- लोकतंत्र बचाने की होड़ में सत्ता-विपक्ष आमने-सामने,हाशिए पर खड़ा मतदाता!
- भाजपा को घुसपैठ की चिंता,कांग्रेस को वोट चोरी का सवाल…लोकतंत्र की चिंता में जनता कहां?
- दोनों के हाथ में संविधान,दोनों सड़क पर…फिर लोकतंत्र खतरे में किससे?
- सत्ता का नारा ‘घुसपैठ’,विपक्ष का नारा ‘वोट चोरी’…लोकतंत्र की लड़ाई में मतदाता ही उलझन में!
- लोकतंत्र बचाने निकले सत्ताधारी और विपक्षी, लेकिन जनता पूछ रही—हमारी परेशानी कौन देखेगा?
- संविधान बचाने की सियासी जंग तेज, सवालों के घेरे में सत्ता और विपक्ष दोनों!
- लोकतंत्र बचाने के नाम पर सियासी शक्ति प्रदर्शन, जनता की राह रोककर किसकी रक्षा हो रही?
- सत्ता को घुसपैठ का डर,विपक्ष को वोट चोरी का…लोकतंत्र की चिंता या सियासत का नया अखाड़ा?
- संसद से सड़क तक लोकतंत्र की दुहाई, फिर जनता के सवालों का जवाब कौन देगा?
- लोकतंत्र का रक्षक कौन और खतरा किससे? सत्ता-विपक्ष के दावों के बीच मतदाता मौन!
- संविधान की दुहाई दोनों तरफ,जवाबदेही की बारी आई तो कौन खड़ा होगा?
- भाजपा को घुसपैठ की चिंता,कांग्रेस को वोट चोरी का सवाल, संविधान बचाने की सियासी जंग में आम मतदाता
- की आवाज कहां गुम हो गई?
-रवि सिंह-
कोरिया,06 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)। देश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा दृश्य सामने है, जो अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है,सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी भी लोकतंत्र बचाने के नाम पर सड़कों पर उतर रही है और विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन कर रही है, भाजपा का आरोप है कि घुसपैठियों को बचाने के लिए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का विरोध किया जा रहा है, वहीं कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बडि़यों और वोट चोरी के आरोपों को लेकर जनता के बीच जा रही है, एक तरफ घुसपैठ का मुद्दा है, दूसरी तरफ वोट चोरी का सवाल,दोनों राजनीतिक खेमों के अपने-अपने तर्क हैं,अपने-अपने आरोप हैं और दोनों ही लोकतंत्र को खतरे में बताते हुए उसकी रक्षा का दावा कर रहे हैं।
लेकिन इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच एक सवाल सबसे बड़ा है की जब सत्ता पक्ष भी लोकतंत्र बचाने निकला है और विपक्ष भी लोकतंत्र बचाने के लिए सड़क पर है,तो आखिर देश के लोकतंत्र को खतरा किससे है? क्या लोकतंत्र को खतरा घुसपैठियों से है, चुनावी प्रक्रिया की कथित गड़बडि़यों से है, राजनीतिक दलों के आपसी अविश्वास से है या फिर उस राजनीतिक कार्यशैली से है,जिसमें जनता के नाम पर राजनीति तो होती है,लेकिन जनता ही सबसे अधिक परेशान होती है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा की जिम्मेदारी केवल किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है,सत्ता पक्ष और विपक्ष,दोनों को लोकतांत्रिक व्यवस्था ने अलग-अलग भूमिकाएं सौंपी हैं,जनता ने सत्ता पक्ष को सरकार चलाने का दायित्व दिया है और विपक्ष को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने, गलतियों को उजागर करने तथा जनता की आवाज बनने की जिम्मेदारी दी है, लेकिन जब दोनों ही पक्ष लोकतंत्र की रक्षा का दावा करते हुए सड़कों पर आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं, तब यह पूछना जरूरी हो जाता है कि आखिर सदन और संसद की भूमिका कहां रह गई?
