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रायपुर@पहले नियुक्त अधिकारी पीछे,बाद वाले आगे! खाद्य विभाग की वरिष्ठता सूची पर बड़ा विवाद

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  • हाईकोर्ट के आदेश से बढ़े सवाल,किसने बनाई विवादित वरिष्ठता सूची?
  • खाद्य विभाग में प्रमोशन का खेल? अदालत पहुंचा 10 साल पुराना विवाद
  • गलत सूची,सीधी पदोन्नति और अब कोर्ट की एंट्री —खाद्य विभाग में मचा हड़कंप
  • वरिष्ठता सूची पर बवाल,स्थापना शाखा से लेकर अवर सचिव तक उठे सवाल
  • खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में ‘सीनियरिटी गेम’ का खुलासा!
  • मेरिट दबाई या नियम तोड़े? हाईकोर्ट के आदेश के बाद विभाग कटघरे में
  • 2015 वाले पीछे,2016 वाले आगे! अब कोर्ट ने मांगा पूरा हिसाब
  • विवादित वरिष्ठता सूची पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला,60 दिन में पुनर्विचार के निर्देश
  • क्या गलत सूची के आधार पर हुए प्रमोशन? अब विभागीय व्यवस्था पर सवाल
  • वरिष्ठता विवाद ने खोली सिस्टम की परतें,विभाग में बढ़ी बेचैनी
  • हाईकोर्ट पहुंचा वरिष्ठता विवाद,अब जिम्मेदारी तय होने की मांग तेज


-न्यूज डेस्क-
रायपुर,10 मई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में वर्षों से चल रहा वरिष्ठता एवं पदोन्नति विवाद अब बड़ा प्रशासनिक और कानूनी मुद्दा बन चुका है,विभाग में वर्ष 2015 से लेकर 2026 तक तैयार की गई वरिष्ठता सूची, पदोन्नति आदेश,मेरिट और आरक्षण रोस्टर को लेकर उठे सवाल अब सीधे छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय तक पहुंच चुके हैं,अदालत द्वारा वरिष्ठता सूची पर पुनर्विचार के निर्देश दिए जाने के बाद विभागीय व्यवस्था,स्थापना शाखा और फाइल प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। दैनिक घटती-घटना ने इस पूरे विवाद को लगातार प्रमुखता से प्रकाशित किया था। अखबार द्वारा पहले ही यह सवाल उठाया गया था कि आखिर कैसे पहले नियुक्त अधिकारी पीछे और बाद में नियुक्त अधिकारी वरिष्ठता सूची में आगे पहुंच गए, अब जब मामला न्यायालय पहुंचा और अदालत ने भी पुनर्विचार का आदेश दे दिया, तब विभागीय निर्णयों की निष्पक्षता पर चर्चा और तेज हो गई है।
पहले नियुक्त अधिकारी पीछे,बाद वाले आगे बना सबसे बड़ा विवाद
विभागीय कर्मचारियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर पहले नियुक्त अधिकारियों को पीछे और बाद में नियुक्त अधिकारियों को आगे कैसे रखा गया,कर्मचारियों का कहना है कि वरिष्ठता सूची केवल नामों की सूची नहीं होती, बल्कि इसी के आधार पर पदोन्नति, प्रशासनिक अधिकार और भविष्य की सेवा संरचना तय होती है,सूत्रों के अनुसार विवादित सूची के आधार पर आगे चलकर पदोन्नति आदेश भी जारी हुए,यही वजह है कि अब प्रमोशन प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई है,कर्मचारियों का आरोप है कि यदि वरिष्ठता सूची में त्रुटि थी तो उसी आधार पर हुए पदोन्नति आदेशों की वैधता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
क्या मेरिट सूची और आरक्षण रोस्टर की अनदेखी हुई?
