दिया गया है,पहली नजर में यह एक सामान्य प्रशासनिक आदेश प्रतीत होता है, लेकिन जैसे-जैसे इस तबादले की पृष्ठभूमि सामने आती है,वैसे-वैसे कई सवाल प्रशासनिक व्यवस्था,तबादला नीति और सरकारी पारदर्शिता को लेकर खड़े होने लगे हैं। सबसे अधिक चर्चा इस बात की हो रही है कि कुछ समय पहले ही कोरिया जिले की तत्कालीन कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी का स्थानांतरण भी बलरामपुर-रामानुजगंज जिले में कलेक्टर के रूप में हुआ था,अब उनके साथ लंबे समय तक कार्य कर चुके जिला पंचायत सीईओ आशुतोष चतुर्वेदी का भी उसी जिले में स्थानांतरण होने से प्रशासनिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
तीन साल तीन महीने का लंबा कार्यकाल,फिर एक साथ नई मंजिल- कोरिया जिले में आशुतोष चतुर्वेदी का कार्यकाल सामान्य नहीं माना जाता,उन्होंने लगभग तीन वर्ष तीन माह तक जिला पंचायत सीईओ के रूप में कार्य किया,यह अवधि जिले में पदस्थ रहे जिला पंचायत सीईओ के सबसे लंबे कार्यकालों में से एक मानी जा रही है, सरकार ने इस बार तबादला सूची जारी करते हुए ऐसे अधिकारियों को भी बदला,जो लंबे समय से एक ही जिले में पदस्थ थे, इसी क्रम में आशुतोष चतुर्वेदी का नाम भी सूची में शामिल हुआ,लेकिन चर्चा केवल उनके स्थानांतरण की नहीं है, बल्कि उस जिले की है जहां उन्हें भेजा गया है।
तबादला सूची आते ही क्यों उठते हैं सवाल?-छत्तीसगढ़ ही नहीं,लगभग हर राज्य में तबादला सूची जारी होते ही चर्चाओं का दौर शुरू हो जाता है,कोई कहता है योग्यता चली, कोई कहता है सिफारिश चली,तो कोई कहता है जिसकी पहुंच, उसकी पसंद की पोस्टिंग,यह धारणा कितनी सही है और कितनी गलत, इसका निर्णय तथ्यों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जा सकता है,लेकिन यदि आम जनता के बीच ऐसी धारणाएं लगातार बनती जा रही हैं,तो यह शासन व्यवस्था के लिए भी आत्ममंथन का विषय है।
एक कर्मचारी वर्षों प्रतीक्षा करता है…- प्रदेश में हजारों कर्मचारी ऐसे हैं जो वर्षों से अपने गृह जिले में स्थानांतरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं,शिक्षक आवेदन देते हैं, स्वास्थ्य कर्मचारी गुहार लगाते हैं,पुलिसकर्मी पारिवारिक कारण बताते हैं,लेकिन उनका स्थानांतरण वर्षों तक नहीं हो पाता, दूसरी ओर जब कुछ अधिकारियों के तबादले ऐसे दिखाई देते हैं कि वे अपेक्षाकृत सहजता से मनचाहे या परिचित कार्यक्षेत्र में पहुंच जाते हैं, तब आम कर्मचारी के मन में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं, यह प्रश्न केवल किसी एक अधिकारी से नहीं, बल्कि पूरी तबादला व्यवस्था से जुड़े होते हैं।
प्रशासन में पारदर्शिता केवल आदेश से नहीं आती…
सरकार चाहे किसी भी दल की हो,वह सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है, लेकिन पारदर्शिता केवल नियम बनाने से नहीं आती,पारदर्शिता तब आती है जब जनता को यह विश्वास हो कि हर निर्णय निष्पक्ष तरीके से लिया गया है, यदि हर तबादला सूची के बाद लोगों के बीच चर्चा ‘किसकी पहुंच ज्यादा थी’ पर होने लगे, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की छवि के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता।
जनधारणा भी लोकतंत्र का हिस्सा है…
लोकतंत्र केवल कानून से नहीं चलता, यह जनता के विश्वास से भी चलता है,कई बार कोई निर्णय पूरी तरह नियमों के अनुसार होता है, लेकिन यदि उसकी प्रस्तुति या परिस्थितियां ऐसी हों कि लोगों के मन में संदेह पैदा हो जाए, तो सरकार को उस संदेह को दूर करने की भी जिम्मेदारी निभानी चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं होता, निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक होता है।
संयोग या चर्चा का विषय?