लोकतंत्र बचाने का दावा,लेकिन जनता की परेशानी कौन देखेगा?- राजनीतिक दलों के लिए रैली निकालना, पदयात्रा करना,धरना देना और प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक अधिकार है, किसी भी सरकार या राजनीतिक दल की नीतियों का विरोध करना नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है,लेकिन विरोध और प्रदर्शन के नाम पर आम नागरिकों की जिंदगी को कितनी परेशानी में डाला जा रहा है,यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है,जब शहर की सड़कों पर विशाल रैलियां निकलती हैं, यातायात प्रभावित होता है,बाजारों तक पहुंच बाधित होती है,मरीजों को अस्पताल पहुंचने में परेशानी होती है और रोज कमाकर खाने वाले लोगों का काम प्रभावित होता है,तब इन परिस्थितियों की जिम्मेदारी कौन लेता है? राजनीतिक दलों के मंच से लोकतंत्र बचाने के नारे गूंजते हैं, लेकिन उसी दौरान आम नागरिक अपने जरूरी कामों के लिए रास्ता तलाशता नजर आता है, क्या लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन रह गया है? क्या जनता ने अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुना है कि वे उसके रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करते हुए सड़कों पर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाएं? क्या राजनीतिक दलों के लिए यह जरूरी नहीं कि विरोध दर्ज कराते समय आम नागरिकों के अधिकारों और सुविधाओं का भी ध्यान रखें? यह बात किसी एक दल पर लागू नहीं होती, भाजपा हो या कांग्रेस, सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ सार्वजनिक जिम्मेदारियां भी जुड़ी हुई हैं, शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की ताकत है,लेकिन आम नागरिकों की परेशानी को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक आंदोलन की उपलब्धि नहीं हो सकती।
सत्ता की जिम्मेदारी अधिक,विपक्ष की जवाबदेही भी कम नहीं-सत्ता और विपक्ष की जिम्मेदारियां एक जैसी नहीं हैं,सत्ता पक्ष के पास शासन चलाने और नीतियों को लागू करने की शक्ति होती है,इसलिए उससे अपेक्षा भी अधिक होती है, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्वाचन व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहे, यदि किसी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो सरकार और संबंधित संस्थाओं को तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए, न कि हर सवाल को केवल राजनीतिक विरोध बताकर खारिज कर देना चाहिए, दूसरी ओर विपक्ष की भूमिका भी केवल आरोप लगाने तक सीमित नहीं हो सकती। यदि कांग्रेस वोट चोरी का आरोप लगा रही है तो उसे अपने आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, आंकड़े और प्रमाण सामने रखने चाहिए,निर्वाचन प्रक्रिया में किसी गड़बड़ी का दावा है तो उसके निराकरण के लिए उपलब्ध संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं का उपयोग भी होना चाहिए, इसी तरह भाजपा यदि घुसपैठ और अपात्र मतदाताओं का मुद्दा उठा रही है तो उसे भी यह स्पष्ट करना होगा कि किन तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ऐसे आरोप लगाए जा रहे हैं,किसी भी नागरिक का मताधिकार प्रभावित न हो और किसी अपात्र व्यक्ति को अनुचित लाभ न मिले, यह सुनिश्चित करना निर्वाचन व्यवस्था की जिम्मेदारी है, राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन प्रमाण के साथ जवाब देना और व्यवस्था में सुधार सुनिश्चित करना वास्तविक जिम्मेदारी है।
क्या लोकतंत्र की लड़ाई में मतदाता ही सबसे कमजोर कड़ी बन गया है?- इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उस आम मतदाता का है,जिसके नाम पर राजनीति की जा रही है,कभी उसे घुसपैठ का खतरा बताया जाता है, कभी वोट चोरी की आशंका दिखाई जाती है, कभी उसे लोकतंत्र बचाने के लिए सड़क पर बुलाया जाता है,तो कभी राजनीतिक रैली में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए प्रेरित किया जाता है, लेकिन उस मतदाता की अपनी चिंता क्या है? वह चाहता है कि मतदाता सूची में उसका नाम सही हो,मतदान केंद्र पर उसे किसी परेशानी का सामना न करना पड़े,उसका वोट किसी अन्य के नाम से दर्ज न हो और चुनाव प्रक्रिया पर उसका विश्वास बना रहे,वह यह भी चाहता है कि चुनाव के बाद उसके प्रतिनिधि उसके क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करें, मतदाता