तपती सड़कें और खुला कॉलेज, आखिर छात्रों की जिंदगी इतनी सस्ती क्यों?
“डिग्री चाहिए तो लू सहो” सूरजपुर कॉलेज की व्यवस्था पर उठे सवाल
गर्मी से बचने की एडवाइजरी जारी, मगर कॉलेजों में जारी अग्निपरीक्षा
छात्र धूप में झुलसे, जिम्मेदार ठंडी हवा में व्यस्त
कॉलेज खुला है…क्योंकि छात्रों को अभी और तपना बाकी है!
42 से 45 डिग्री में कॉलेज संचालन पढ़ाई कम, सहनशक्ति टेस्ट ज्यादा
सरगुजा विश्वविद्यालय का नया मॉडल में लू सहने वाला ही बनेगा ग्रेजुएट!
स्कूल बंद, कोर्ट बंद… मगर कॉलेज खुले हैं क्योंकि छात्र शायद ऊंट की नस्ल के हैं!
42 से 45 डिग्री की आग बरसाती गर्मी में सरगुजा विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों का अनोखा प्रयोग
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर 20 मई 2026 (घटती-घटना)। प्रदेश में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है, तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, सड़कें तवे की तरह तप रही हैं और दोपहर में बाहर निकलना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं, सरकार ने स्कूलों में ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित कर दिया है, कोर्ट तक में छुट्टियां चल रही हैं, स्वास्थ्य विभाग लगातार लू से बचने की एडवाइजरी जारी कर रहा है, लेकिन सरगुजा विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित रेवती रमण मिश्र शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय सूरजपुर में शायद मौसम विभाग की चेतावनी नहीं पहुंची, यहां छात्र-छात्राओं को रोज तपती धूप में कॉलेज आने-जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, वायरल हो रही तस्वीरें इस पूरी व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर रही हैं, तस्वीरों में छात्र-छात्राएं सड़क किनारे धूप से बचने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं, कोई पेड़ की छांव ढूंढ रहा है, कोई स्कूटी के पास खड़ा होकर राहत लेने की कोशिश कर रहा है, चेहरों पर गर्मी की थकान साफ दिखाई दे रही है।
बता दे की देश बदल रहा है, व्यवस्था बदल रही है, शिक्षा का स्तर बदल रहा है और अब लगता है कि विद्यार्थियों की सहनशक्ति की भी सरकारी टेस्टिंग शुरू हो चुकी है, प्रदेश में तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस के बीच झूल रहा है, सड़कें ऐसी तप रही हैं मानो किसी ने धरती को तंदूर पर रख दिया हो, लोग दोपहर में घर से निकलने से बच रहे हैं, लेकिन सरगुजा विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले महाविद्यालयों ने शायद विज्ञान और मानव शरीर की सीमाओं को चुनौती देने का ठेका ले रखा है, यहां कॉलेज नियमित रूप से संचालित हो रहे हैं, सुबह 10:30 बजे से लेकर दोपहर तक क्लासें चल रही हैं, यानी ठीक उसी समय जब सूरज देवता अपना सबसे खतरनाक रूप दिखाते हैं, लगता है विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह मान लिया है कि कॉलेज के छात्र-छात्राएं सामान्य मनुष्य नहीं बल्कि रेगिस्तान में चलने वाले ऊंट हैं, जिन्हें न गर्मी लगती है, न प्यास और न ही लू का असर होता है।
सरकारी संवेदनशीलता का नया मॉडल में छोटे बच्चों को बचाओ, बड़े खुद बच जाएं तो ठीक- सरकार ने स्कूलों को बंद कर दिया क्योंकि गर्मी बहुत ज्यादा है, कोर्ट में अवकाश हो गया क्योंकि न्यायाधीशों को भी इंसानी शरीर मिला है, सरकारी दफ्तरों में एसी और कूलर की व्यवस्था है क्योंकि अधिकारी भी पसीना पसंद नहीं करते, लेकिन कॉलेजों के मामले में शायद यह सोच लागू की गई है कि डिग्री चाहिए तो तपस्या करनी पड़ेगी, अब सवाल यह है कि आखिर महाविद्यालयीन छात्र किस श्रेणी में आते हैं? क्या वे इंसान नहीं हैं? क्या उनकी तबीयत खराब नहीं हो सकती? क्या उन्हें लू नहीं लगती? या फिर विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई नया मेडिकल रिसर्च कर लिया है कि 18 साल के बाद शरीर में गर्मी-रोधी क्षमता स्वतः विकसित हो जाती है?सुबह कॉलेज जाओ, दोपहर में लौटो… बीच में जिंदगी बची रही तो पढ़ाई भी कर लो- सूरजपुर जिले सहित सरगुजा संभाग के कई ग्रामीण इलाकों से छात्र-छात्राएं कॉलेज पहुंचते हैं, कई छात्र बस सुविधा के अभाव में पैदल या निजी साधनों से लंबी दूरी तय करते हैं, सुबह बैग टांगे छात्र जब घर से निकलते हैं तो मां-बाप की नजर पहले आसमान पर जाती है, फिर बच्चे पर, क्योंकि आजकल कॉलेज जाना पढ़ाई कम और “लू सर्वाइवल मिशन” ज्यादा लगता है, दोपहर में लौटते समय सड़कें इतनी गर्म होती हैं कि चप्पल तक जवाब दे जाए। गर्म हवा ऐसी चलती है मानो किसी ने हेयर ड्रायर को फुल स्पीड पर चालू कर दिया हो, कई छात्रों ने बताया कि कॉलेज पहुंचते-पहुंचते सिर दर्द, चक्कर, उल्टी और शरीर में पानी की कमी जैसी समस्याएं होने लगती हैं, लेकिन व्यवस्था को इससे क्या फर्क पड़ता है? व्यवस्था का मूल सिद्धांत है जब तक छात्र बेहोश होकर वायरल न हो जाए, तब तक सब सामान्य है।