विभाग के भीतर यह चर्चा भी तेज है कि वरिष्ठता निर्धारण में मेरिट सूची और आरक्षण रोस्टर का सही पालन नहीं हुआ, कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि चयन सूची और अंतिम वरिष्ठता सूची में अंतर दिखाई देता है,हालांकि इन आरोपों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन अदालत द्वारा पुनर्विचार के निर्देश दिए जाने के बाद यह पूरा मामला और संवेदनशील हो गया है,कर्मचारियों का कहना है कि यदि पुनर्विचार प्रक्रिया में पुराने रिकॉर्ड, चयन सूची,नियुक्ति आदेश और आरक्षण रोस्टर की निष्पक्ष जांच होती है तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।
स्थापना शाखा की भूमिका पर गंभीर सवाल
इस पूरे विवाद में विभाग की स्थापना शाखा सबसे ज्यादा चर्चा में है,विभागीय सूत्रों के अनुसार वरिष्ठता सूची तैयार करने और पदोन्नति प्रस्तावों की प्रक्रिया इसी शाखा से संचालित होती है,यही कारण है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि लगातार शिकायतें और आपत्तियां सामने आ रही थीं तो स्थापना शाखा ने समय रहते रिकॉर्ड की समीक्षा क्यों नहीं की,विभागीय चर्चाओं में एडीसी बेणीराम साहू की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं,कर्मचारियों का कहना है कि फाइलें केवल औपचारिक रूप से आगे बढ़ाई गईं या फिर उनका गंभीर परीक्षण भी हुआ —यह अब जांच का विषय बन चुका है,हालांकि अभी तक किसी अधिकारी की आधिकारिक जिम्मेदारी तय नहीं हुई है,लेकिन विभागीय कर्मचारियों का मानना है कि यदि प्रारंभिक स्तर पर निष्पक्ष जांच और रिकॉर्ड परीक्षण हुआ होता तो मामला अदालत तक नहीं पहुंचता।
अवर सचिव की भूमिका पर भी उठे सवाल
इस पूरे विवाद में अब विभागीय अवर सचिव की भूमिका को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है,कर्मचारियों का कहना है कि पदोन्नति और वरिष्ठता से जुड़ी फाइलें कई प्रशासनिक स्तरों से गुजरते हुए अवर सचिव तक पहुंचती हैं,ऐसे में यदि लगातार शिकायतें सामने आ रही थीं तो क्या उस स्तर पर स्वतंत्र जांच और स्क्रूटनी नहीं होनी चाहिए थी? सूत्रों के अनुसार विभाग के भीतर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पुराने स्तरों से आई फाइलों को बिना गहन परीक्षण के आगे बढ़ा दिया गया। कर्मचारियों का कहना है कि अवर सचिव स्तर केवल हस्ताक्षर की औपचारिकता नहीं होता, बल्कि वहां पर नियमों और प्रक्रिया की वैधानिक समीक्षा भी अपेक्षित होती है, यही कारण है कि अब विभागीय कर्मचारियों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर प्रशासनिक स्तर पर कहां-कहां चूक हुई।
खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की वरिष्ठता सूची पर हाईकोर्ट सख्त
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक महत्वपूर्ण आदेश में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की वरिष्ठता सूची को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है,इस मामले में याचिकाकर्ता अपर्णा आर्य,राखी ठाकुर और सरिता पटेल ने वर्ष 2021 में जारी वरिष्ठता सूची को चुनौती दी थी,याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2015 में हुई थी, जबकि निजी प्रतिवादी वर्ष 2016 में नियुक्त हुए थे, इसके बावजूद उन्हें वरिष्ठता सूची में ऊपर स्थान दिया गया,मामले की सुनवाई के दौरान माननीय न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडे ने अपने 28 अप्रैल 2026 के आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं,न्यायालय ने कहा…कि वर्ष 2015 और 2016 की नियुक्तियां अलग-अलग भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से हुई थीं, ऐसे में दोनों भर्ती प्रक्रियाओं को एक संयुक्त वरिष्ठता सूची में शामिल करना छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (सामान्य सेवा शर्तें) नियम,1961 के नियम 12 के अनुरूप नहीं माना जा सकता,न्यायालय ने 18 नवंबर 2021 के आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ताओं को नया अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है, साथ ही संबंधित प्राधिकारी को निर्देशित किया गया है कि वह 60 दिनों के भीतर वरिष्ठता सूची पर पुनर्विचार कर निर्णय ले,यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिनकी वरिष्ठता अलग-अलग भर्ती वर्षों के बावजूद संयुक्त सूची में तय की गई है, विभागीय स्तर पर इस आदेश को भविष्य की वरिष्ठता और पदोन्नति प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या यह केवल गलती थी या सुनियोजित प्रक्रिया?
