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कोरिया@नेता-अधिकारी व्यस्त अपने हित में, देश-गांव का भविष्य भगवान भरोसे

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  • स्वार्थ में डूबे जिम्मेदार,भविष्य अंधेरे में…विकास बना केवल दिखावा
  • योजनाएं कागजों में…भविष्य संकट में…किस दिशा में जा रहा विकास? कमीशन की राजनीति में दबा भविष्य,विकास हुआ खोखला
  • आज के स्वार्थ में गुम कल की चिंता,व्यवस्था पर उठते सवाल
  • जंगल कटे, तालाब पाटे : जिम्मेदारों ने भविष्य को किया नजरअंदाज
  • विकास नहीं,स्वार्थ तेजी से दौड़ रहा और जिम्मेदारों की प्राथमिकता पर सवाल दौड़
  • नल, सड़क, योजना…सब कागजों में,जमीनी हकीकत में संकट
  • राजनीति में उलझा समाज,भविष्य की चिंता गायब
  • स्वार्थ की व्यवस्था में कैद देश का भविष्य,नेता-अधिकारी और आमजन—सब वर्तमान में खोए,भविष्य बेपरवाह
  • दूरदर्शिता गायब,स्वार्थ हावी : विकास की दिशा पर बड़ा सवाल


-रवि सिंह-
कोरिया,18 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। लोकतांत्रिक व्यवस्था में देश,राज्य,जिले, शहर और गांव के भविष्य को दिशा देने की जिम्मेदारी जिन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के कंधों पर होती है, वही आज अपने निजी स्वार्थों में इतने उलझ चुके हैं कि दूरदर्शी विकास की अवधारणा लगभग समाप्त होती नजर आ रही है, योजनाएं बन रही हैं, घोषणाएं हो रही हैं, बजट आवंटित हो रहे हैं, लेकिन इन सबके बीच जो सबसे महत्वपूर्ण पहलू है की भविष्य की ठोस और स्थायी योजना वह कहीं दिखाई नहीं देती,आज की स्थिति यह है कि वर्तमान की जरूरतों को भी आधा-अधूरा पूरा किया जा रहा है,जबकि भविष्य की चुनौतियों को लेकर कोई गंभीर चिंतन नहीं हो रहा,नीतियों और योजनाओं का स्वरूप ऐसा हो गया है,जिसमें दीर्घकालिक विकास की बजाय तात्कालिक लाभ और व्यक्तिगत स्वार्थ प्राथमिकता बन गए हैं।
योजनाओं का निर्माण या स्वार्थ का साधन?- यदि जमीनी स्तर पर देखा जाए तो विकास योजनाओं का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है, पहले योजनाएं इस दृष्टि से बनाई जाती थीं कि आने वाली पीढि़यों को बेहतर संसाधन और सुरक्षित वातावरण मिल सके। लेकिन वर्तमान में कई योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं,ऐसी योजनाएं तैयार की जाती हैं, जिनका उद्देश्य विकास कम और निजी लाभ अधिक होता है, इन योजनाओं की उम्र भी अक्सर एक या दो वर्षों तक ही सीमित रहती है,दीर्घकालिक परियोजनाएं केवल दस्तावेजों में दिखाई देती हैं,जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग होती है,विकास का जो सपना जनता को दिखाया जाता है,वह अक्सर अधूरा ही रह जाता है,लोगों को उम्मीदें दी जाती हैं,लेकिन उन उम्मीदों को पूरा करने की दिशा में ठोस प्रयास नजर नहीं आते।
पर्यावरण और संसाधनों की अनदेखी- भविष्य की चिंता का सबसे बड़ा पहलू प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता है, लेकिन इस दिशा में भी गंभीर लापरवाही देखने को मिल रही है,न तो जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है और न ही वायु गुणवत्ता को सुधारने के प्रयास हो रहे हैं,जंगलों की कटाई लगातार जारी है, तालाबों को पाटकर निर्माण कार्य किए जा रहे हैं और नदियों की स्थिति भी चिंताजनक होती जा रही है, पर्यावरण,जो आने वाली पीढि़यों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति है,उसे आज केवल उपयोग की वस्तु मान लिया गया है,इतिहास गवाह है कि पहले के समय में जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अत्यंत दूरदर्शी सोच अपनाई जाती थी,बड़े-बड़े बांध, तालाब और जल स्रोत इसी सोच का परिणाम थे, लेकिन वर्तमान में ऐसी सोच लगभग गायब हो चुकी है।
