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कोरिया/एमसीबी@ केंद्र से करोड़ों की मंजूरी,फिर भी मुआवजे के लिए भटक रहे एनएच प्रभावित

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  • एनएच परियोजना में जमीन गई,मुआवजा अब भी अधूरा
  • फाइलों में भुगतान पूरा,जमीन पर हितग्राही परेशान
  • कोरिया-MCB में एनएच मुआवजा बना उलझन, स्वीकृति के बाद भी इंतजार
  • मार्च में अप्रूवल, मई में भी भुगतान अधूरा राष्ट्रीय राजमार्ग बना,लेकिन भू-स्वामियों का मुआवजा अटका
  • करोड़ों की राशि स्वीकृत,फिर भी कार्यालयों के चक्कर काट रहे प्रभावित


-रवि सिंह-
कोरिया/एमसीबी,10 मई 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया और एमसीबी जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना से प्रभावित सैकड़ों भू-स्वामियों के लिए मुआवजा अब सिर्फ सरकारी फाइलों का विषय बनकर रह गया है। केंद्र सरकार द्वारा मार्च माह में करोड़ों रुपये की लंबित राशि को स्वीकृति दिए जाने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि वर्षों से अटका भुगतान अब शीघ्र पूरा हो जाएगा,लेकिन जमीनी हकीकत आज भी उलझी हुई नजर आ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति यह है कि कई हितग्राही अब भी यह जानने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं कि उनका भुगतान आखिर किस श्रेणी में लंबित है,मूल मुआवजा,संशोधित अवार्ड या फिर आर्बिट्रेशन प्रकरण, विभागीय दस्तावेजों में करोड़ों रुपये की राशि स्वीकृत और प्रक्रिया में दिखाई दे रही है, लेकिन अनेक प्रभावित परिवारों के बैंक खाते अब भी खाली हैं।
केंद्र सरकार की स्वीकृति से जगी थी उम्मीद
राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-43 (पुराना एनएच-78) के एमपीसीजी बॉर्डर से सूरजपुर सेक्शन तक सड़क चौड़ीकरण और उन्नयन कार्य के लिए केंद्र सरकार ने संशोधित लागत प्रस्ताव को मंजूरी दी,मंत्रालय स्तर से जारी स्वीकृति में भूमि अधिग्रहण मद में भारी राशि का प्रावधान भी किया गया, दस्तावेजों में यह स्पष्ट है कि परियोजना के लिए द्वितीय संशोधित लागत अनुमान को मंजूरी प्रदान की गई तथा भूमि अधिग्रहण संबंधी व्यय को बढ़ाया गया, इससे प्रभावित लोगों को उम्मीद जगी कि वर्षों से लंबित मुआवजा अब मिल सकेगा, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब स्वीकृति,पत्राचार और भुगतान प्रस्ताव की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी,तब आखिर भुगतान जमीन पर क्यों नहीं पहुंचा?
विभागीय पत्रों में बार-बार शीघ्र भुगतान का उल्लेख
दस्तावेजों में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है, विभिन्न अधिकारियों द्वारा जारी पत्रों में कई बार शीघ्र भुगतान और राशि जमा कराने का उल्लेख किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि विभागीय स्तर पर भी भुगतान लंबित रहने की स्थिति को लेकर चिंता थी,कुछ पत्रों में यह तक उल्लेख है कि प्रभावित भू-स्वामी लगातार आवेदन प्रस्तुत कर रहे हैं और कलेक्टर स्तर की बैठकों में भी भुगतान का मुद्दा उठाया जाता रहा है, यानी फाइलों में समस्या का उल्लेख लगातार होता रहा, लेकिन समाधान अब तक पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर सका।
करोड़ों की राशि के दस्तावेज…लेकिन हितग्राही अब भी परेशान
विभागीय रिकॉर्ड में लगभग 12 करोड़ रुपये तथा करीब 4.56 करोड़ रुपये की राशि जमा कराने और भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ाने का उल्लेख सामने आया है, हैंड रिसिप्ट, रिवाइज्ड डाटा एंट्री फॉर्म और विभागीय पत्राचार में यह राशि भू-स्वामियों के भुगतान हेतु दर्शाई गई है, इसके बावजूद कई ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब तक वास्तविक भुगतान प्राप्त नहीं हुआ,कुछ प्रभावित परिवारों का आरोप है कि उन्हें समय पर यह तक नहीं बताया गया कि कौन-कौन से दस्तावेज आवश्यक हैं और किस प्रक्रिया के तहत भुगतान होना है, ग्रामीणों के अनुसार कई बार बैंक खाता, आधार,भूमि दस्तावेज और अन्य आवश्यक अभिलेख जमा कराने के बाद भी फाइल आगे नहीं बढ़ी,कई हितग्राहियों का कहना है कि विभागीय स्तर पर स्पष्ट जानकारी नहीं मिलने से लोग लगातार भ्रम की स्थिति में हैं।
