बिलासपुर,08 जनवरी 2026। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित एक राष्ट्रीय परिसंवाद उस समय विवादों के घेरे में आ गया, जब विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आलोक चक्रवाल और एक आमंत्रित साहित्यकार के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। यह घटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग और साहित्य अकादमी, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘समकालीन हिंदी कहानीः बदलते जीवन संदर्भ’ विषय पर चर्चा के दौरान हुई। अकादमिक विमर्श के लिए सजे इस मंच पर संवाद की जगह विवाद उस समय हावी हो गया जब कुलपति ने अपने व्यवहार से सबको हैरान कर दिया।
विषय से भटके कुलपतिः अपनी कहानी सुनाने पर हुआ ऐतराज : परिसंवाद के दौरान जब कुलपति प्रोफेसर आलोक चक्रवाल को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया,तो वे निर्धारित विषय ‘हिंदी कहानी’ पर चर्चा करने के बजाय अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों और उपलब्धियों का बखान करने लगे। काफी देर तक वे अपने गुजराती और बनारसी भाषाई परिवेश तथा निजी जीवन के किस्से सुनाते रहे। कार्यक्रम में मौजूद विद्वान और साहित्यकार इस बात से असहज महसूस करने लगे कि चर्चा मुख्य मुद्दे से भटक रही है। इसी बीच कुलपति ने खुद ही एक साहित्यकार की ओर इशारा करते हुए पूछ लिया, ‘भाई साहब, आप बोर तो नहीं हो रहे हैं?’
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरलः विश्वविद्यालय की गरिमा पर सवाल
इस पूरी घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें कुलपति खुले मंच से साहित्यकारों को ‘तमीज’ सिखाते नजर आ रहे हैं। इस व्यवहार की शैक्षणिक जगत में कड़ी आलोचना हो रही है। छात्रों और प्रतिभागियों का कहना है कि एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रमुख का ऐसा आचरण संस्था की गरिमा के अनुकूल नहीं है। मतभेदों को लोकतांत्रिक तरीके से सुलझाने के बजाय शक्ति प्रदर्शन करना अकादमिक मर्यादा के खिलाफ है। इस मामले पर अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन या कुलपति की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
मुद्दे की बात करें… : साहित्यकार के सुझाव पर भड़के कुलपति
कुलपति के सवाल पर महाराष्ट्र से आए प्रख्यात साहित्यकार मनोज रुपण ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया कि ‘यदि चर्चा कार्यक्रम के मुख्य विषय पर केंद्रित रहे,तो बेहतर होगा।’ साहित्यकार का इतना कहना ही था कि कुलपति अपना आपा खो बैठे। उन्होंने इसे अपना अपमान माना और सख्त लहजे में कहा, ‘बहुत बड़े कहानीकार और विद्वान बन रहे हैं, लेकिन इन्हें तमीज नहीं है कि कुलपति से कैसी बात की जाती है।’ उन्होंने संयोजकों को स्पष्ट निर्देश दिए कि इन्हें (मनोज रुपण) भविष्य में कभी किसी कार्यक्रम में न बुलाया जाए।
सभा से बाहर निकालने का फरमानः अन्य अतिथियों ने किया बहिष्कार
विवाद यहीं नहीं थमा,कुलपति ने मनोज रुपण को भरी सभा से बाहर जाने का आदेश दे दिया। कुलपति के इस अडि़यल और अपमानजनक रवैये को देख सभागार में मौजूद अन्य प्रोफेसर और दूसरे राज्यों से आए साहित्यकार विरोध करने लगे। जब कुछ लोगों ने आपत्ति दर्ज कराई, तो कुलपति ने दोटूक कह दिया कि जिन्हें अच्छा नहीं लग रहा है, वे भी बाहर जा सकते हैं। इस अपमान से क्षुब्ध होकर कई वरिष्ठ अतिथियों और साहित्यकारों ने कार्यक्रम का बीच में ही बहिष्कार कर दिया और सभागार छोड़कर चले गए।
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