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कोरिया@18 दिन बाद भी पुलिस पर कार्रवाई नहीं,आखिर क्या उच्च अधिकारी मान चुके हैं कि कोई लापरवाही नहीं हुई ?

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  • नौगई हत्याकांड : परिजनों की शिकायत के बाद भी नामजद पुलिस अधिकारी यथावत,विभागीय जांच पर उठे सवाल
  • 18 दिन बाद भी शिकायत में नामित अधिकारी-कर्मचारी पद पर बरकरार…
  • नौगई हत्याकांड : घटना से कथित आत्मसमर्पण तक पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में…
  • परिजनों की विभागीय जांच और स्थानांतरण की मांग पर अब तक नहीं हुआ फैसला…
  • 18 दिन बाद भी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई नहीं, आखिर किसका संरक्षण…
  • परिजनों के आवेदन के बावजूद विभागीय जांच और स्थानांतरण पर चुप्पी…
  • क्या नौगई हत्याकांड में पुलिस की भूमिका पर पर्दा डालने की कोशिश…
  • सीबीआई जांच को मिली मंजूरी के बाद अब पुलिस की भूमिका भी जांच के घेरे में लाने की मांग… तेज,घटना से लेकर कथित आत्मसमर्पण तक उठ रहे सवाल…

रवि सिंह
कोरिया,03 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के सोनहत थाना क्षेत्र के ग्राम नौगई में 16-17 जून की दरम्यानी रात हुए तिहरे हत्याकांड को 18 दिन बीत चुके हैं, इस दौरान तीन लोगों की दर्दनाक मौत, दो लोगों का गंभीर रूप से घायल होना,नौ आरोपियों की गिरफ्तारी, चार आरोपियों के कथित आत्मसमर्पण की कहानी और अंततः सीबीआई जांच की अधिसूचना तक कई बड़े घटनाक्रम सामने आए, लेकिन इन सबके बीच एक बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित है की क्या इस जघन्य हत्याकांड में पुलिस की भूमिका पूरी तरह निष्पक्ष थी? यदि नहीं, तो जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर पीडि़त परिवार ने सवाल उठाए हैं, उन पर अब तक विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई? घटना के बाद से पीडि़त परिवार लगातार यह कहता रहा है कि केवल आरोपियों को गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है, यदि किसी स्तर पर पुलिस की लापरवाही, गलत निर्णय, कर्तव्य में शिथिलता या किसी प्रकार का संरक्षण सामने आता है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, इसी उद्देश्य से परिवार ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक, सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक और सीआईडी के पुलिस महानिरीक्षक को विस्तृत आवेदन देकर विभागीय जांच की मांग की थी,इसके बावजूद 18 दिन बाद भी शिकायत में नामित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कोई स्पष्ट विभागीय कार्रवाई या स्थानांतरण सामने नहीं आया है।
घटना से पहले तनाव की जानकारी थी, फिर भी क्यों नहीं रोकी जा सकी वारदात?-परिजनों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस स्वयं स्वीकार कर चुकी थी कि दोनों पक्षों के बीच विवाद चल रहा था और तनाव की स्थिति बनी हुई थी,सुबह विवाद की सूचना थाने तक पहुंची,दोनों पक्षों को लेकर पुलिस सक्रिय रही,समझौते के प्रयास भी हुए, लेकिन इसके बावजूद रात में ऐसी भयावह वारदात हो गई जिसमें एक परिवार के पांच लोगों पर हमला हुआ, तीन लोगों की मौत हो गई और दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए, ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि पुलिस को पहले से विवाद की जानकारी थी तो क्या पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की गई थी? क्या दोनों पक्षों की समान रूप से निगरानी की गई? क्या संभावित हिंसा को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए? यदि नहीं,तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
थाना प्रभारी की भूमिका पर भी उठे सवाल-पीडि़त परिवार द्वारा दिए गए आवेदन में थाना प्रभारी सोनहत की भूमिका की विभागीय जांच की मांग की गई है,परिवार का कहना है कि जिस समय क्षेत्र में तनाव चरम पर था और बड़ी घटना की आशंका जताई जा रही थी,उसी समय थाना प्रभारी किसी अन्य कार्य से मुख्यालय से बाहर थे,परिजनों का कहना है कि यह जांच का विषय है कि उस समय थाना प्रभारी क्षेत्र से बाहर क्यों थे,उन्हें किस कार्य के लिए भेजा गया था और क्या उस परिस्थिति में थाना छोड़ना उचित था? यदि किसी स्तर पर निर्णय में त्रुटि हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
