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रायपुर@ऑनलाइन सिस्टम या ऑफलाइन सेटिंग?ब्लड बैंक लाइसेंस में रायपुर दरबार पर उठे सवाल

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जब सब ऑनलाइन है,तो मुख्यालय में भीड़ क्यों?ब्लड बैंक लाइसेंस प्रक्रिया पर बड़ा सवाल

  • ब्लड बैंक लाइसेंस का खेल! ऑनलाइन प्रक्रिया के बावजूद रायपुर में क्यों लग रही लाइन?
  • ड्रग विभाग में ‘ऑनलाइन’ का दावा,लेकिन फाइलें चल रहीं ‘ऑफलाइन’?
  • लाइसेंस के लिए पोर्टल कम, ‘पहुंच’ ज्यादा जरूरी? सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल…
  • रायपुर मुख्यालय में ब्लड बैंक संचालकों की भीड़ ने बढ़ाई विभाग की मुश्किलें
  • ऑनलाइन आवेदन,फिर भी मुख्यालय में हाजिरी! आखिर क्या है लाइसेंस का राज?

-न्यूज डेस्क-
रायपुर 20 मई 2026 (घटती-घटना)। डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन पारदर्शिता के बड़े-बड़े दावों के बीच छत्तीसगढ़ का ड्रग एंड कॉस्मेटिक विभाग इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है,सवाल इसलिए,क्योंकि विभागीय नियम और पोर्टल कुछ और कहानी बताते हैं,जबकि जमीनी तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। सूत्रों से मिली जानकारी और विभागीय गतिविधियों पर नजर रखने वालों का कहना है कि प्रदेश में संचालित ब्लड बैंकों और दवा निर्माण कंपनियों से जुड़े लाइसेंस संबंधी अधिकांश कार्य पूरी तरह ऑनलाइन हैं, नए लाइसेंस जारी करना,पुराने लाइसेंस का नवीनीकरण, ओनरशिप परिवर्तन, स्थानांतरण, दस्तावेज सत्यापन और कई अन्य प्रक्रियाएं पोर्टल आधारित हैं,ऐसे में सामान्य रूप से यह माना जाना चाहिए कि आवेदकों को कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन राजधानी रायपुर स्थित मुख्यालय में पिछले कुछ समय से जिस तरह ब्लड बैंक संचालकों,एजेंटों और दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों की लगातार भीड़ दिखाई दे रही है, उसने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब सारी प्रक्रिया ऑनलाइन है, तो फिर मुख्यालय में ‘हाजिरी’ लगाने की मजबूरी आखिर क्यों बन रही है?
पूरे प्रदेश में 144 ब्लड बैंक,लेकिन सवाल एक ही-भीड़ क्यों?
जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ में वर्तमान में लगभग 144 ब्लड बैंक संचालित हैं, इन ब्लड बैंकों को संचालित करने के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य होता है, लाइसेंस जारी करने से लेकर उसके नवीनीकरण तक की प्रक्रिया ड्रग एंड कॉस्मेटिक विभाग के अधीन आती है, विभागीय पोर्टल और आधिकारिक दिशा-निर्देशों के अनुसार आवेदन ऑनलाइन, दस्तावेज ऑनलाइन,शुल्क ऑनलाइन,ट्रैकिंग ऑनलाइन,और अधिकांश अनुमोदन भी ऑनलाइन होने चाहिए, यानी व्यवस्था ऐसी बनाई गई है कि किसी व्यक्ति को राजधानी जाकर अधिकारियों के कमरे के बाहर बैठने की आवश्यकता ही न पड़े, लेकिन सूत्र बताते हैं कि वास्तविकता इसके ठीक उलट है, राजधानी स्थित मुख्यालय में प्रतिदिन ब्लड बैंक संचालकों और उनके प्रतिनिधियों की उपस्थिति सामान्य बात बन चुकी है,कई बार तो घंटों तक फाइलों और आवेदन की स्थिति को लेकर लोगों को कार्यालयों के बाहर इंतजार करते देखा जाता है, अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसी कौन-सी प्रक्रिया है जो ऑनलाइन पोर्टल से पूरी नहीं हो पा रही?
क्या एजेंट संस्कृति
फिर हावी हो रही है?

ऑनलाइन व्यवस्था लागू करने का सबसे बड़ा उद्देश्य था बिचौलियों और एजेंटों की भूमिका समाप्त करना,लेकिन विभागीय गलियारों में चर्चा है कि अब भी कई लोग ‘काम करवाने’ के नाम पर सक्रिय हैं,बताया जाता है कि कुछ प्रतिनिधि नियमित रूप से मुख्यालय में देखे जाते हैं और वे अलग-अलग संस्थानों की फाइलों की ‘देखरेख’ करते हैं,यदि यह सच है, तो यह सीधे-सीधे ऑनलाइन सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है,क्योंकि यदि एक आवेदक को फिर भी किसी एजेंट,संपर्क या व्यक्तिगत नेटवर्क की आवश्यकता पड़ रही है, तो इसका अर्थ यही है कि व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी नहीं बन पाई है।
दवा निर्माण कंपनियों
में भी वही कहानी?

