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कोरिया/एमसीबी@सायरन, स्टिकर और सत्ता का शो-रूम!

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  • कोरिया से अंबिकापुर तक VIP संस्कृति का खुला खेल, हूटर से लेकर पदनाम तक सड़कों पर दौड़ ‘रौब राज’
  • जनप्रतिनिधि हों या प्रशासनिक अधिकारी…नियमों को सलाम, रुतबे को प्रणाम!

-रवि सिंह-
कोरिया/एमसीबी,20 मई 2026 (घटती-घटना)। देश में वर्षों पहले लालबत्ती संस्कृति खत्म करने की घोषणा बड़े जोर-शोर से हुई थी,कहा गया था कि लोकतंत्र में कोई व्हीआईपी नहीं होगा, जनता सबसे बड़ी होगी और जनप्रतिनिधि खुद को जनता का सेवक समझेंगे। लेकिन जमीनी हकीकत अब कुछ और ही कहानी बयान कर रही है, लालबत्ती भले हट गई हो, मगर व्हीआईपी बनने की बीमारी आज भी सरकारी गलियारों और नेताओं की गाडि़यों में पूरी रफ्तार से दौड़ रही है।
कोरिया,एमसीबी,सूरजपुर, बलरामपुर और अंबिकापुर जिलों में इन दिनों सड़कों पर एक नई संस्कृति दिखाई दे रही है सायरन संस्कृति, स्टिकर संस्कृति और पद प्रदर्शन संस्कृति, कहीं जनप्रतिनिधियों की निजी गाडि़यों में अवैध हूटर बज रहे हैं, तो कहीं प्रशासनिक अधिकारियों की निजी गाडि़यों में बड़े-बड़े पदनाम वाले बोर्ड लटक रहे हैं, ऐसा लगने लगा है जैसे सड़कें अब यातायात के लिए कम और रुतबे की प्रदर्शनी के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रही हैं।
हूटर बजा… जनता समझी कोई बड़ा अफसर आ रहा है!
जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों हूटर बजाती गाडि़यां किसी फिल्मी दृश्य से कम नजर नहीं आतीं,दूर से सायरन की आवाज आती है, लोग रास्ता छोड़ देते हैं, दुकानदार चौकन्ने हो जाते हैं और राहगीर समझते हैं कि शायद कोई बड़ी प्रशासनिक टीम या आपातकालीन वाहन गुजर रहा है,लेकिन जैसे ही गाड़ी पास आती है तो पता चलता है कि उसमें कोई जनप्रतिनिधि,नेता या उनका करीबी बैठा हुआ है,कुछ लोग तो मजाक में कहने लगे हैं कि अब गांवों में एम्बुलेंस कम और नेताजी एक्सप्रेस ज्यादा हूटर बजा रही है,ग्रामीणों का कहना है कि कुछ जनप्रतिनिधि गांवों में ऐसे प्रवेश करते हैं मानो किसी जिले का दौरा करने मंत्री या राज्यपाल आ रहे हों,गाड़ी में हूटर,आगे व्हीआईपी स्टिकर,पीछे पदनाम और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे पूरा प्रशासन उन्हीं के इशारे पर चलता हो।
जनता को चाहिए सादगी,सिस्टम को चाहिए ईमानदारी
आम लोगों का कहना है कि जनता को ऐसे अधिकारी और जनप्रतिनिधि पसंद आते हैं जो सादगी से काम करें, नियमों का पालन करें और खुद उदाहरण बनें, जनता को सड़क पर सायरन नहीं, काम की आवाज सुनाई देनी चाहिए,अब देखना यह है कि प्रशासन व्हीआईपी संस्कृति पर वास्तव में लगाम लगाता है या फिर सायरन की सत्ता और पद प्रदर्शन की राजनीति यूं ही सड़कों पर दौड़ती रहेगी।
व्हीआईपी बनने की ऐसी होड़ कि कानून भी किनारे खड़ा देख रहा तमाशा
मोटर व्हीकल एक्ट साफ कहता है कि हूटर और सायरन का उपयोग केवल पुलिस, फायर ब्रिगेड, एम्बुलेंस और कुछ विशेष सुरक्षा वाहनों को ही अनुमति है, लेकिन जिले में कई निजी वाहन ऐसे घूम रहे हैं जिनमें हूटर ऐसे फिट हैं जैसे वाहन कंपनी की ओर से ही लगाए गए हों, लोगों का कहना है कि यदि कोई आम युवक अपनी बाइक में प्रेशर हॉर्न लगा ले तो पुलिस उसका चालान काट देती है,लेकिन जब रसूखदारों की महंगी गाडि़यों में सायरन बजता है तो नियम शायद खुद किनारे खड़े होकर सलामी देने लगते हैं,स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस इन वाहनों को रोज सड़कों पर देखते हैं,लेकिन कार्रवाई न होना अपने आप में बड़ा सवाल है।
अब गाडि़यों में पदनाम का प्रदर्शन भी बना नया फैशन
यदि बात केवल हूटर तक सीमित होती तो शायद मामला इतना चर्चित नहीं होता,अब तो निजी वाहनों में बड़े-बड़े बोर्ड लगाकर पद की प्रदर्शनी भी शुरू हो गई है, कहीं जनपद सदस्य,कहीं अध्यक्ष,कहीं तहसीलदार, कहीं एसडीएम,तो कहीं सीईओ जिला पंचायत जैसे कई पद नाम वाले बोर्ड गाडि़यों में चमकते दिखाई देते हैं,कई वाहनों की नंबर प्लेट के ऊपर इतना बड़ा पदनाम लिखा होता है कि असली नंबर खोजने के लिए अलग से मेहनत करनी पड़ जाए,ऐसा प्रतीत होता है जैसे वाहन नहीं,चलता-फिरता सरकारी परिचय पत्र सड़क पर दौड़ रहा हो।
