



सरकारी सड़क नहीं बनी…अब ग्रामीण खुद बनाएंगे रास्ता!
- रपटा बना, सड़क नहीं…अब चंदे से चलेगा विकास
- 15 लाख खर्च, फिर भी दलदल में विकास…अब जनता ने संभाली जिम्मेदारी
- सरकार ने बनाया पुल, सड़क के लिए जनता से मांगा वक्त… अब ग्रामीण मांग रहे चंदा
- जब व्यवस्था हार गई… तब गांव ने उठाई फावड़ा और चंदे की थैली
- रपटा तक पहुंचने को चंदा! विकास की यह कैसी तस्वीर?
- पुल सरकारी, सड़क जनसहयोग से… गोबरी रपटा बना व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक
- जनता पूछ रही—कर भी दें,चंदा भी दें… फिर सरकार किसलिए?
- ‘घटती-घटना’ की खबरों, कलेक्टर के संज्ञान और निरीक्षण के बाद बना रपटा, लेकिन एप्रोच रोड अधूरी छोड़ने से बरसात में फिर ठप हुआ आवागमन, अब ग्रामीण खुद जुटा रहे स्टोन डस्ट के लिए सहयोग राशि
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,03 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। ‘गोबरी नदी पर अब सिर्फ रपटा नहीं बना है, बल्कि सरकारी व्यवस्था और जनता के भरोसे के बीच भी एक गहरी खाई बन गई है,फर्क सिर्फ इतना है कि उस खाई पर पुल बनाने के लिए भी अब ग्रामीणों को चंदा करना पड़ रहा है,गोबरी नदी पर लगभग 15 लाख रुपये की लागत से निर्मित स्थायी रपटा पुल एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है, यह चर्चा किसी नई उपलब्धि की नहीं, बल्कि अधूरे निर्माण और प्रशासनिक लापरवाही की है, जिस रपटा पुल को क्षेत्रवासियों की महीनो पुरानी समस्या का समाधान बताया गया था,वह आज भी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर पा रहा है,कारण वही पुराना है—रपटा के दोनों ओर लगभग 300-300 मीटर तक एप्रोच रोड का अधूरा निर्माण। लेकिन अब इस मामले में नया और बेहद चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है,प्रशासन और संबंधित विभाग से निराश ग्रामीणों ने स्वयं आगे आकर सड़क को चलने योग्य बनाने का निर्णय लिया है,गांव के लोग अब घर-घर जाकर चंदा एकत्रित कर रहे हैं ताकि स्टोन डस्ट, मुरुम अथवा अन्य आवश्यक सामग्री खरीदकर रपटा के दोनों ओर के दलदली मार्ग को उपयोग योग्य बनाया जा सके, ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकार और विभाग उनकी समस्या नहीं सुन रहे हैं तो उन्हें अपनी परेशानी का समाधान स्वयं करना पड़ेगा।
‘घटती-घटना’ की मुहिम के बाद हरकत में आया था प्रशासन
दैनिक ‘घटती-घटना’ ने पिछले कई महीनों से गोबरी नदी पर अधूरे रपटा निर्माण और वैकल्पिक मार्ग की समस्या को लगातार प्रमुखता से प्रकाशित किया,समाचारों में यह सवाल उठाया गया था कि यदि रपटा के दोनों ओर मजबूत संपर्क मार्ग नहीं बनाया गया तो लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी निर्माण आम जनता के किसी काम का नहीं रहेगा,लगातार प्रकाशित खबरों के बाद जिला कलेक्टर ने मामले का संज्ञान लिया,अधिकारियों को स्थल निरीक्षण के निर्देश दिए गए और निर्माण कार्य में तेजी आई, परिणामस्वरूप रपटा पुल का निर्माण पूरा कर दिया गया, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा—दोनों ओर मजबूत एप्रोच रोड—आज भी अधूरा छोड़ दिया गया।
पहली बारिश में खुल गई निर्माण की हकीकत
बरसात शुरू होते ही रपटा के दोनों ओर डाली गई कच्ची मिट्टी दलदल में बदल गई, सड़क पर न तो जीएसबी डाली गई, न डब्ल्यूएमएम और न ही स्टोन डस्ट का उपयोग किया गया, परिणाम यह हुआ कि पहली ही बारिश में सड़क पूरी तरह कीचड़ में तब्दील हो गई, दोपहिया वाहन फिसल रहे हैं, चारपहिया वाहन मिट्टी में धंस रहे हैं और पैदल चलना भी जोखिम भरा हो गया है, कई ग्रामीणों ने बताया कि रपटा बनने के बावजूद वे पुराने वैकल्पिक रास्तों का उपयोग करने को मजबूर हैं क्योंकि पुल तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
अब जनता खुद बनाएगी रास्ता