मामला सिर्फ ब्लड बैंकों तक सीमित नहीं बताया जा रहा, जानकारी के अनुसार प्रदेश में करीब 69 दवा निर्माण कंपनियां भी संचालित हैं और उनका लाइसेंसिंग कार्य भी इसी विभाग के अधीन आता है,दवा निर्माण कंपनियों के लिए भी निर्माण लाइसेंस,नवीनीकरण,निरीक्षण,उत्पाद अनुमोदन,और तकनीकी दस्तावेजों की प्रक्रिया बड़े स्तर पर ऑनलाइन होती है,फिर भी यदि कंपनियों के प्रतिनिधियों की लगातार मुख्यालय में मौजूदगी बनी रहती है,तो सवाल उठना स्वाभाविक है,क्या वहां भी फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए ‘व्यक्तिगत उपस्थिति’ जरूरी हो जाती है? क्या ऑनलाइन सिस्टम सिर्फ दस्तावेज अपलोड करने तक सीमित रह गया है? क्या अंतिम निर्णय अब भी ‘कमरे के भीतर’ ही तय होते हैं? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आम जनता भी जानना चाहती है।
लाइसेंस अथॉरिटी बदलते ही क्यों बढ़ गई आवाजाही?
सूत्रों के अनुसार जब से प्रदेश में लाइसेंस अथॉरिटी के रूप में बेनीराम साहू की भूमिका मजबूत हुई है, तब से मुख्यालय में आने-जाने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है, हालांकि विभाग की ओर से इसे सामान्य प्रशासनिक गतिविधि बताया जा सकता है, लेकिन विभागीय हलकों में कई तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं, कुछ लोग इसे ‘सिस्टम की मजबूरी’ बताते हैं, तो कुछ ‘सेटिंग संस्कृति’ का हिस्सा मान रहे हैं, कई संचालकों का कहना है कि ऑनलाइन आवेदन के बाद भी फाइल को ‘गति’ देने के लिए व्यक्तिगत संपर्क जरूरी हो जाता है, कोई दस्तावेज की कमी बताता है, कोई निरीक्षण रिपोर्ट अटकने की बात करता है, तो कोई तकनीकी कारणों का हवाला देता है, यहीं से संदेह की शुरुआत होती है, यदि सब कुछ तय नियम और पोर्टल के अनुसार होना है, तो फिर फाइलें ‘मुलाकात’ के बाद ही आगे क्यों बढ़ती दिखाई देती हैं?
50 लाख से 1 करोड़ तक का निवेश, फिर शुरू होता है ‘मैनेजमेंट’?
ब्लड बैंक संचालन कोई छोटा व्यवसाय नहीं माना जाता, सूत्रों का दावा है कि एक ब्लड बैंक स्थापित करने में 50 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपए तक का खर्च आता है, भवन, मशीनें, स्टाफ, कोल्ड स्टोरेज, लैब और अन्य तकनीकी मानकों को पूरा करना पड़ता है, इतना बड़ा निवेश करने के बाद संचालकों की पहली प्राथमिकता लाइसेंस प्राप्त करना होती है, इसी बिंदु पर सबसे गंभीर आरोप सामने आते हैं, चर्चा यह है कि लाइसेंस प्रक्रिया में फाइलों को तेजी से आगे बढ़ाने, निरीक्षण को अनुकूल बनाने या लंबित मामलों को निपटाने के लिए ‘अनौपचारिक व्यवस्थाएं’ करनी पड़ती हैं, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार मुख्यालय में दिखाई देने वाली भीड़ ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है, कुछ लोग इसे खुले शब्दों में ‘ऑनलाइन सिस्टम के पीछे ऑफलाइन सेटिंग’ कहने लगे हैं।
डिजिटल इंडिया का
सपना और जमीनी हकीकत