प्रशासनिक हलकों में सबसे ज्यादा यही प्रश्न पूछा जा रहा है कि क्या यह केवल संयोग है कि कोरिया जिले में वर्षों तक साथ काम करने वाले दो वरिष्ठ अधिकारी अब एक बार फिर एक ही जिले में साथ काम करेंगे? सरकारी सेवा में ऐसे उदाहरण पहले भी देखने को मिले हैं,जहां अधिकारी अलग-अलग जिलों में पुनः साथ पदस्थ हुए हैं, इसलिए केवल इस आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा,फिर भी जनमानस में उठ रहे सवालों ने इस स्थानांतरण को सामान्य प्रशासनिक आदेश से आगे चर्चा का विषय बना दिया है,चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही चर्चा सुनाई दे रही है क्या यह सिर्फ संयोग है,या फिर प्रशासनिक समन्वय की प्राथमिकता?
कोरिया में कैसा रहा कार्यकाल?
आशुतोष चतुर्वेदी के कार्यकाल में जिला पंचायत के माध्यम से अनेक विकास योजनाएं संचालित हुईं,पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की योजनाओं का क्रियान्वयन,विभिन्न निर्माण कार्य, मनरेगा, आजीविका मिशन तथा अन्य ग्रामीण विकास योजनाएं उनके कार्यकाल में संचालित होती रहीं,लेकिन दूसरी ओर,उनके कार्यकाल के दौरान जिला खनिज न्यास मद के उपयोग,विभिन्न निर्माण कार्यों की प्राथमिकता,खर्च की पारदर्शिता तथा योजनाओं के चयन को लेकर समय-समय पर राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और मीडिया द्वारा सवाल भी उठाए गए, हालांकि इन विषयों पर सार्वजनिक स्तर पर अनेक आरोप-प्रत्यारोप हुए, लेकिन किसी सक्षम न्यायिक या विभागीय प्राधिकारी द्वारा इन आरोपों को अंतिम रूप से सिद्ध किए जाने की आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
क्या तबादला नीति और अधिक पारदर्शी हो सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार प्रत्येक स्थानांतरण के पीछे प्रशासनिक आवश्यकता,रिक्त पद,कार्यकाल तथा चयन के प्रमुख कारणों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे,तो अनावश्यक चर्चाओं पर काफी हद तक विराम लगाया जा सकता है, इससे कर्मचारियों और आम जनता दोनों का विश्वास बढ़ेगा।
प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखना भी जरूरी…
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बिना ठोस साक्ष्यों के किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत आरोप लगाना उचित नहीं है,सरकारी स्थानांतरण शासन का प्रशासनिक अधिकार है, यदि किसी स्थानांतरण में किसी प्रकार की अनियमितता का आरोप लगाया जाता है तो उसके समर्थन में तथ्य,दस्तावेज और सक्षम जांच आवश्यक होती है,लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही आवश्यक है कि सरकार ऐसे निर्णयों में अधिकतम पारदर्शिता अपनाए, जिससे किसी भी प्रकार की आशंका या अफवाह को स्थान न मिले।
जनता पूछ रही है…
कोरिया जिले में अब लोगों के बीच कई सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं क्या लंबे समय तक साथ काम करने वाले दो वरिष्ठ अधिकारियों का एक ही नए जिले में पहुंचना महज संयोग है? क्या तबादला नीति में प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता दी गई? क्या भविष्य में तबादला प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा? इन सवालों के उत्तर समय और शासन की कार्यप्रणाली ही दे सकेगी।
व्यंग्य की नज़र से…
सरकारी दफ्तरों में इन दिनों एक नई कहावत मजाक में सुनाई दे रही है तबादला वहीं होता है, जहां फाइल नहीं… किस्मत पहले पहुंच जाती है,तो कोई मुस्कुराकर कह देता है कुछ लोग जिले बदलते हैं…कुछ लोग अपनी टीम के साथ जिला बदल लेते हैं, यह व्यंग्य है,लेकिन व्यंग्य वहीं जन्म लेता है जहां व्यवस्था और जनधारणा के बीच दूरी बढ़ने लगती है।
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