को राजनीतिक दलों के बीच चल रही बहस का केवल दर्शक या भीड़ का हिस्सा बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता,लोकतंत्र में मतदाता सबसे महत्वपूर्ण है, उसकी पहचान, उसका मत और उसका विश्वास ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है,यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे दूर किया जाए। यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गायब है तो उसे जोड़ा जाए,यदि किसी व्यक्ति की पहचान गलत दर्ज हुई है तो सुधार किया जाए। यदि घुसपैठ का प्रमाण है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो, लेकिन इन सभी मुद्दों को राजनीतिक नारों की भेंट चढ़ाकर वास्तविक समाधान से दूर नहीं किया जाना चाहिए।
संविधान किसी दल का नहीं,पूरे देश का है-आज संविधान और लोकतंत्र का नाम दोनों राजनीतिक खेमों के भाषणों में सुनाई दे रहा है,सत्ता पक्ष भी संविधान और राष्ट्रहित की बात कर रहा है, विपक्ष भी संविधान और मताधिकार की रक्षा का दावा कर रहा है,लेकिन संविधान की रक्षा केवल भाषणों और नारों से नहीं होती,इसकी रक्षा तब होती है जब सत्ता अपने अधिकारों का उपयोग संवैधानिक सीमाओं में रहकर करती है,विपक्ष जिम्मेदारी के साथ सवाल उठाता है,संस्थाएं निष्पक्ष होकर काम करती हैं और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं,संविधान किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं है, सत्ता बदल सकती है,विपक्ष बदल सकता है,सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं देश की स्थायी व्यवस्था का आधार हैं,इसलिए संविधान की रक्षा के नाम पर होने वाली राजनीति को भी संविधान की कसौटी पर परखा जाना चाहिए,लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि उसमें सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं और विपक्ष से भी जवाब मांगा जा सकता है, असहमति को देशविरोध या राजनीतिक दुश्मनी का रूप देने के बजाय तथ्यों और तर्कों से उसका जवाब दिया जाना चाहिए।
जनता का सवाल—लोकतंत्र बचाने निकले हैं तो पहले जनता का भरोसा बचाइए-आज देश की जनता के सामने दो बड़े राजनीतिक संदेश हैं, भाजपा कह रही है कि घुसपैठियों को बचाने की कोशिश हो रही है और एसआईआर का विरोध इसी राजनीति का हिस्सा है, कांग्रेस कह रही है कि वोट चोरी के जरिए लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट की जा रही है, इन दोनों दावों की सच्चाई का फैसला राजनीतिक नारों से नहीं,बल्कि प्रमाणों और निष्पक्ष जांच से होना चाहिए,लेकिन इस राजनीतिक संघर्ष के बीच एक तीसरा पक्ष भी है, जो शायद सबसे अधिक महत्वपूर्ण है—वह आम नागरिक,जो न तो सत्ता में है और न ही विपक्ष में, वह केवल मतदाता है,वह अपने प्रतिनिधियों से जवाबदेही चाहता है,अपनी समस्याओं का समाधान चाहता है और ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसमें उसका मत,उसकी पहचान और उसका सम्मान सुरक्षित रहे, इसलिए सवाल सिर्फ इतना नहीं कि भाजपा और कांग्रेस में से कौन लोकतंत्र बचाने के लिए सड़क पर उतरा है,बड़ा सवाल यह है कि लोकतंत्र बचाने का दावा करने वाले राजनीतिक दल अपने व्यवहार में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का कितना पालन कर रहे हैं? क्या वे जनता के अधिकारों को अपनी राजनीतिक रणनीति से ऊपर रख पा रहे हैं? क्या वे अपने आरोपों को प्रमाणों के साथ साबित करने और संस्थाओं के माध्यम से समाधान खोजने को तैयार हैं? एक तरफ सत्ता पक्ष कह रहा है कि घुसपैठ से लोकतंत्र खतरे में है,दूसरी तरफ विपक्ष कह रहा है कि वोट चोरी से लोकतंत्र खतरे में है। दोनों की चिंता यदि वास्तव में लोकतंत्र है,तो फिर आम मतदाता को यह भरोसा कौन दिलाएगा कि उसका वोट सुरक्षित है,उसकी पहचान सुरक्षित है और उसकी आवाज सत्ता तथा विपक्ष दोनों के लिए महत्वपूर्ण है? क्योंकि लोकतंत्र को बचाने की सबसे बड़ी परीक्षा सड़कों पर निकाली गई रैलियों में नहीं,बल्कि उस दिन होती है जब एक आम नागरिक बिना किसी भय, दबाव और भ्रम के अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सके और उसके चुने हुए प्रतिनिधि चुनाव के बाद भी उसके प्रति जवाबदेह बने रहें, लोकतंत्र बचाने की लड़ाई में सत्ता और विपक्ष दोनों सड़क पर हैं,लेकिन जनता का सवाल अब भी वहीं खड़ा है—जिस लोकतंत्र को बचाने का दावा किया जा रहा है,उसमें आम मतदाता की जगह आखिर कहां है?
एक तरफ घुसपैठ का मुद्दा, दूसरी तरफ वोट चोरी का आरोप
भाजपा देशभर में घुसपैठ के मुद्दे को उठाते हुए एसआईआर के समर्थन में आंदोलन और जनजागरण कर रही है, उसका तर्क है कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण आवश्यक है और उसमें किसी भी अपात्र व्यक्ति का नाम नहीं होना चाहिए, भाजपा के अनुसार एसआईआर का विरोध घुसपैठियों को संरक्षण देने की राजनीति से जुड़ा हुआ है, दूसरी ओर कांग्रेस मतदाता सूची में कथित गड़बडि़यों, मताधिकार के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए वोट चोरी का मुद्दा उठा रही है, कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची और निर्वाचन प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है, यहां सवाल यह नहीं है कि किस दल का आरोप राजनीतिक रूप से कितना प्रभावी है, सवाल यह है कि दोनों पक्ष अपने दावों को कितने ठोस तथ्यों के साथ जनता के सामने रख रहे हैं, यदि मतदाता सूची में अपात्र लोगों के नाम हैं तो उनकी पहचान कर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए, यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, किसी की पहचान बदल गई है या उसका मताधिकार प्रभावित हुआ है, तो उसका भी तत्काल सुधार होना चाहिए, आखिर मतदाता सूची किसी राजनीतिक दल का दस्तावेज नहीं, बल्कि देश के नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार का आधार है, इसमें त्रुटि किसी भी पक्ष के लिए राजनीतिक मुद्दा भर नहीं हो सकती, एक गलत नाम का समावेश जितना गंभीर है, उतना ही गंभीर किसी वास्तविक मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना भी है, इसलिए इस पूरे मामले का समाधान आरोपों की राजनीति से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, प्रमाण और निष्पक्ष प्रक्रिया से होना चाहिए।
जनता ने सदन में आवाज उठाने के लिए चुना, सड़क पर शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं
देश की जनता जब मतदान करती है तो वह केवल किसी व्यक्ति को नहीं चुनती, बल्कि उसे अपनी आवाज और अपने अधिकारों का प्रतिनिधि बनाती है, जनता उम्मीद करती है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि संसद और विधानसभा में उसके मुद्दों को उठाएंगे, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी, किसानों की समस्याएं, भ्रष्टाचार और स्थानीय विकास जैसे विषयों पर चर्चा करेंगे, लेकिन राजनीतिक परिदृश्य में कई बार ऐसा लगता है कि सदन और संसद में होने वाली बहस से अधिक ऊर्जा सड़कों पर होने वाले शक्ति प्रदर्शन में खर्च की जा रही है, सत्ता पक्ष अपने निर्णयों और नीतियों के समर्थन में रैलियां निकालता है तो विपक्ष उन्हीं नीतियों के विरोध में सड़क पर उतरता है, दोनों अपने समर्थकों की संख्या और नारों की गूंज को राजनीतिक ताकत के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन क्या किसी रैली में उमड़ी भीड़ लोकतंत्र की मजबूती का अंतिम प्रमाण है? क्या किसी प्रदर्शन में लगे नारे किसी आरोप को स्वतः सत्य बना देते हैं? और क्या किसी राजनीतिक दल के विरोध में सड़क पर उतरने मात्र से लोकतंत्र की रक्षा हो जाती है? लोकतंत्र का वास्तविक मूल्यांकन रैली की भीड़ से नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों की सुरक्षा, संस्थाओं की निष्पक्षता, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और शासन की पारदर्शिता से होना चाहिए।
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