- जुआ फड़ पर पुलिस की रेड या प्रायोजित नौटंकी? कार्रवाई से ज्यादा सवालों की चर्चा
- पूर्व पार्षद समेत कई नामचीन जुआरी गिरफ्तार,लेकिन मुख्य सरगना अब भी फरार
- देर से जागी पुलिस या दबाव की कार्रवाई? मनेन्द्रगढ़ की रेड पर उठ रहे बड़े सवाल
- मनेंद्रगढ़@अंतर्राज्यीय जुआ फड़ पर दबिश, मगर वाहन और मोबाइल गायब… पुलिसिया कार्रवाई कटघरे में
- आईजी की सख्ती के बाद दिखी सक्रियता,वर्षों से चल रहे जुआ कारोबार पर आखिरकार कार्रवाई
- थाने के पीछे से एंट्री,प्रेस नोट में देरी…आखिर क्या छिपा रही थी पुलिस?
- जुआरियों पर रेड से ज्यादा चर्चा पुलिस की ‘सेटिंग वाली कार्रवाई’ की
- मनेन्द्रगढ़ में जुआ फड़ ध्वस्त या सिर्फ दिखावटी कार्रवाई ? जिले में तेज हुई चर्चाएं
- सड़क किनारे जुआ फड़ पर दबिश,शहर के चर्चित होटल तक कब पहुंचेगी पुलिस ?

-रवि सिंह-
मनेंद्रगढ़,10 मई 2026 (घटती-घटना)। एमसीबी जिले में अवैध कारोबारों की चर्चा कोई नई बात नहीं है,जिले में कब कौन सा कारोबार किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है और किसे कब कार्रवाई का‘प्रसाद’ मिलेगा, यह अक्सर ऊपर से आने वाले दबाव और दौरे तय करते हैं,इस बार मामला जुए के बड़े फड़ का है,जहां पुलिस ने दबिश देकर छह जुआरियों को गिरफ्तार किया है, लेकिन इस कार्रवाई से ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि आखिर इतने लंबे समय से चल रहे इस कथित अंतर्राज्यीय जुआ कारोबार को पुलिस आखिर अब तक देख क्यों नहीं पाई थी?
जिले में पिछले कई महीनों से खबरें उठ रही थीं कि मनेन्द्रगढ़ क्षेत्र में बड़े स्तर पर जुआ फड़ संचालित हो रहा है,बताया जाता रहा कि यहां केवल स्थानीय खिलाड़ी नहीं बल्कि कोरिया,एमसीबी,सरगुजा और पड़ोसी मध्यप्रदेश तक के लोग पहुंचते थे, रकम छोटी-मोटी नहीं बल्कि लाखों में घूमती थी,इसके बावजूद स्थानीय पुलिस की आंखें बंद रहीं, फिर अचानक सरगुजा रेंज के आईजी दीपक झा का दौरा हुआ,अवैध कारोबारों पर सख्ती की बातें हुईं और उसके कुछ ही दिनों बाद पुलिस ने जुआ फड़ पर दबिश दे दी,अब सवाल यह है कि क्या जुआ फड़ आईजी के दौरे के बाद शुरू हुआ था? या फिर कार्रवाई केवल यह दिखाने के लिए हुई कि ‘देखिए साहब, हम काम कर रहे हैं ‘?
कार्रवाई हुई…लेकिन समय ऐसा चुना गया कि सवाल खुद पैदा हो गए…
पुलिस की एफआईआर के अनुसार कार्रवाई शाम के समय की गई और छह लोगों को गिरफ्तार कर लगभग 1 लाख 20 हजार रुपये नकद जब्त किए गए,लेकिन स्थानीय लोगों और सूत्रों की मानें तो जिस फड़ पर पुलिस ने दबिश दी,वहां असली खेल शाम ढलने के बाद शुरू होता था,बताया जाता है कि 3 से 4 बजे के बीच जुआरियों का जुटना शुरू होता था,लेकिन बड़ी बाजियां 7 से 8 बजे के बीच लगती थीं,ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि पुलिस ने इतनी जल्दीबाजी क्यों दिखाई? यदि पुलिस वास्तव में पूरे नेटवर्क को पकड़ना चाहती,तो क्या कार्रवाई थोड़ी देर बाद नहीं हो सकती थी? क्या पुलिस को यह डर था कि देर होने पर‘बड़े चेहरे’ पकड़े जाएंगे? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि पहले ही सूचना देकर‘संख्या नियंत्रित’ कर दी गई? कार्रवाई का समय ही पूरे मामले को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है।
पकड़े गए चेहरे छोटे नहीं,राजनीति और रसूख से जुड़े लोग भी शामिल
इस कार्रवाई में जो नाम सामने आए हैं,उनमें कोरिया जिले के बैकुंठपुर नगर पालिका का एक पूर्व पार्षद भी शामिल बताया जा रहा है,चर्चा यह भी है कि वह केवल खिलाड़ी नहीं बल्कि फाइनेंसर की भूमिका में था,हारने वालों को मौके पर रकम उपलब्ध कराना,ब्याज पर पैसा देना और खेल को जारी रखना—ये सब बातें स्थानीय स्तर पर चर्चा में हैं, अब सवाल यह उठता है कि क्या इतने प्रभावशाली लोग बिना किसी संरक्षण के खुलेआम सड़क किनारे जुआ खेल सकते थे? स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई छोटा-मोटा ताश का खेल नहीं था,यहां आने वालों में कारोबारी,रसूखदार और राजनीतिक संपर्क रखने वाले लोग भी शामिल रहते थे। ऐसे में पुलिस को इसकी भनक न होना अपने आप में बड़ा प्रश्न है।
अंतर्राज्यीय जुआ फड़…लेकिन पुलिस को वाहन और मोबाइल नहीं मिले!
एफआईआर में यह उल्लेख जरूर है कि आरोपी अलग-अलग जिलों और यहां तक कि दूसरे राज्य से भी आए थे,अब सामान्य समझ का सवाल है—क्या ये लोग पैदल पहुंचे थे? यदि लोग 50 से 100 किलोमीटर दूर से जुआ खेलने पहुंचे थे, तो निश्चित रूप से वे दोपहिया या चारपहिया वाहनों से आए होंगे,मोबाइल फोन भी उनके पास रहे होंगे,लेकिन पुलिस की कार्रवाई में न वाहन जब्ती का जिक्र है, न मोबाइल का, यहीं से लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि कार्रवाई ‘सीमित’ रखी गई,जितना दिखाना जरूरी था उतना दिखाया गया,बाकी चीजों को नजरअंदाज कर दिया गया,यदि पुलिस चाहती तो वाहनों के जरिए पूरे नेटवर्क की कडि़यां सामने आ सकती थीं,मोबाइल जब्ती होती तो कॉल डिटेल से यह भी स्पष्ट हो सकता था कि कौन किसे सूचना देता था,कौन फड़ संचालित करता था और किन लोगों का संरक्षण प्राप्त था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
थाने के पीछे से एंट्री…आखिर क्या छिपाना था?
पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि पकड़े गए जुआरियों को थाने के मुख्य द्वार से नहीं बल्कि पीछे की ओर से लाया गया,सूत्र बताते हैं कि जिस रास्ते से आरोपियों को अंदर लाया गया वहां सीसीटीवी कैमरों की निगरानी कम थी,अब लोग पूछ रहे हैं कि आखिर यह ‘विशेष व्यवस्था’ क्यों की गई? क्या पुलिस नहीं चाहती थी कि आरोपियों की स्पष्ट तस्वीरें सामने आएं? क्या किसी प्रभावशाली चेहरे की पहचान छिपाने की कोशिश थी? या फिर यह सब केवल संयोग था? जवाब भले न मिले हों,लेकिन सवाल बहुत तेजी से फैल चुके हैं।
मोहन नाम का ‘सरगना’ आखिर कैसे बच निकला?
स्थानीय चर्चाओं में एक नाम सबसे ज्यादा लिया जा रहा है—मोहन, बताया जा रहा है कि वही पूरे फड़ का मुख्य संचालक था,लेकिन पुलिस कार्रवाई के दौरान वह फरार हो गया,अब यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुलिस को इतनी सटीक सूचना थी, तो मुख्य व्यक्ति कैसे निकल गया? क्या उसे पहले से भनक मिल गई थी? क्या कार्रवाई शुरू होने से पहले किसी ने सूचना पहुंचाई? या फिर पुलिस केवल छोटे और मध्यम स्तर के खिलाडि़यों तक सीमित रहना चाहती थी? यदि मुख्य संचालक ही बच निकले तो कार्रवाई की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मनेन्द्रगढ़ का चर्चित होटल और ‘सीसीटीवी सुरक्षा कवच’
स्थानीय स्तर पर एक और चर्चा लंबे समय से चल रही है की शहर के बीचोंबीच स्थित एक प्रसिद्ध होटल में बड़े स्तर पर जुआ संचालन,बताया जाता है कि वहां प्रवेश और निकास पर नजर रखने के लिए सीसीटीवी कैमरों की मजबूत व्यवस्था है, किसी भी अनजान गतिविधि की सूचना तुरंत अंदर पहुंचा दी जाती है, लोग व्यंग्य में कहते हैं कि उस होटल की सुरक्षा व्यवस्था किसी बैंक से कम नहीं है,फर्क सिर्फ इतना है कि वहां नकदी का लेन-देन ‘मनोरंजन’ के नाम पर होता है,अब सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस कभी उस होटल तक भी पहुंचेगी? या फिर सड़क किनारे दबिश देकर ही ‘जुआ विरोधी अभियान’ पूरा मान लिया जाएगा?
आईजी के डर से कार्रवाई या सचमुच अपराध के खिलाफ अभियान?
पूरे घटनाक्रम को लेकर जिले में दो तरह की राय चल रही है,पहली राय यह है कि सरगुजा आईजी दीपक झा के सख्त रुख के कारण स्थानीय पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी, लंबे समय से चल रहे कारोबार पर आखिरकार दबिश पड़ी और यह संदेश गया कि ऊपर तक शिकायत पहुंचने पर कार्रवाई संभव है, दूसरी राय इससे बिल्कुल अलग है,लोग कह रहे हैं कि यह पूरी कार्रवाई ‘प्रायोजित प्रदर्शन’ जैसी थी—इतनी कि साहब को रिपोर्ट भेजी जा सके, लेकिन इतनी नहीं कि पूरे नेटवर्क की जड़ें हिल जाएं, यही कारण है कि लोग अब केवल गिरफ्तारियों से संतुष्ट नहीं हैं, वे यह देखना चाहते हैं कि क्या पुलिस आगे बढ़कर मुख्य संचालकों तक पहुंचेगी, क्या संरक्षण देने वालों की भूमिका सामने आएगी और क्या बड़े ठिकानों पर भी दबिश होगी।
जिले में अवैध कारोबारों पर सवाल बरकरार
एमसीबी जिले में जुआ, सट्टा, अवैध शराब और दूसरे कारोबारों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, कार्रवाई भी होती है, लेकिन अक्सर छोटे स्तर तक सीमित रह जाती है, बड़े नेटवर्क पर हाथ डालने से पहले ही मामला ठंडा पड़ जाता है, इस बार भी लोगों की नजरें पुलिस पर हैं, क्या यह कार्रवाई वास्तव में एक शुरुआत है? क्या आगे और बड़े नाम सामने आएंगे? क्या फरार सरगना गिरफ्तार होगा? क्या होटलों और कथित सुरक्षित ठिकानों तक पुलिस पहुंचेगी? या फिर कुछ दिनों बाद मामला पुरानी फाइलों की तरह शांत हो जाएगा? फिलहाल जिले में यही चर्चा है कि जुआ फड़ पर पड़ी यह दबिश केवल पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था की परीक्षा भी है।
उक्त कार्यवाही में ये रहे शामिल
निरीक्षक विवेक पाटले, थाना प्रभारी मनेन्द्रगढ़,प्रधान आरक्षक पुष्कल सिन्हा (सायबर सेल),प्रधान आरक्षक प्रिन्स,प्रधान आरक्षक सुनील रजक,प्रधान आरक्षक रवि शर्मा,आरक्षक उत्तरा कश्यप, आरक्षक भूपेंद्र यादव (सायबर सेल),आरक्षक प्रमोद यादव (सायबर सेल), आरक्षक जितेन्द्र ठाकुर (सायबर सेल),आरक्षक दीप तिवारी (सायबर सेल),सचिन खुरसेल,चालक नोहर सिंह, चालक रोशन राव, सैनिक विनीत सोनी की सराहनीय भूमिका रही।
गिरफ्तार आरोपी
नीलेश सोनी – निवासी कोतमा जिला अनुपपुर (म.प्र.)
आफताब अहमद – निवासी बैकुण्ठपुर जिला कोरिया
राकेश सेन – निवासी चिरमिरी जिला एमसीबी
हरदीप सिंह – निवासी चिरमिरी
श्रवण कुमार जायसवाल – निवासी मनेन्द्रगढ़
आलोक कुमार केंवट – निवासी मनेन्द्रगढ़
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