3 दिन में मांगी रिपोर्ट,अभिभावकों को WhatsApp पर भेजी जा रही निजी प्रकाशकों की सूची….
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,03 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। सरकार जहां कक्षा 10 वीं तक के विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं सरगुजा के कई निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों पर इस पूरी व्यवस्था को दरकिनार कर निजी प्रकाशकों और चुनिंदा पुस्तक विक्रेताओं के साथ कथित कमीशनखोरी का नेटवर्क चलाने के गंभीर आरोप लगे हैं। आरोप है कि अभिभावकों को सरकारी किताबों के बजाय महंगे निजी प्रकाशनों की पुस्तकें खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। शिकायत कलेक्टर तक पहुंचने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने तीन सदस्यीय जांच दल गठित कर तीन दिन के भीतर प्रतिवेदन तलब किया है।
शिकायतकर्ता पार्षद आलोक दुबे ने कलेक्टर को सौंपे ज्ञापन में आरोप लगाया है कि अधिकांश निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूल बच्चों के अभिभावकों को WhatsApp पर निजी प्रकाशकों की पुस्तकों की सूची भेज रहे हैं और उन्हें केवल चिन्हित दुकानों से ही किताबें खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। इससे अभिभावकों पर हजारों रुपये का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है,जबकि इन्हीं कक्षाओं की एससीईआरटी की पुस्तकें शासन द्वारा निःशुल्क उपलब्ध कराई जा रही हैं।
कॉपियां खोलें तो सामने आ जाएगी सच्चाई : शिकायत में कहा गया है कि जांच दल यदि बच्चों की कॉपियां और कक्षा में उपयोग होने वाली पुस्तकों का मिलान कर ले तो तुरंत स्पष्ट हो जाएगा कि वास्तविक पढ़ाई किस पुस्तक से कराई जा रही है। इससे यह भी सामने आ जाएगा कि कहीं सरकारी पुस्तकों को केवल औपचारिकता तक सीमित तो नहीं कर दिया गया है।
डीईओ ने गठित की जांच टीम
मामले को गंभीर मानते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने तीन अधिकारियों की जांच टीम गठित कर शिकायत के प्रत्येक बिंदु की जांच के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों से तीन दिन के भीतर विस्तृत जांच प्रतिवेदन मांगा गया है।
उठ रहे बड़े सवाल
– जब सरकार निःशुल्क पुस्तकें दे रही है तो निजी किताबें खरीदना क्यों अनिवार्य बनाया जा रहा है?
– क्या स्कूलों और पुस्तक विक्रेताओं के बीच कमीशन का खेल चल रहा है?
– एक ही विषय की दो-दो किताबों की जरूरत किस आधार पर तय की गई?
– यदि सरकारी किताबों से पढ़ाई नहीं हो रही तो शासन की योजना का लाभ किसे मिल रहा है?
– क्या शिक्षा विभाग अब तक इस व्यवस्था से अनजान था या शिकायत का इंतजार कर रहा था?
जांच तय करेगी
सच,लेकिन सवाल गंभीर
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डालने का मामला नहीं होगा,बल्कि शासन की निःशुल्क पाठ्यपुस्तक योजना की भावना को कमजोर करने और शिक्षा के नाम पर कथित आर्थिक लाभ कमाने का भी गंभीर मामला माना जाएगा। अब सबकी नजर जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की जांच पर है कि कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में जिम्मेदारों पर शिकंजा कसता है।
पहली कक्षा का बुक सेट 1650 से
2000 रुपये…पांचवीं का 5000 रुपये तक…
शिकायत में दावा किया गया है कि पहली कक्षा के एक निजी स्कूल के पुस्तक सेट की कीमत करीब 1650 से 2000 रुपये तक है,जबकि पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए लगभग 5000 रुपये तक की किताबें खरीदी जा रही हैं। आरोप है कि इस व्यवस्था से स्कूल और पुस्तक विक्रेता दोनों को कमीशन मिलता है।
माइलस्टोन स्कूल का नाम भी शिकायत में…
शिकायतकर्ता ने एक निजी स्कूल द्वारा भेजी गई कथित पुस्तक सूची का उल्लेख करते हुए कहा है कि एससीईआरटी की निःशुल्क पुस्तकों के साथ निजी प्रकाशकों की अतिरिक्त किताबें भी अनिवार्य बताई जा रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यह उठाया गया है कि जब एक ही विषय की दो-दो किताबें खरीदी जा रही हैं,तो आखिर पढ़ाई किस पुस्तक से हो रही है? यदि निजी किताबों से पढ़ाई हो रही है तो सरकारी किताबों का औचित्य क्या रह जाता है, और यदि सरकारी किताबों से पढ़ाई हो रही है तो अभिभावकों से हजारों रुपये क्यों वसूले जा रहे हैं?
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