केंद्र और राज्य सरकारें लगातार डिजिटल इंडिया और ई-ऑफिस की बात करती हैं,सरकारी विज्ञापनों में यह दावा किया जाता है कि अब पारदर्शिता बढ़ रही है और भ्रष्टाचार कम हो रहा है,ऑनलाइन व्यवस्था के मुख्य उद्देश्य थे मानव हस्तक्षेप कम करना,रिश्वतखोरी रोकना,समय बचाना और पारदर्शिता बढ़ाना,लेकिन यदि आवेदकों को फिर भी राजधानी पहुंचकर अधिकारियों से मुलाकात करनी पड़ रही है,तो इसका सीधा मतलब है कि व्यवस्था कहीं न कहीं अपने उद्देश्य से भटक रही है, ऑनलाइन प्रक्रिया का असली मतलब यह नहीं कि सिर्फ आवेदन इंटरनेट पर भर दिया जाए, असल पारदर्शिता तब होगी जब आवेदन की स्थिति सार्वजनिक हो, हर चरण की समय सीमा तय हो, देरी का कारण पोर्टल पर दिखे, और बिना किसी व्यक्तिगत संपर्क के कार्य पूर्ण हो जाए।
‘नगर नारायण’ के
बिना फाइल नहीं चलती?

विभागीय चर्चाओं में एक शब्द बार-बार सुनाई देता है नगर नारायण, आम बोलचाल में इसे सुविधा शुल्क या अनौपचारिक लेन-देन के संकेत के रूप में देखा जाता है, सूत्र दावा करते हैं कि कई मामलों में लाइसेंस संबंधी फाइलें लंबे समय तक लंबित रहती हैं, लेकिन ‘व्यवस्था’ होने के बाद अचानक तेजी से आगे बढ़ जाती हैं,यदि ऐसा हो रहा है,तो यह न सिर्फ भ्रष्टाचार का मामला है बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी है,क्योंकि ब्लड बैंक और दवा कंपनियां सीधे जनता के स्वास्थ्य से जुड़ी संस्थाएं हैं, ऐसे संस्थानों में यदि लाइसेंसिंग प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, तो उसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
सवाल सिर्फ भ्रष्टाचार
का नहीं,सुरक्षा का भी है…

ब्लड बैंक और दवा निर्माण कंपनियां अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र हैं,यहां किसी भी प्रकार की लापरवाही सीधे मरीजों के जीवन को प्रभावित कर सकती है,यदि लाइसेंस ‘योग्यता’ की बजाय ‘प्रभाव’ या ‘प्रबंधन’ के आधार पर मिलने लगें, तो यह बेहद खतरनाक स्थिति होगी, विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्लड स्टोरेज,संक्रमण जांच, दवाओं की गुणवत्ता, लैब मानक,और तकनीकी निरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं में किसी भी प्रकार का समझौता जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है, इसलिए लाइसेंसिंग व्यवस्था पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी होना आवश्यक है।
मुख्यालय में बैठने वालों का
डेटा सार्वजनिक होना चाहिए…

अब मांग उठने लगी है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले में पारदर्शिता लाए,विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि विभाग को सार्वजनिक रूप से यह जानकारी जारी करनी चाहिए कितने आवेदन लंबित हैं,कितने स्वीकृत हुए,कितने निरस्त हुए,प्रत्येक आवेदन में कितना समय लगा,और कितने आवेदकों ने व्यक्तिगत रूप से मुख्यालय का दौरा किया,यदि सारी प्रक्रिया ऑनलाइन है,तो फिर व्यक्तिगत मुलाकातों का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक होना चाहिए।
क्या सरकार करेगी निष्पक्ष जांच?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्य सरकार इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि मुख्यालय में भीड़ क्यों लगती है? ऑनलाइन प्रक्रिया के बावजूद व्यक्तिगत संपर्क की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या कहीं बिचौलिया तंत्र सक्रिय है? क्या लाइसेंस प्रक्रिया में अनियमितता या आर्थिक लेन-देन की शिकायतें सही हैं? यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता चाहती है, तो उसे इस पूरे सिस्टम का ऑडिट कराना चाहिए।
जनता पूछ रही—ऑनलाइन
सुविधा या ऑफलाइन मजबूरी?

आज आम जनता भी यह सवाल पूछ रही है कि जब सरकार हर विभाग को ऑनलाइन करने का दावा करती है,तो फिर लोगों को राजधानी में जाकर ‘दरबार’ लगाने की जरूरत क्यों पड़ती है? यदि ऑनलाइन प्रक्रिया के बावजूद फाइलें व्यक्ति विशेष की कृपा पर निर्भर रहेंगी,तो डिजिटल व्यवस्था का पूरा उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा, ब्लड बैंक और दवा कंपनियां सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ी जिम्मेदार संस्थाएं हैं,इसलिए इनकी लाइसेंस प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को हल्के में नहीं लिया जा सकता,अब देखना यह होगा कि सरकार इन सवालों का जवाब देती है या फिर ‘ऑनलाइन सिस्टम’ के पीछे चल रही ‘ऑफलाइन व्यवस्था’ यूं ही जारी रहती है।


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