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@कविता @न बिछड़े कभी

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पंछी का पंछी
न बिछड़े कभी
पतझड़ में भी कोई घर
न उजड़े कभी
हाथों की लकीरों में
चाहे जो लिखा हो
धड़कने धड़कनों से
ना बिछड़े कभी
जिंदगी में दुख तो
आते -जाते रहते हैं
पर कांत की कांत
न छूटे कभी
पतझड़ में भी
पत्ता शाख से
न टूटे कभी
पंछी का पंछी
न बिछड़े कभी।
गरिमा राकेश गर्विता
कोटा ,राजस्थान


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