पूरा मामला अब इसी प्रश्न पर आकर टिक गया है कि क्या यह केवल प्रशासनिक त्रुटि थी या फिर किसी विशेष वर्ग को लाभ पहुंचाने वाली सुनियोजित प्रक्रिया? यदि यह गलती थी तो वर्षों तक सुधार क्यों नहीं हुआ? यदि शिकायतें थीं तो जांच क्यों नहीं हुई? यदि नियम स्पष्ट थे तो मामला अदालत तक क्यों पहुंचा? इन्हीं सवालों के कारण अब कर्मचारी संगठन पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग उठा रहे हैं।
पदोन्नति आदेश भी विवाद में…
सूत्रों के अनुसार विवादित वरिष्ठता सूची के आधार पर जारी कुछ पदोन्नति आदेशों पर भी सवाल उठ रहे हैं, कर्मचारियों का कहना है कि यदि मूल वरिष्ठता सूची ही विवादित है तो उसके आधार पर जारी पदोन्नति आदेशों की भी समीक्षा होना आवश्यक है,कुछ कर्मचारी संगठन अब पूरे प्रमोशन रिकॉर्ड, फाइल मूवमेंट और प्रशासनिक अनुमोदन प्रक्रिया की जांच की मांग कर रहे हैं।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद विभाग में बढ़ा दबाव
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब विभागीय अधिकारियों पर निष्पक्ष पुनर्विचार का दबाव बढ़ गया है, कर्मचारियों का कहना है कि अब विभाग को रिकॉर्ड की पारदर्शी समीक्षा करनी होगी, विभागीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि यदि वरिष्ठता सूची में बदलाव होता है तो उसका असर पुराने प्रमोशन, पदक्रम और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
दैनिक घटती-घटना की खबरों को मिली मजबूती
दैनिक घटती-घटना ने इस पूरे विवाद को लगातार प्रमुखता से प्रकाशित किया था,अखबार ने पहले ही वरिष्ठता सूची,मेरिट विवाद,स्थापना शाखा की भूमिका और पदोन्नति आदेशों को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे,अब अदालत द्वारा पुनर्विचार के निर्देश दिए जाने के बाद अखबार द्वारा उठाए गए मुद्दों को और मजबूती मिली है,विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि यदि यह मामला लगातार सार्वजनिक नहीं होता तो शायद विवाद दबा रह जाता।
क्या होगी स्वतंत्र जांच?
वर्तमान स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विभाग केवल औपचारिक पुनर्विचार करेगा या फिर पूरे मामले की स्वतंत्र जांच भी होगी,कर्मचारी संगठनों का एक वर्ग अब आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा या स्वतंत्र प्रशासनिक जांच की मांग उठा रहा है,हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
अब सबकी नजर अगले फैसले पर
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विभाग न्यायालय के निर्देशों के बाद क्या कदम उठाता है,क्या वरिष्ठता सूची बदलेगी? क्या विवादित प्रमोशन आदेशों की समीक्षा होगी? क्या जिम्मेदारी तय होगी?
क्या फाइल प्रक्रिया की जांच होगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में सामने आएंगे,लेकिन इतना तय है कि खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग का यह वरिष्ठता विवाद अब केवल विभागीय असंतोष का मामला नहीं रहा। यह अब प्रशासनिक पारदर्शिता,जवाबदेही और सरकारी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्न बन चुका है।


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