कॉलेजों में पढ़ाई कम, गर्मी की प्रैक्टिकल ज्यादा- छात्रों का कहना है कि इस समय कॉलेजों में पढ़ाई की स्थिति भी किसी मजाक से कम नहीं है, एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कई टीचर समय पर नहीं आते, जब मन हुआ तब क्लास ले ली, नहीं तो स्टाफ रूम में बैठकर मोबाइल चलाया और चले गए। लेकिन छात्रों की उपस्थिति जरूर जरूरी है, यानी छात्र धूप में जलते हुए कॉलेज पहुंचें, लेकिन शिक्षक महोदय का मूड हुआ तभी शिक्षा का दर्शन होगा, अब इसे शिक्षा व्यवस्था कहें या “मनोरंजन आधारित शिक्षण प्रणाली”, यह समझना मुश्किल है।
एसी में शिक्षा नीति, गर्मी में छात्र नीति- कॉलेजों में सबसे दिलचस्प दृश्य तब देखने को मिलता है जब छात्र पसीने से भीगे क्लासरूम में बैठे होते हैं और दूसरी तरफ स्टाफ रूम में कूलर-एसी की ठंडी हवा चल रही होती है, छात्रों के लिए पंखा भी कई बार भगवान भरोसे चलता है, कहीं कूलर खराब है, कहीं पानी नहीं है, कहीं बिजली गायब है, लेकिन अधिकारियों और शिक्षकों के कमरों में व्यवस्था ऐसी रहती है कि मानो वहां गर्मी का प्रवेश प्रतिबंधित हो यानी गर्मी सिर्फ विद्यार्थियों के लिए है, बाकी लोग प्रशासनिक प्राणी हैं।
क्या विश्वविद्यालय ने “लू सहनशक्ति प्रतियोगिता” शुरू कर दी है?- जिस समय स्वास्थ्य विभाग लोगों को घर से बाहर न निकलने की सलाह दे रहा है, उसी समय कॉलेजों में नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की जा रही है, अब छात्र पढ़ाई कम और यह सोचकर ज्यादा परेशान हैं कि आज लौटते समय चक्कर आएगा या नहीं? पानी खत्म हुआ तो क्या होगा? बस छूट गई तो धूप में कैसे जाएंगे? ऐसा लग रहा है कि सरगुजा विश्वविद्यालय ने पढ़ाई के साथ-साथ “लू सहनशक्ति प्रतियोगिता” भी शुरू कर दी है, जो छात्र 45 डिग्री तापमान में रोज कॉलेज आकर जीवित लौट आएगा, वही असली डिग्री का हकदार माना जाएगा।
ग्रामीण छात्रों की परेशानी सबसे ज्यादा- ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले छात्रों की हालत और खराब है, कई गांवों से कॉलेज तक सीधी बस सुविधा नहीं है, छात्र पहले ऑटो पकड़ते हैं, फिर बस, फिर पैदल कॉलेज पहुंचते हैं, दोपहर में वापस लौटते समय सड़कें वीरान हो जाती हैं क्योंकि सामान्य लोग उस समय बाहर निकलना ही नहीं चाहते, लेकिन छात्र मजबूरी में निकलते हैं, अभिभावकों का कहना है कि बच्चों की तबीयत लगातार खराब हो रही है, लेकिन कॉलेज प्रशासन को इसकी कोई चिंता नहीं दिख रही।
संवेदनशीलता सिर्फ भाषणों में?- सरकार मंचों से छात्रहित की बड़ी-बड़ी बातें करती है, युवाओं को देश का भविष्य बताया जाता है, शिक्षा को प्राथमिकता कहा जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि वही भविष्य आज धूप में झुलस रहा है, यदि इतनी भीषण गर्मी में स्कूल बंद हो सकते हैं, तो महाविद्यालयों में वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? ऑनलाइन क्लास, समय परिवर्तन या अस्थायी अवकाश जैसे विकल्पों पर विचार क्यों नहीं किया जा रहा?
कहीं ऐसा न हो कि आदेश तब निकले जब कोई बड़ी घटना हो जाए- प्रशासन की कार्यशैली अक्सर ऐसी रही है कि पहले घटना होती है, फिर जांच बैठती है, फिर आदेश निकलते हैं, डर इस बात का है कि कहीं किसी छात्र की हालत गंभीर होने या किसी अप्रिय घटना के बाद ही व्यवस्था की नींद न खुले, क्योंकि यहां अक्सर नियम घटना के बाद बनते हैं, पहले नहीं।
छात्रों की मांग : पढ़ाई चाहिए, लेकिन जिंदगी दांव पर नहीं, छात्रों और अभिभावकों ने मांग की है कि—
- भीषण गर्मी को देखते हुए महाविद्यालयों में ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया जाए।
- कॉलेज का समय सुबह जल्दी किया जाए।
- सभी क्लासरूम में पंखा, कूलर और पेयजल की व्यवस्था अनिवार्य हो।
- शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
अंतिम सवाल- जब अधिकारी खुद दोपहर की धूप में पांच मिनट खड़े नहीं हो सकते, जब सरकारी दफ्तर बिना एसी-कूलर के नहीं चल सकते, जब स्कूलों को गर्मी के कारण बंद किया जा सकता है, तो फिर कॉलेज के छात्रों को इस आग उगलती गर्मी में रोज सड़क पर क्यों उतारा जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि व्यवस्था ने मान लिया है— “विद्यार्थी हैं… झेल लेंगे।”
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