कमीशन आधारित विकास का आरोप– समाज में यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि विकास योजनाओं का चयन और क्रियान्वयन अब गुणवत्ता या आवश्यकता के आधार पर नहीं, बल्कि कमीशन के आधार पर हो रहा है, यह बात आम लोग नहीं,बल्कि वे लोग कहते हैं जो सीधे तौर पर इन योजनाओं से जुड़े होते हैं या काम के लिए अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के संपर्क में आते हैं,ऐसी स्थिति में योजनाओं की प्राथमिकता भी बदल जाती है, जो योजना अधिक आर्थिक लाभ दे सकती है,उसे प्राथमिकता दी जाती है, भले ही उसका दीर्घकालिक महत्व कम क्यों न हो,इससे वास्तविक विकास प्रभावित होता है और संसाधनों का दुरुपयोग बढ़ता है।
स्वार्थ के बीच धूमिल होती भविष्य की चिंता- जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के लिए आज सबसे बड़ी प्राथमिकता व्यक्तिगत लाभ बन गई है, आर्थिक संसाधनों का संग्रह ही उनके लिए सफलता का मापदंड बन चुका है, इस सोच ने भविष्य की चिंता को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है,ऐसा कोई ठोस उदाहरण सामने नहीं आता,जहां दूरदर्शिता के साथ योजनाओं का निर्माण किया गया हो। अधिकांश निर्णय अल्पकालिक लाभ को ध्यान में रखकर लिए जा रहे हैं।
भविष्य की चुनौतियां और अनदेखी- यदि वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखा जाए,तो आने वाले समय में जल संकट,पर्यावरण असंतुलन और संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं,लेकिन इन चुनौतियों से निपटने के लिए अभी से कोई ठोस रणनीति बनती नजर नहीं आती,यदि यही स्थिति बनी रही,तो आने वाली पीढि़यों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। विकास की जो तस्वीर आज प्रस्तुत की जा रही है, वह वास्तविकता से काफी दूर है।
वर्तमान में सिमटी व्यवस्था-
आज की व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट यह है कि वह केवल वर्तमान तक सीमित होकर रह गई है, भविष्य की कोई स्पष्ट रूपरेखा नहीं दिखाई देती। नीतियां बन रही हैं, लेकिन उनमें स्थायित्व का अभाव है, समाज को जाति, धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर विभाजित कर दिया गया है, इससे लोगों का ध्यान मूल मुद्दों से हटकर अन्य विषयों पर केंद्रित हो गया है। परिणामस्वरूप, भविष्य की चुनौतियों पर गंभीर चर्चा ही नहीं हो पा रही है।
आम लोगों की भूमिका भी सवालों में-
केवल नेताओं और अधिकारियों को ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, आम लोगों की भूमिका भी इस स्थिति में महत्वपूर्ण है, आज समाज का एक बड़ा वर्ग राजनीतिक विचारधाराओं में बंट चुका है और खुद को किसी न किसी विचारधारा का समर्थक साबित करने में लगा हुआ है, इस प्रक्रिया में लोग भविष्य की वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे हैं, जल संकट, पर्यावरण संरक्षण, संसाधनों की कमी जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा बहुत कम हो रही है, हर स्तर पर यदि कोई चिंतन हो रहा है, तो वह केवल राजनीतिक लाभ और हानि तक सीमित है।
दिशा बदलने की जरूरत
आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास की परिभाषा को फिर से परिभाषित किया जाए, योजनाओं का निर्माण केवल वर्तमान को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए,जिम्मेदारों को अपने दायित्व को समझना होगा और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर काम करना होगा, साथ ही आम लोगों को भी जागरूक होकर वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, यदि समय रहते दिशा नहीं बदली गई, तो विकास का सपना केवल सपना बनकर ही रह जाएगा और आने वाला भविष्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।


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