


- महाशिवरात्रि में सियासी मिलनः मंच पर गले मिले,मैदान में भिड़ेंगे?
- कथा के मंच पर सत्ता-विपक्ष का महामिलन,कार्यकर्ता हुए मौन
- जब शिव ने कराया सियासी समन्वयःविरोधी एक ही पंडाल में…
- राजनीति ने ओढ़ी भक्ति की चादर,विरोध हुआ शीतल…मंच पर नम्रता, मंच से बाहर तीखेपन का क्या?
- पैर छूती राजनीति और देखती जनता…जहाँ बयान थमे,वहाँ गले मिले नेता…
- कथा में श्रद्धा,फ्रेम में सियासी समीकरण…शिव महापुराण के बीच सियासी‘महामिलन’ की कथा’
-संवाददाता-
कोरिया,15 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। महाशिवरात्रि का दिन, स्थान- सोनहत, अवसर -शिवमहापुराण कथा,आयोजन-भरतपुर-सोनहत की विधायक रेणुका सिंह द्वारा, लेकिन यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था,यह वह दिन था जब राजनीति ने भगवा चादर ओढ़ ली, बयानबाजी ने मौन व्रत रख लिया और सत्ता-विपक्ष ने मंच साझा कर ऐसा दृश्य रचा कि कार्यकर्ताओं की विचारधारा कुछ देर के लिए ‘हैंग’ हो गई।
कथा कम, कथानक ज्यादा
शिव महापुराण की कथा चल रही थी, मंच पर भक्ति का माहौल था,पर दर्शकों की नजरें कहीं और टिकी थीं,स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल पहुंचे, पूर्व विधायक गुलाब कमरो भी आए,नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत और उनकी धर्मपत्नी सांसद ज्योत्सना महंत भी उपस्थित रहीं,अब सामान्य राजनीतिक कैलेंडर में ये नाम एक ही वाक्य में कम ही मिलते हैं—पर उस दिन ये एक ही मंच पर,एक ही पंडाल में, एक ही कैमरे के फ्रेम में थे।
पैर छूने की राजनीति-दृश्य कुछ यूँ था…
मंत्री हाथ जोड़कर झुके, नेता प्रतिपक्ष ने मुस्कुराकर अभिवादन स्वीकार किया, विपक्ष की सांसद और सत्ता की विधायक गले मिले,पूर्व विधायक पास खड़े होकर चर्चा करते दिखे,कार्यकर्ता दूर से देख रहे थे—वही कार्यकर्ता जो कल तक सोशल मीडिया पर एक-दूसरे की पोस्ट पर तर्कों की तलवारें चला रहे थे, शायद कुछ के मन में सवाल उठा होगा। ‘हम तो फेसबुक पर युद्ध लड़ रहे थे… और यहां हमारे नेता ‘महामिलन’ कर रहे हैं? ‘
शिव की कृपा या सियासी गणित?
महाशिवरात्रि का दिन विरोधों के समन्वय का प्रतीक माना जाता है, शिव स्वयं विरोधाभासों के देव हैं—भस्म भी,चंदन भी; संहार भी,सृजन भी,तो क्या उसी भाव में सत्ता और विपक्ष ने भी अपने मतभेदों पर कुछ देर के लिए भस्म लगा दी? या यह आगामी राजनीतिक समीकरणों का ट्रेलर था? राजनीति में हर मुस्कान का विश्लेषण होता है,हर हाथ मिलाने का अर्थ निकाला जाता है,यहां तो गले भी मिले गए—इसलिए चर्चाओं के फुहारे स्वाभाविक हैं।
कार्यकर्ताओं के लिए ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’
सबसे दिलचस्प स्थिति उन जमीनी कार्यकर्ताओं की रही जो वर्षों से ‘हम बनाम वो’ की भावना में तपस्या कर रहे हैं, जब उनके नेता एक-दूसरे को सम्मान देते दिखे तो विचारधारा का हार्डवेयर कुछ देर के लिए रिस्टार्ट मांगने लगा,सवाल उठे—अगर मंच पर संवाद संभव है तो मैदान में इतना तनाव क्यों? अगर व्यक्तिगत संबंध इतने मधुर हैं तो बयान इतने कड़वे क्यों?
धर्मस्थलः राजनीति का न्यूट्रल जोन
धार्मिक आयोजन अक्सर राजनीति के लिए ‘न्यूट्रल ज़ोन’ बन जाते हैं, यहां न भाषण में तीखापन होता है,न मंच से आरोप-प्रत्यारोप,यह वह जगह है जहां नेता प्रतिद्वंद्वी नहीं,श्रद्धालु बन जाते हैं, और शायद यही वह क्षण होता है जब जनता नेताओं का दूसरा चेहरा देखती है कम आक्रामक,ज्यादा विनम्र।
जनता की स्मृति तेज होती है
जनता सब देखती है, वह मंच पर झुकते हाथ भी देखती है और चुनावी मंच से उठती उंगली भी, वह जानती है कि राजनीति प्रतिस्पर्धा का खेल है, पर यह भी समझती है कि व्यक्तिगत रिश्ते अलग होते हैं, इस आयोजन ने यही संदेश छोड़ा दल अलग हो सकते हैं, पर संवाद की डोर पूरी तरह टूटती नहीं।
कथा से बड़ा संदेश
शिव महापुराण की कथा तो चलती रही, श्लोक गूंजते रहे,पर असली चर्चा पंडाल के बाहर चाय की दुकानों पर हुई, ‘देखा, कैसे गले मिले?’‘मंत्री जी तो खुद झुक गए!’‘लगता है राजनीति बदल रही है…’ शायद राजनीति नहीं बदली, बस उसका मानवीय पक्ष सामने आया, महाशिवरात्रि के इस ‘महामिलन’ ने यह जरूर दिखा दिया कि विचारधाराएं टकरा सकती हैं,पर संबंध हमेशा शत्रुता में नहीं बदलते,और कार्यकर्ताओं के लिए संदेश साफ है नेताओं की तस्वीरें कभी-कभी आपकी बहसों से बड़ी हो जाती हैं,कथा समाप्त हुई,प्रसाद बंटा, भीड़ छंटी…पर यह दृश्य अब भी लोगों की बातचीत में जीवित है, क्योंकि राजनीति में हर मंच एक कथा होता है—बस फर्क इतना है कि कहीं श्लोक पढ़े जाते हैं,कहीं बयान।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur