

- सरकारी नर्सरी से बेशकीमती चंदन गायब,
- हफ्तों बाद भी न एफआईआर की गूंज,न जिम्मेदारी तय…
- आखिर किसे बचा रहा है वन महकमा?
- भाजयुमो और जन सहयोग समिति का आरोप—कार्यवाही नहीं हुई तो होगा उग्र आंदोलन,
- जनता पूछ रही—क्या चंदन के पेड़ खुद चलकर चले गए?
राजन पाण्डेय
बैकुंठपुर/सोनहत,26 जून 2026 (घटती-घटना)। कोरिया वनमंडल की सोनहत स्थित शासकीय नर्सरी से बेशकीमती चंदन के पेड़ों की कथित चोरी अब केवल एक वन अपराध नहीं रह गई है,बल्कि यह पूरे वन विभाग की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और संवेदनशीलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुकी है,घटना को कई दिन बीत चुके हैं, शिकायतें दी जा चुकी हैं,फोटो और साक्ष्य विभाग तक पहुंच चुके हैं। भारतीय जनता युवा मोर्चा और कोरिया जन सहयोग समिति खुलकर कार्रवाई की मांग कर चुके हैं,लेकिन वन विभाग की कार्यशैली देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो विभाग किसी चोरी की जांच नहीं,बल्कि समय बीतने का इंतजार कर रहा हो।
सरकारी नर्सरी,जहां सबसे अधिक सुरक्षा और निगरानी होनी चाहिए,वहीं से यदि आधा दर्जन चंदन के पेड़ काटकर ले जाए जाएं और उसके बाद भी विभाग की ओर से न कोई बड़ी कार्रवाई दिखाई दे और न ही किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हो,तो स्वाभाविक है कि जनता सवाल पूछेगी। सवाल केवल चंदन के पेड़ों का नहीं है,बल्कि उस व्यवस्था का है जिसे वन संपदा की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
चंदन चोरी हुई या विभाग की नींद?- चंदन कोई झाड़-झंखाड़ में उगने वाला सामान्य वृक्ष नहीं है। यह देश की सबसे मूल्यवान वन संपदाओं में गिना जाता है,इसकी सुरक्षा के लिए विशेष निगरानी रखी जाती है,ऐसे में यदि शासकीय नर्सरी से ही चंदन के पेड़ काट लिए जाएं तो यह सामान्य चोरी नहीं कही जा सकती, व्यंग्य यही कहता है कि शायद चंदन के पेड़ रात के अंधेरे में खुद ही अपनी जड़ों से निकलकर कहीं और चले गए होंगे…क्योंकि यदि चोरी हुई होती तो शायद अब तक विभाग को कुछ तो दिखाई देता,लेकिन वास्तविकता इतनी सरल नहीं है, यह घटना बताती है कि या तो सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल रही या फिर ऐसी चूक हुई जिसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
न सहयोग समिति ने भी खोला मोर्चा- कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेन्द्र राजवाड़े ने भी विभाग की निष्कि्रयता पर सवाल उठाए हैं, उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो समिति वन विभाग का घेराव करेगी,उन्होंने यह भी कहा कि जनता का विश्वास तभी लौटेगा जब दोषियों के विरुद्ध ठोस कार्रवाई होगी।
सबसे बड़ा सवाल—मुख्यालय की नर्सरी ही सुरक्षित नहीं तो जंगलों का क्या होगा?-यह घटना केवल एक नर्सरी तक सीमित नहीं है,यह पूरे वन संरक्षण तंत्र पर प्रश्नचिह्न है,यदि मुख्यालय के समीप स्थित सरकारी नर्सरी में लगे चंदन के वृक्ष सुरक्षित नहीं रह पाए, तो दूरस्थ जंगलों में मौजूद बहुमूल्य वन संपदा की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? क्या वहां भी निगरानी इसी स्तर की है? यदि हां,तो चिंता स्वाभाविक है।
व्यंग्य का एक सवाल… कहीं चंदन के पेड़ ‘स्वैच्छिक स्थानांतरण’ पर तो नहीं चले गए?-जब कई दिनों तक कोई कार्रवाई न दिखाई दे…कोई जिम्मेदार तय न हो…कोई गिरफ्तारी न हो…तो जनता व्यंग्य में पूछने लगती है की क्या चंदन के पेड़ों का भी स्थानांतरण हो गया? क्या उन्होंने विभाग से अनुमति लेकर दूसरी जगह जाने का फैसला किया? स्पष्ट है कि ऐसा नहीं हुआ होगा,लेकिन जब कार्रवाई दिखाई नहीं देती तो ऐसे सवाल स्वतः जन्म लेते हैं।
वन विभाग की साख दांव पर-वन विभाग का दायित्व केवल वृक्षारोपण करना नहीं है, उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी वन संपदा की रक्षा करना भी है,यदि सरकारी परिसर से बहुमूल्य चंदन के पेड़ गायब हो जाएं और उसके बाद भी विभाग मौन रहे तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
जनता पूछ रही है…
सरकारी नर्सरी से चंदन के पेड़ कैसे कट गए?
