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कोरिया@ कोरिया में ‘सेटिंग मॉडल’ का कमाल, 400 किमी दूर से आया अतिरिक्त प्रभार

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  • योग्यता नहीं, जुगाड़ बना नियुक्ति का नया पैमाना?
  • नियम फाइलों में कैद, प्रभार पहुंचा 400 किलोमीटर दूर से
  • कोरिया में प्रशासनिक खेती: फसल जनता की, लाभ सेटिंग का!
  • जहां सेटिंग मजबूत, वहीं अतिरिक्त प्रभार की गारंटी!
  • कोरिया में प्रतिभा का अकाल या फिर सेटिंग का कमाल?
  • जब व्यवस्था ही व्यवस्था को खाने लगे… तब जनता किससे उम्मीद करे?
  • प्रभार एक्सप्रेस: कवर्धा से कोरिया तक 400 किलोमीटर का प्रशासनिक सफर
  • प्रशासनिक नूरा-कुश्ती का नया अध्याय, जनता फिर बनी दर्शक
  • कोरिया में नियम नहीं, रिश्ते तय कर रहे हैं जिम्मेदारियां?
  • कोरिया में प्रशासनिक ‘सेटिंग’ का ऐसा खेल, जहां नियम फाइलों में और प्रभार रिश्तों में तय होते हैं?


रवि सिंह
कोरिया,03 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिले में इन दिनों प्रशासनिक व्यवस्था किसी सरकारी कार्यालय से कम और शतरंज के ऐसे अखाड़े से ज्यादा दिखाई दे रही है, जहां मोहरे जनता नहीं, बल्कि अधिकारी चल रहे हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि यहां शह-मात नियमों से नहीं,बल्कि ‘सेटिंग’ से होती है, कहावत है कि ‘जब बाड़ ही खेत खाने लगे तो किसान किससे न्याय मांगे?’ कोरिया जिले के हालात देखकर लगता है कि अब इस कहावत का संशोधित संस्करण तैयार करना पड़ेगा— ‘जब चौकीदार ही चाबी बांटने लगे तो ताला लगाने का क्या फायदा?’
प्रतिभा खोज प्रतियोगिता सिर्फ कोरिया के लिए?- अब कुछ भोले-भाले सवाल हैं क्या पूरे सरगुजा संभाग में कोई अधिकारी उपलब्ध नहीं था? क्या सूरजपुर,बलरामपुर,एमसीबी या सरगुजा में योग्य अधिकारी समाप्त हो गए? या फिर प्रतिभा की असली खान केवल 400 किलोमीटर दूर ही मिली? यदि यही व्यवस्था है तो फिर अगले आदेश में दिल्ली, भोपाल या जयपुर से भी किसी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देकर देख लिया जाए, प्रतिभा की कोई सीमा नहीं होती।
कोरिया का नया प्रशासनिक फार्मूला- यहां योग्यता का गणित बड़ा सरल है-
योग्यता + सेटिंग = अतिरिक्त प्रभार
दूरी ् नियम = प्रशासनिक सुविधा
जनहित – पारदर्शिता = व्यवस्था सफल

किसान तो बस तमाशा देख रहा है- उधर किसान खेत में खड़ा सोच रहा है-
खाद महंगी…बीज महंगा…सिंचाई अधूरी…योजनाएं फाइलों में… और जिन अधिकारियों से उम्मीद थी कि वे व्यवस्था संभालेंगे, वे खुद अतिरिक्त प्रभार, तबादलों और समीकरणों की खेती में व्यस्त हैं, किसान को अब समझ नहीं आ रहा कि फसल बचाए या व्यवस्था।
अंतिम व्यंग्य…कोरिया जिले की जनता को अब गर्व होना चाहिए…
यह जिला शायद देश का पहला ऐसा जिला बनता जा रहा है जहां अधिकारी स्थानीय नहीं, ‘आयातित’ मिलते हैं,निर्णय प्रशासनिक कम और राजनीतिक ज्यादा दिखाई देते हैं, नियम पुस्तकों में रहते हैं और व्यवस्थाएं फोन पर तय होती हैं, फिलहाल जनता निश्चिंत रहे…कोरिया को एक और ‘अत्यंत प्रतिभाशाली’ अतिरिक्त अधिकारी मिल गया है, अब देखना केवल इतना है कि इस अतिरिक्त प्रतिभा से जिले का उद्यान विकसित होगा या फिर केवल ‘सेटिंग का बगीचा’ और हरा-भरा होगा।
व्यंग्य का पंच
‘कोरिया में अब अधिकारी नहीं भेजे जाते, ‘प्रभार’ भेजा जाता है…और प्रभार भी वहीं जाता है,जहां सेटिंग का पौधा सबसे हरा दिखाई देता है। ‘
पहला अंक : दोस्ती,दूरी और दरबार
कहानी शुरू होती है एक ऐसे जिला अधिकारी से, जिनकी पहचान कभी जिले के तत्कालीन मुखिया के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार के रूप में होती थी, दोनों की जोड़ी ऐसी थी कि फाइलें कम और तालमेल ज्यादा चलता था, लेकिन कहते हैं न, राजनीति हो या नौकरशाही, यहां स्थायी केवल स्वार्थ होता है, एक दिन ऐसा आया कि दोस्ती की मिठास में खटास घुल गई, फिर क्या था, तबादले की फाइल चली और साहब ने नया जिला चुन लिया, पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
दूसरा अंक : भारमुक्ति का महाभारत
तबादला हो गया, लेकिन भारमुक्ति नहीं हुई, मानो कार्यालय नहीं, पुश्तैनी जमीन का बंटवारा चल रहा हो, आखिरकार अधिकारी महोदय सीधे माननीय उच्च न्यायालय की शरण में पहुंचे, न्यायालय ने आदेश दिया कि भाई साहब को तत्काल कार्यमुक्त किया जाए, फिर क्या था… साहब आदेश की प्रति लेकर ऐसे लौटे जैसे कोई योद्धा युद्ध जीतकर आया हो, कार्यालय पहुंचे, आदेश दिखाया, कार्यमुक्त हुए और छह महीने पहले मिले नए जिले में जाकर विधिवत आमद भी दे दी, जनता ने राहत की सांस ली कि चलिए, अब यह अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन जनता प्रशासन को अभी जानती कहां थी…
तीसरा अंकः मुखिया बदला, पटकथा वही रही-
इसी बीच जिले के मुखिया का भी तबादला हो गया, वही मुखिया, जिनके कार्यकाल में पुरस्कारों की बरसात होती रही, जिनके हर कार्यक्रम में उपलब्धियों के पुल बांधे गए, लेकिन यदि उन्हीं उपलब्धियों और उनके कार्यकाल की भर्तियों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो शायद कई पुरस्कारों की चमक फीकी पड़ जाए, आज भी कई मामले ऐसे हैं, जिनमें भ्रष्टाचार के आरोप सत्यापन तक पहुंच चुके हैं, लेकिन फाइलें ‘सुलहनामा’ और ‘विचाराधीन’ की नींद सो रही हैं।
चौथा अंकः सेटिंग एक्सप्रेस, 400 किलोमीटर नॉन-स्टॉप-
अब कहानी में असली ट्विस्ट आता है, जिले में नई फील्डिंग सजाई गई, चर्चाओं के अनुसार, जिले के एक प्रभावशाली अधिकारी और कोयला चोरी की चर्चाओं में रहने वाले एक युवा नेता की सक्रियता के बीच ऐसा समीकरण बना कि प्रशासन ने प्रतिभा की खोज सीधे कवर्धा में जाकर पूरी की, और देखते ही देखते लगभग 400 किलोमीटर दूर बैठे अधिकारी को कोरिया जिले का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया, आदेश जारी हुआ…साहब आए… सीधे कुर्सी संभाली…और जनता सोचती रह गई— ‘क्या कोरिया में अधिकारी विलुप्त प्रजाति घोषित हो चुके हैं?’ 23 जून 2026 के आदेश के अनुसार कवर्धा के सहायक संचालक उद्यान विनय कुमार त्रिपाठी को कोरिया जिले का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।


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