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पटना/कोरिया@ पटना नगर पंचायत में टेंडर नहीं,महायज्ञ चल रहा है!

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  • पटना नगर पंचायत में टेंडर नहीं,”सेटिंग सम्मेलन” चल रहा है!
  • 60 लाख के काम पर ऐसा प्रेम,टेंडर खुलने से पहले ठेकेदार तय!
  • 29 अप्रैल को खुलना था टेंडर,अब तक चल रही ‘मैनेजमेंट प्रक्रिया’
  • पटना नगर पंचायत में विकास कम, सेटिंग ज्यादा तेज
  • 12 ने डाला टेंडर,काम फिर भी एक “तयशुदा” ठेकेदार का?
  • सीसी सड़क और चेकर टाइल्स से ज्यादा मजबूत दिख रही सेटिंग
  • टेंडर रुका है या कमीशन का गणित अभी बाकी है?
  • नगर पंचायत पटना में टेंडर खोलने से पहले ठेकेदारों का “शुद्धिकरण अभियान
  • टेंडर खुलने से पहले ही विजेता की चर्चा, आखिर अंदरखाने चल क्या रहा है?
  • 60 लाख के काम पर ऐसी साधना कि 29 अप्रैल से टेंडर आज तक “ध्यान मुद्रा” में बैठा है?


-रवि सिंह-
पटना/कोरिया,09 मई 2026(घटती-घटना)।
कोरिया जिले के इकलौते नगर पंचायत पटना में इन दिनों विकास कार्य कम और व्यवस्थित विकास ज्यादा चर्चा में है,नगर पंचायत में लगभग 60 लाख रुपये के सीसी सड़क और चेकर टाइल्स निर्माण कार्य का टेंडर ऐसा रहस्यमयी अध्याय बन चुका है, जिसे समझने के लिए शायद इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि तंत्र-मंत्र और राजनीतिक ज्योतिष की जरूरत पड़ जाए, कहने को यह सिर्फ एक सामान्य टेंडर प्रक्रिया है, लेकिन नगर में चर्चा ऐसे हो रही है मानो कोई राजतिलक होना हो और पूरा राज्य उसी की तैयारी में जुटा हो, फर्क सिर्फ इतना है कि यहां सिंहासन की जगह ठेका है और राजमुकुट की जगह वर्क ऑर्डर।