ग्रामीणों ने बताया कि प्रशासन से कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ, जनप्रतिनिधियों ने भी मांग उठाई,लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई,अब लोगों ने स्वयं पहल करने का निर्णय लिया है,गांव-गांव और घर-घर जाकर चंदा एकत्रित किया जा रहा है ताकि स्टोन डस्ट या अन्य मिश्रण डालकर कम से कम बरसात के मौसम में रास्ते को चलने योग्य बनाया जा सके,ग्रामीणों का कहना है कि यह चंदा किसी विकास कार्य के लिए नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन को बचाने के लिए किया जा रहा है,बच्चों को स्कूल जाना है, किसानों को खेतों तक पहुंचना है,मरीजों को अस्पताल ले जाना है और महिलाओं को बाजार तक आना-जाना है, ऐसे में यदि सरकार सड़क नहीं बनाएगी तो जनता स्वयं अपनी राह बनाएगी।
यह केवल सड़क नहीं,व्यवस्था पर सवाल है…
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य तकनीकी रूप से पूरा नहीं था तो उसे पूर्ण कैसे घोषित कर दिया गया? यदि एप्रोच रोड तैयार नहीं थी तो भुगतान किस आधार पर किया गया? क्या गुणवत्ता परीक्षण हुआ था? क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके पर जाकर देखा कि पहली बारिश में सड़क की क्या स्थिति होगी? लोगों का कहना है कि पुल का निर्माण कर फोटो खिंचवा लेना आसान है,लेकिन उसे वास्तव में उपयोगी बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
जनप्रतिनिधि ने भी उठाई थी मांग…
जनपद पंचायत भैयाथान सदस्य एवं सहकारिता एवं उद्योग विकास समिति के सभापति राजकुमार गुप्ता ने भी जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर दोनों ओर मजबूत एप्रोच रोड निर्माण की मांग की थी,उन्होंने कहा था कि किसान, छात्र, महिलाएं और आम नागरिक प्रतिदिन परेशान हो रहे हैं तथा बरसात के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाएगी,इसके बावजूद आज तक स्थायी समाधान सामने नहीं आ सका।
ग्रामीणों का सवाल-जब सड़क हमें ही बनानी थी…तो 15 लाख रुपये किसलिए खर्च हुए?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि आज भी उन्हें चंदा करके सड़क बनानी पड़ रही है तो फिर लाखों रुपये की सरकारी परियोजना का वास्तविक लाभ क्या हुआ? क्या सरकारी धन केवल रपटा तक सीमित था? क्या संपर्क मार्ग परियोजना का हिस्सा नहीं था? यदि था तो वह अधूरा क्यों छोड़ दिया गया? लोगों का कहना है कि सरकार का काम जनता से चंदा लेकर सड़क बनवाना नहीं,बल्कि करदाताओं के पैसे से गुणवत्तापूर्ण निर्माण कराना है।
‘घटती-घटना’ के बड़े सवाल
जब एप्रोच रोड तैयार नहीं थी तो निर्माण कार्य पूर्ण कैसे माना गया?
क्या बिना जीएसबी,डब्ल्यूएमएम और स्टोन डस्ट के सड़क तकनीकी रूप से उपयोग योग्य मानी जा सकती है?
क्या कार्य का गुणवत्ता परीक्षण और भौतिक सत्यापन किया गया था?
पहली ही बारिश में सड़क दलदल में बदल गई तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
यदि ग्रामीण स्वयं चंदा जुटाकर सड़क बनाएंगे तो संबंधित विभाग की भूमिका क्या रह जाएगी?
क्या निर्माण एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
अब प्रशासन की परीक्षा
गोबरी नदी पर बना रपटा निश्चित रूप से क्षेत्र के लोगों के लिए राहत का माध्यम बन सकता है,लेकिन तभी जब उससे जुड़ा संपर्क मार्ग भी मजबूत और हर मौसम में उपयोग योग्य बनाया जाए, वर्तमान स्थिति में पुल तो बन गया है, लेकिन उस तक पहुंचने का रास्ता ही दलदल में बदल चुका है,इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि अब ग्रामीणों ने प्रशासन से उम्मीद छोड़कर खुद चंदा इकट्ठा कर सड़क सुधारने का निर्णय ले लिया है,यह केवल एक सड़क का मामला नहीं है,बल्कि उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जिसमें जनता कर भी देती है,सरकार योजनाएं भी बनाती है, बजट भी खर्च होता है,लेकिन अंत में सड़क बनाने के लिए फिर जनता को ही अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है,अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस जनसहयोग को अपनी विफलता मानेगा या फिर समय रहते अधूरी परियोजना को वास्तव में पूर्ण कर जनता को राहत देगा।
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