ऑनलाइन हाजिरी लागू, जुगाड़ की आशंका और विरोध तेज
हाजिरी के नाम पर दबाव? कर्मचारियों ने उठाए निजता के सवाल
ऑनलाइन हाजिरी की जिद या निजता पर वार? कर्मचारी संगठनों का विरोध
हाजिरी ऐप से डर, बायोमैट्रिक की मांग—सरकार बनाम कर्मचारी
निजी मोबाइल में सरकारी ऐप, कर्मचारियों में असंतोष
-रवि सिंह-
कोरिया/एमसीबी,10 जनवरी 2026(घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शासकीय कर्मचारियों की कर्तव्यस्थल पर दैनिक उपस्थिति और कार्य अवधि की निगरानी के लिए लागू की जा रही ऑनलाइन मोबाइल हाजिरी व्यवस्था अब प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर विवाद,विरोध और बहस का विषय बन गई है,सरकार जहां इस प्रणाली को सख्ती से लागू करने पर अड़ी हुई है, वहीं कर्मचारी संगठनों में इसे लेकर विरोध, सीमित समर्थन और वैकल्पिक मांगें सामने आ रही हैं,इसी बीच इस व्यवस्था में ‘जुगाड़’ की संभावनाओं को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सरकार की मंशा अनुशासन और जवाबदेही- सरकार का दावा है कि मोबाइल आधारित ऑनलाइन हाजिरी से कर्मचारियों की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित होगी, कार्यालय समय में अनुशासन आएगा, और कार्य अवधि के दौरान अनावश्यक गैरहाजिरी पर रोक लगेगी, इसी उद्देश्य से सभी जिला प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि कर्मचारी अपने व्यक्तिगत मोबाइल फोन में हाजिरी ऐप डाउनलोड कर नियमित उपस्थिति दर्ज करें। कई जिलों में प्रशासन इसे उपलब्धि के रूप में सोशल मीडिया पर प्रचारित भी कर रहा है।
कर्मचारी संगठनों का रुख—हाजिरी से नहीं, निजी मोबाइल से आपत्ति- कर्मचारी संघों का कहना है कि उन्हें ऑनलाइन हाजिरी की अवधारणा से आपत्ति नहीं है, लेकिन वे व्यक्तिगत मोबाइल फोन के इस्तेमाल का विरोध कर रहे हैं, संघों की प्रमुख मांगें हैं कार्यालयों में पृथक बायोमैट्रिक मशीन लगाई जाए, या हाजिरी के लिए सरकारी डिवाइस/टैबलेट उपलब्ध कराया जाए, ताकि कर्मचारियों की निजता और व्यक्तिगत संसाधनों पर बोझ न पड़े।निजी डेटा लीक होने का डर- कर्मचारी संगठनों ने सबसे गंभीर सवाल डेटा सुरक्षा को लेकर उठाया है। उनका कहना है कि जिस ऐप के माध्यम से हाजिरी ली जा रही है, उसकी साइबर सुरक्षा और प्रमाणिकता को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी साझा नहीं की गई है, यदि ऐप के कारण कर्मचारियों का व्यक्तिगत डेटा, बैंकिंग जानकारी या अन्य संवेदनशील सूचनाएं लीक होती हैं, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? मौजूदा व्यवस्था में जवाबदेही तय नहीं है, कर्मचारियों का तर्क है कि आज मोबाइल फोन केवल संपर्क का साधन नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान, बैंकिंग, निजी दस्तावेज और पारिवारिक सूचनाओं का केंद्र है, ऐसे में किसी अप्रमाणित ऐप को मजबूरी में डाउनलोड करना आर्थिक और साइबर सुरक्षा दोनों के लिहाज से जोखिमपूर्ण है।
प्रशासन का दबाव, बढ़ती असंतुष्टि- सरकार के निर्देशों के बाद जिला प्रशासन स्तर पर कर्मचारियों पर ऐप डाउनलोड करने का दबाव साफ दिखाई दे रहा है, कई कर्मचारी अनिच्छा के बावजूद मोबाइल में ऐप इंस्टॉल कर रहे हैं, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह प्रक्रिया स्वैच्छिक नहीं, बल्कि दबाव आधारित है, वहीं प्रशासन इसे नियमों के पालन और अनुशासन की दिशा में जरूरी कदम बता रहा है।
‘जुगाड़’ की चर्चाएं—व्यवस्था पर ही सवाल- इस पूरी व्यवस्था में एक और पहलू सामने आ रहा है ‘जुगाड़’ की संभावनाएं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन चर्चाओं के अनुसार कुछ कर्मचारी पुराने नंबर की जगह नया मोबाइल नंबर कार्यालय रिकॉर्ड में दे रहे हैं, उस नंबर वाला मोबाइल दिनभर कार्यालय में छोड़ दिया जाता है, और कर्मचारी इस दौरान बाहर आ-जा सकते हैं, शाम को वही मोबाइल वापस ले लिया जाता है, यदि ऐसी स्थिति वास्तव में सामने आती है, तो यह ऑनलाइन हाजिरी व्यवस्था के मूल उद्देश्य वास्तविक उपस्थिति और कार्य समय सुनिश्चित करने को ही कमजोर कर देती है।
सीमित समर्थन भी मौजूद- कुछ कर्मचारियों का मानना है कि यदि ऐप पूरी तरह सुरक्षित, सरकारी स्तर पर प्रमाणित, और डेटा सुरक्षा की स्पष्ट गारंटी के साथ लागू किया जाए, तो ऑनलाइन हाजिरी से प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार हो सकता है, हालांकि यह समर्थन भी निजी मोबाइल की जगह सरकारी व्यवस्था की शर्त के साथ जुड़ा हुआ है।
बड़ा सवाल अब भी कायम- अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार कर्मचारियों की निजता और डेटा सुरक्षा को लेकर ठोस भरोसा दे पाएगी? क्या बायोमैट्रिक या वैकल्पिक प्रणाली पर गंभीरता से विचार होगा? या फिर यह ऑनलाइन मोबाइल हाजिरी व्यवस्था विरोध, असंतोष और ‘जुगाड़’ को जन्म देती रहेगी? स्पष्ट है कि ऑनलाइन मोबाइल हाजिरी केवल एक तकनीकी कदम नहीं रह गया है, बल्कि यह अब कर्मचारी अधिकार, विश्वास और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है।
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