ब्याज और अतिरिक्त वित्तीय भार का भी सवाल
लंबे समय तक भुगतान लंबित रहने से अब एक बड़ा वित्तीय सवाल भी खड़ा हो रहा है, यदि मुआवजा भुगतान में देरी हुई है और मामले न्यायालयीन प्रक्रिया तक पहुंचे हैं,तो भविष्य में ब्याज और अतिरिक्त भुगतान का भार भी बढ़ सकता है,विशेषज्ञों का मानना है कि भूमि अधिग्रहण मामलों में देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं होती,बल्कि इससे परियोजना लागत भी बढ़ती है और शासन पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ता है।
न्यायालयीन प्रक्रिया का सम्मान, लेकिन लोगों का धैर्य जवाब दे…
मामला न्यायालयीन विचाराधीन होने के कारण प्रभावित पक्ष खुलकर आक्रोश व्यक्त करने से बच रहे हैं,अधिकांश लोग न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए संयमित रूप से अपनी बात रख रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों तक जमीन चली जाने के बाद भी यदि मुआवजा अधूरा रह जाए,तो परिवार आर्थिक और मानसिक दोनों स्तर पर प्रभावित होते हैं। कई परिवारों का कहना है कि सड़क बन गई, गाडि़यां दौड़ने लगीं, लेकिन जिनकी जमीन गई वे आज भी भुगतान का इंतजार कर रहे हैं।
लोगों की मुख्य मांगें…
प्रभावित हितग्राहियों ने शासन और प्रशासन से मांग की है कि लंबित मूल मुआवजा प्रकरणों की स्पष्ट सूची जारी की जाए,आर्बिट्रेशन और सामान्य मुआवजा मामलों को अलग-अलग सार्वजनिक किया जाए, ग्राम स्तर पर शिविर लगाकर दस्तावेज सत्यापन किया जाए,पात्र हितग्राहियों को समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित किया जाए,भुगतान की स्थिति ऑनलाइन और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए,अब देखना यह होगा कि करोड़ों की स्वीकृति और लंबे विभागीय पत्राचार के बाद प्रशासन जमीनी स्तर पर राहत पहुंचाने में कितनी तेजी दिखाता है,क्योंकि सड़क परियोजना तो पूरी हो चुकी है,लेकिन मुआवजे की सड़क अब भी कई हितग्राहियों के लिए अधूरी दिखाई दे रही है।
आर्बिट्रेशन और मूल मुआवजा में उलझे लोग
पूरे मामले में सबसे बड़ा भ्रम आर्बिट्रेशन प्रकरण और मूल मुआवजा को लेकर बताया जा रहा है,हाल में जारी स्वीकृतियों और पत्राचार में मुख्य रूप से कुछ आर्बिट्रेशन मामलों का उल्लेख सामने आया है, जबकि अनेक प्रभावित परिवारों का दावा है कि उनका मूल मुआवजा ही अभी तक लंबित है,ग्रामीणों का कहना है कि जिन मामलों में न्यायालयीन आदेश या संशोधित अवार्ड जारी हुए,उन पर विभागीय प्रक्रिया कुछ आगे बढ़ी दिखाई देती है,लेकिन कई सामान्य भू-स्वामियों को अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि उनका प्रकरण किस स्थिति में है, यही कारण है कि प्रभावित लोग आज भी तहसील,एसडीएम कार्यालय,राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग और कलेक्टर कार्यालय के बीच भटकते नजर आ रहे हैं।
जिनके संपर्क में हों…उन्हें सूचित कर दीजिए…
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि विभागीय स्तर से मौखिक रूप से कुछ लोगों तक सूचना पहुंचाई जा रही है कि जिन हितग्राहियों का संपर्क उपलब्ध है,उन्हें मुआवजा संबंधी जानकारी दी जाए,लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार भी हैं जिन्हें अब तक न तो आधिकारिक सूचना मिली और न ही भुगतान प्रक्रिया की स्पष्ट स्थिति बताई गई, इससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है,कई प्रभावितों का कहना है कि यदि प्रशासन ग्राम पंचायत स्तर पर सार्वजनिक सूचना जारी करे, पात्र हितग्राहियों की सूची प्रकाशित करे और भुगतान की वास्तविक स्थिति बताए,तो भ्रम की स्थिति काफी हद तक समाप्त हो सकती है।


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