घटना की रात सुरक्षा व्यवस्था कहां थी?
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या एफआईआर दर्ज हुई?
क्या विभागीय जांच की समय-सीमा तय है?
क्या तस्करों तक पहुंचने के लिए विशेष टीम बनाई गई?
यदि सरकारी संपत्ति सुरक्षित नहीं है तो जंगलों की सुरक्षा का दावा कितना मजबूत है?
अब निर्णय वन विभाग के हाथ में…
भाजयुमो और जन सहयोग समिति ने आंदोलन की चेतावनी दे दी है, जनता जवाब चाहती है, यदि विभाग पारदर्शी जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करता है तो उसकी साख मजबूत होगी, लेकिन यदि मामला केवल फाइलों, बैठकों और औपचारिक जांच तक सीमित रहा, तो सवाल केवल चंदन चोरी का नहीं रहेगा, बल्कि यह भी पूछा जाएगा कि आखिर कार्रवाई से बचाने की कोशिश किसके लिए की जा रही है? वन संपदा की रक्षा केवल कानून की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रशासन की विश्वसनीयता की भी कसौटी है, इस कसौटी पर कोरिया वन विभाग अभी कठघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है, अब देखना यह है कि विभाग अपनी कार्यवाही से जवाब देता है या अपनी चुप्पी से सवालों को और गहरा होने देता है।
जांच चल रही है… लेकिन आखिर कहां चल रही है?-
सरकारी विभागों में अक्सर एक वाक्य सुनने को मिलता है जांच चल रही है, लेकिन इस मामले में जनता पूछ रही है क्या जांच जंगल में चल रही है? फाइलों में चल रही है? या फिर केवल बातचीत तक सीमित है? यदि जांच चल रही है तो संदिग्ध कौन हैं? कितने लोगों से पूछताछ हुई? किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? क्या किसी कर्मचारी से स्पष्टीकरण मांगा गया? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है तो ‘जांच जारी है’ केवल एक औपचारिक वाक्य बनकर रह जाता है।
लापरवाह कौन? यह पता लगाने में भी हफ्तों लग गए?-
किसी भी विभाग में यदि सरकारी संपत्ति की चोरी हो जाए तो पहला कदम होता है—जिम्मेदारी तय करना, लेकिन यहां स्थिति उलट दिखाई दे रही है, शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि संबंधित अधिकारी अब भी अपने पदों पर पूर्ववत कार्य कर रहे हैं, यदि प्रथम दृष्टया सुरक्षा में चूक हुई है तो क्या विभाग को कम से कम प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही तय नहीं करनी चाहिए थी? या फिर यह माना जाए कि सरकारी चंदन की सुरक्षा किसी की जिम्मेदारी थी ही नहीं?
भाजयुमो का आरोप—अब आंदोलन होगा-
भाजयुमो मंडल महामंत्री मनोज साहू ने आरोप लगाया है कि संगठन ने डीएफओ कोरिया को कटे हुए चंदन के ठूंठों की तस्वीरें और अन्य साक्ष्य सौंपे थे, उन्होंने निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी, उनका कहना है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो संगठन आंदोलन करेगा, यह उनका आरोप और राजनीतिक रुख है, जिसकी जांच और जवाब देना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
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