निजी वाहन या चलता-फिरता कार्यालय?
कुछ प्रशासनिक अधिकारियों की निजी गाडि़यों को देखकर आम लोग भी भ्रमित हो जाते हैं कि यह सरकारी वाहन है या निजी,बड़े-बड़े अक्षरों में पदनाम लिखे होने के कारण ऐसा लगता है मानो पूरा विभाग ही गाड़ी पर चिपका दिया गया हो,लोगों का कहना है कि जिन अधिकारियों को सादगी और अनुशासन का उदाहरण होना चाहिए,वही लोग अपने पद का प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं,कई लोगों ने व्यंग्य करते हुए कहा कि अब शायद अगला दौर ऐसा आएगा जब गाडि़यों में फाइल अंदर है, कलेक्टर से सीधे संपर्क और रौब ऑन ड्यूटी जैसे स्लोगन भी लिखे दिखाई देंगे।
जनता पूछ रही — क्या नियम सिर्फ आम लोगों के लिए हैं?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या नियम केवल आम जनता के लिए बनाए गए हैं? यदि कोई आम नागरिक वाहन की नंबर प्लेट में थोड़ा बदलाव कर दे तो तुरंत चालान हो जाता है,यदि कोई बाइक चालक थोड़ा तेज हॉर्न बजा दे तो पुलिस पकड़ लेती है,लेकिन जब वही काम रसूखदार लोग करते हैं तो पूरा सिस्टम मौन क्यों हो जाता है? लोगों का कहना है कि कानून की असली परीक्षा वहीं होती है जहां कार्रवाई प्रभावशाली लोगों पर करनी पड़े,आम आदमी पर नियम लागू करना आसान है,लेकिन सत्ता और प्रभाव वाले लोगों पर कार्रवाई करना ही प्रशासन की वास्तविक निष्पक्षता साबित करता है।
व्हीआईपी संस्कृति का ग्रामीण संस्करण
ग्रामीण इलाकों में यह व्हीआईपी संस्कृति अब नई पहचान बनती जा रही है, गांवों में यदि कोई गाड़ी बिना हूटर और स्टिकर के पहुंच जाए तो लोग शायद उसे सामान्य वाहन मान लें,लेकिन जैसे ही सायरन बजता है, लोग समझ जाते हैं कि कोई बड़ा आदमी आया है,कुछ ग्रामीणों ने तंज कसते हुए कहा कि अब गांवों में विकास कम और व्हीआईपी एंट्री ज्यादा दिखाई देती है,एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा पहले नेता पैदल चलकर जनता से मिलते थे, अब जनता को पहले गाड़ी का हूटर सुनना पड़ता है,तब जाकर नेताजी उतरते हैं।
कानून की किताब और सड़क की हकीकत में बड़ा अंतर
मोटरयान अधिनियम 1988 और केंद्रीय मोटरयान नियमों के अनुसार निजी वाहनों में हूटर,सायरन और भ्रामक पहचान प्रतिबंधित है। नंबर प्लेट निर्धारित प्रारूप में होना अनिवार्य है, किसी भी निजी वाहन में ऐसा प्रदर्शन नहीं किया जा सकता जिससे वह विशेष श्रेणी का वाहन प्रतीत हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है। नियम किताबों में दिखाई देते हैं,जबकि सड़क पर रुतबा चलता दिखाई देता है,विशेषज्ञों का कहना है कि निजी वाहनों में पदनाम और विशेष पहचान का अत्यधिक प्रदर्शन लोकतांत्रिक सादगी के विपरीत है।
कार्रवाई की मांग,लेकिन क्या होगा असर?
अब इस पूरे मामले को लेकर कलेक्टर से शिकायत की गई है और जिलेभर में विशेष अभियान चलाने की मांग उठी है तो शिकायतकर्ताओं ने कहा है कि अवैध हूटर लगे वाहनों पर कार्रवाई हो,व्हीआईपी स्टिकर और भ्रामक बोर्ड हटाए जाएं,नंबर प्लेट नियमों का पालन कराया जाए, प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों पर भी समान नियम लागू हों, लेकिन लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कार्रवाई वास्तव में होगी या फिर शिकायत फाइलों में घूमती रह जाएगी?
सत्ता का साउंड सिस्टम या सेवा का संस्कार?
समाजशास्ति्रयों का मानना है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की पहचान उनके कार्यों से होनी चाहिए, न कि गाडि़यों में लगे हूटर और बोर्ड से। लेकिन आज स्थिति उलटी दिखाई दे रही है,काम कम और प्रदर्शन ज्यादा दिखाई देता है,कुछ लोगों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी या नेता को अपना पद बार-बार गाड़ी पर लिखवाकर बताना पड़ रहा है,तो शायद जनता के बीच उसका प्रभाव काम से नहीं बन पा रहा।
लालबत्ती गई…मानसिकता नहीं गई…
देशभर में व्हीआईपी संस्कृति खत्म करने के नाम पर लालबत्तियां हटाई गई थीं, लेकिन अब उसी मानसिकता ने नया रूप ले लिया है, कहीं हूटर है, कहीं फ्लैशलाइट, कहीं बड़े-बड़े पदनाम, तो कहीं व्हीआईपी स्टिकर, ऐसा लगने लगा है कि लालबत्ती केवल गाड़ी से उतरी है, दिमाग से नहीं।


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