प्रभार संभाल रहे पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग- घटना के समय थाना का प्रभार संभाल रहे सब-इंस्पेक्टर राजाराम राठिया सहित उस समय ड्यूटी पर मौजूद पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की मांग आवेदन में की गई है, परिवार का कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस की प्रतिक्रिया क्या रही, पुलिस कितनी देर में मौके पर पहुंची,किन परिस्थितियों में कार्रवाई हुई और क्या कहीं कोई लापरवाही हुई थी, हालांकि राजाराम राठिया को बाद में हटाए जाने की जानकारी सामने आई, लेकिन परिजनों का कहना है कि यदि जिम्मेदारी केवल एक अधिकारी की नहीं थी तो अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच आवश्यक है।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक की भूमिका भी जांच के दायरे में लाने की मांग-परिवार ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरेखा चौबे की भूमिका की भी विभागीय जांच की मांग की है,आवेदन में कहा गया है कि घटना के दौरान और उसके बाद वरिष्ठ स्तर पर लिए गए निर्णयों की समीक्षा आवश्यक है, परिवार का मानना है कि इतनी गंभीर घटना में केवल थाना स्तर की जांच पर्याप्त नहीं होगी,बल्कि पूरे कमांड सिस्टम की समीक्षा होनी चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किस स्तर पर क्या निर्णय लिए गए और उनमें कोई चूक तो नहीं हुई।
कथित आत्मसमर्पण की कहानी पर भी उठे सवाल-घटना के बाद चार आरोपियों के कथित आत्मसमर्पण को लेकर भी विवाद सामने आया, पीडि़त परिवार ने अपने आवेदन में मांग की है कि आत्मसमर्पण की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कराई जाए,परिवार चाहता है कि यह स्पष्ट किया जाए कि आरोपियों ने वास्तव में आत्मसमर्पण किया था या उन्हें पुलिस ने पहले से हिरासत में लिया था,यदि आत्मसमर्पण हुआ तो उसकी प्रक्रिया क्या थी और क्या वह पूरी तरह विधिसम्मत थी।
सीडीआर और मोबाइल लोकेशन की जांच की मांग…
परिजनों ने आवेदन में यह भी मांग की है कि पूरे घटनाक्रम से जुड़े मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर),मोबाइल लोकेशन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच कराई जाए, परिवार का कहना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटना से पहले और बाद में किन-किन लोगों के बीच संपर्क हुआ, किस स्तर पर बातचीत हुई और घटनाक्रम की वास्तविक श्रृंखला क्या थी।
स्थानांतरण की मांग…ताकि जांच प्रभावित न हो…
परिवार ने निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों के स्थानांतरण की भी मांग की है, आवेदन में प्रधान आरक्षक नवीन दत्त तिवारी (एमसीबी), थाना प्रभारी विनोद पासवान (सोनहत) और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुरेखा चौबे (कोरिया) का उल्लेख करते हुए अनुरोध किया गया है कि जांच पूरी होने तक इन्हें वर्तमान पदस्थापना से हटाकर सरगुजा संभाग के अन्य जिलों या आवश्यकतानुसार अन्यत्र पदस्थ किया जाए, परिजनों का तर्क है कि यदि जिन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं, वे उसी क्षेत्र में पदस्थ रहेंगे तो जांच प्रभावित होने की आशंका बनी रहेगी।
18 दिन बाद भी नहीं हुई विभागीय कार्रवाई…
घटना के 18 दिन बाद भी शिकायत में नामित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध किसी विभागीय कार्रवाई या स्थानांतरण की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है,इसी कारण अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या उच्च पुलिस अधिकारियों ने प्रारंभिक स्तर पर यह मान लिया है कि इस पूरे मामले में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं हुई, या फिर विभागीय जांच अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है।
सीबीआई जांच से बढ़ी उम्मीदें…
राज्य शासन द्वारा दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (सीबीआई) को जांच का अधिकार दिए जाने के बाद पीडि़त परिवार को उम्मीद है कि अब पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होगी,परिवार का कहना है कि सीबीआई यदि घटना से पहले की परिस्थितियों, पुलिस की तैयारियों, घटना के दौरान हुई कार्रवाई,घटना के बाद की विवेचना तथा कथित आत्मसमर्पण सहित पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच करेगी तो वास्तविक तथ्य सामने आ सकेंगे।
अब सबसे बड़ा सवाल…
नौगई तिहरे हत्याकांड अब केवल हत्या के एक मामले तक सीमित नहीं रह गया है,यह पुलिस की जवाबदेही,प्रशासनिक निर्णयों और न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता से जुड़ा मामला भी बन गया है, अब जबकि सीबीआई जांच का मार्ग प्रशस्त हो चुका है,सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या केवल आरोपियों की भूमिका की जांच होगी,या फिर उन पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी निष्पक्ष रूप से जांची जाएगी जिनके संबंध में पीडि़त परिवार ने विभागीय जांच की मांग की है? पीडि़त परिवार का कहना है कि उनकी लड़ाई केवल दोषियों को सजा दिलाने की नहीं,बल्कि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने लाने की है,उनका मानना है कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही, कर्तव्य में चूक या प्रक्रिया संबंधी त्रुटि हुई है, तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और जनता का कानून व्यवस्था पर विश्वास बना रहे।


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