डिजिटल सिग्नेचर का ‘रहस्य’ और 60 लाख का टेंडर
पटना नगर पंचायत में 60 लाख रुपये के सीसी सड़क और चेकर टाइल्स निर्माण कार्य से जुड़ा टेंडर अब सिर्फ निर्माण कार्य नहीं,बल्कि रहस्यों का केंद्र बनता जा रहा है, पहले टेंडर निर्धारित तारीख 29 अप्रैल को नहीं खुला और अब इसके पीछे डिजिटल सिग्नेचर की कहानी चर्चा का विषय बनी हुई है,नगर में लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि मुख्य नगर पालिका अधिकारी से पहले इंजीनियर पदस्थ हो गए, कार्यालय संभाल लिया,लेकिन आज तक उनका डिजिटल सिग्नेचर तैयार नहीं हो पाया, बताया जा रहा है कि 29 अप्रैल को टेंडर खोला जा सकता था,लेकिन ऐन वक्त पर यह जानकारी दी गई कि इंजीनियर के पास डिजिटल सिग्नेचर नहीं है,इसलिए वे प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकते, दूसरी ओर मुख्य नगर पालिका अधिकारी के बाहर होने की बात कही गई,अब सवाल यह उठ रहा है कि जब टेंडर प्रक्रिया पहले से तय थी,तब डिजिटल सिग्नेचर जैसी अनिवार्य व्यवस्था समय पर क्यों नहीं की गई? क्या यह केवल तकनीकी लापरवाही है या फिर इसके पीछे कोई सुविधाजनक देरी छिपी हुई है? नगर में इस बात की भी चर्चा है कि यदि इंजीनियर के पास अधिकारिक डिजिटल सिग्नेचर नहीं था तो फिर टेंडर प्रक्रिया की पूरी जिम्मेदारी किस व्यवस्था के भरोसे चल रही थी,लोग व्यंग्य में कह रहे हैं कि यहां सड़क निर्माण से पहले डिजिटल सिग्नेचर का निर्माण जरूरी हो गया है,अब नगर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर टेंडर प्रक्रिया को नियंत्रित कौन कर रहा है—तकनीकी व्यवस्था, प्रशासनिक मजबूरी या फिर पर्दे के पीछे चल रही कोई और सेटिंग?
29 अप्रैल को खुलना था टेंडर… पर टेंडर ने भी कहा…अभी नहीं
सरकारी कागजों के अनुसार टेंडर 29 अप्रैल को खुलना था,तारीख आई, लोग इंतजार में बैठे, ठेकेदारों ने फाइलें संभालीं,कुछ ने मिठाई तक का इंतजाम कर लिया होगा,लेकिन टेंडर नहीं खुला,अब 9 मई तक भी टेंडर नहीं खुल पाया, नगर में लोग पूछ रहे हैं क्या टेंडर की चाबी खो गई? या फिर सिस्टम अभी ग्रह-नक्षत्र देख रहा है? लेकिन सूत्रों की मानें तो मामला ग्रह-नक्षत्र का नहीं, सेटिंग नक्षत्र का है, चर्चा यह है कि जिस ठेकेदार को काम मिलना तय माना जा रहा है, उसकी पूरी व्यवस्था अभी फाइनल नहीं हो पाई थी, इसलिए टेंडर भी तब तक समाधि में चला गया जब तक सभी ग्रह एक लाइन में न आ जाएं।
विकास कार्य नहीं,पूर्व निर्धारित कार्यक्रम
स्थानीय चर्चा तो यहां तक कह रही है कि यह टेंडर प्रक्रिया नहीं,बल्कि पहले से लिखा गया स्क्रीनप्ले है। कलाकार तय हैं,डायलॉग तय हैं, बस जनता को यह महसूस कराया जा रहा है कि मुकाबला बहुत कड़ा है, बताया जा रहा है कि करीब 12 लोगों ने टेंडर डाला है, अब 12 लोगों ने टेंडर क्यों डाला, यह अलग विषय है, लेकिन नगर में यह चर्चा ज्यादा जोर पकड़ रही है कि अब उन 12 में से कितनों को समझाया जाएगा, किसी को सम्मानपूर्वक बाहर किया जाएगा, किसी को आर्थिक राष्ट्रनिर्माण में सहयोग का अवसर दिया जाएगा, और जो फिर भी नहीं मानेगा, उसके लिए लोकतंत्र का सबसे पुराना फार्मूला तैयार है — साम, दाम, दंड, भेद।
5 प्रतिशत त्यागियों को,10 प्रतिशत सिस्टम को!
नगर की राजनीतिक और ठेकेदारी गलियों में इन दिनों गणित भी खूब चल रहा है, सूत्रों के हवाले से ऐसी चर्चाएं हैं कि जो लोग टेंडर से पीछे हट जाएंगे, उनके लिए लगभग 5 प्रतिशत सम्मान राशि की व्यवस्था हो सकती है, अब इसे त्यागपत्र सम्मान कहें या प्रतियोगिता छोड़ो प्रोत्साहन योजना — यह समझना कठिन है,इसके बाद चर्चा यह भी है कि करीब 10 प्रतिशत सिस्टम में जाएगा, यानी विकास कार्य शुरू होने से पहले ही विकास राशि का आध्यात्मिक विभाजन प्रारंभ हो चुका है। सड़क अभी बनी नहीं,लेकिन कमीशन की सड़कें पहले ही चार लेन हो चुकी हैं।
आखिर वह ठेकेदार कौन है?
नगर में इन दिनों एक नाम हवा में तेजी से तैर रहा है कोई देवाशीष है, चर्चा यह है कि काम उसी को मिलना लगभग तय माना जा रहा है, लोग अब मजाक में पूछने लगे हैं जब सब तय है तो टेंडर की जरूरत क्या थी? किसी ने तो यहां तक कह दिया सीधे बोर्ड लगा देते, यह काम पहले से आरक्षित है, कृपया बाकी ठेकेदार अपना समय और डीजल बचाएं,हालांकि आधिकारिक रूप से अब तक कुछ घोषित नहीं हुआ है,लेकिन नगर में जिस आत्मविश्वास के साथ नाम लिया जा रहा है,उससे लोग हैरान जरूर हैं।
नगर पंचायत में एकता का अद्भुत उदाहरण
देश में जहां राजनीतिक दलों,विभागों और अधिकारियों में अक्सर मतभेद देखने को मिलते हैं, वहीं पटना नगर पंचायत ने एक नई मिसाल पेश कर दी है, यहां चर्चा है कि प्रतिनिधि और अधिकारी सभी एकजुट हैं, इतनी एकजुटता तो शायद नगर विकास योजनाओं में भी कभी नहीं दिखी होगी, सड़क, पानी, सफाई और नाली के मुद्दों पर भले मतभेद हो जाएं, लेकिन कौन ठेकेदार अपना है इस मुद्दे पर कथित तौर पर सभी का सामूहिक चिंतन जारी है।
टेंडर नहीं खुल रहा या मैनेजमेंट प्रक्रिया चल रही है?
नगर के जानकारों का कहना है कि यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो फिर निर्धारित तिथि के बाद भी टेंडर क्यों नहीं खोला गया? क्या कोई तकनीकी कारण है? क्या कोई प्रशासनिक आदेश लंबित है? या फिर वास्तव में अंदरखाने वही सब चल रहा है जिसकी चर्चा चाय दुकानों से लेकर कार्यालयों तक हो रही है? सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि टेंडर प्रक्रिया निष्पक्ष है तो उसकी स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
जनता भी अब समझदार हो गई है…
पहले लोग सोचते थे कि सड़क बन रही है तो विकास हो रहा है। अब लोग समझने लगे हैं कि सड़क बनने से पहले कितनी राजनीतिक इंजीनियरिंग और आर्थिक वास्तुशास्त्र काम करता है, नगर में लोग अब खुलकर कह रहे हैं कि सड़क की मोटाई बाद में नापी जाएगी, पहले कमीशन की गहराई मापी जा रही है।
अब सबकी नजर अंतिम परिणाम पर…
फिलहाल पटना नगर पंचायत का यह 60 लाख वाला टेंडर पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है, अब देखना यह है कि जब टेंडर खुलेगा तो क्या वही नाम सामने आएगा जिसकी चर्चा पहले से चल रही है,या फिर प्रशासन सभी आरोपों को गलत साबित करते हुए पारदर्शी प्रक्रिया का उदाहरण पेश करेगा,लेकिन फिलहाल नगर में एक ही चर्चा है,टेंडर खुले न खुले,सेटिंग पूरी होनी चाहिए।


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