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एमसीबी/प्रयागराज/रायपुर@बस जब्ती की कार्रवाई पर हाईकोर्ट सख्त…दोनों चालान निरस्त,अधिकारियों से मांगा पूरा हिसाब

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जिस विभाग ने बस जब्त की,उसी की निगरानी में सामान गायब! हाईकोर्ट ने अधिकारियों को ठहराया दोषपूर्ण
नौ महीने बस खड़ी रही,सामान गायब हुआ,हाईकोर्ट बोला…अधिकारियों ने मनमाने तरीके से किया काम
परिवहन विभाग की कार्रवाई पर हाईकोर्ट का बड़ा प्रहार,चालान रद्द कर पूछा…बस किसने और क्यों जब्त की?
कानून के रखवालों की कार्रवाई पर अदालत के सवाल,सरकारी अभिरक्षा में बस से चोरी को भी नहीं नकारा…
बस को चलने योग्य बनाकर लौटाने का आदेश,जब्ती करने वाले कर्मचारियों की पहचान और कार्रवाई का विवरण 30 नवंबर को मांगा…
मोटर वाहन अधिनियम की धारा 207 की प्रक्रिया का पालन नहीं करने पर अदालत की कड़ी टिप्पणी


-न्यूज डेस्क-
एमसीबी /प्रयागराज/रायपुर,06 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)।
अंतरराज्यीय यात्री बसों का संचालन केवल परमिट और कागजी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है,बल्कि इसके पीछे परिवहन विभाग की जवाबदेही और निष्पक्ष कार्यप्रणाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है,लेकिन जब वैध दस्तावेजों के साथ यात्रा कर रही किसी बस को जब्त कर महीनों तक सरकारी परिसर में खड़ा रखा जाए,उसकी सुरक्षा सुनिश्चित न हो और बाद में उसी बस से सामान गायब मिलने लगे, तो सवाल केवल बस संचालक के नुकसान का नहीं,बल्कि सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही का भी बन जाता है,छत्तीसगढ़ से उत्तर प्रदेश जा रही स्टार टूर एंड ट्रेवल्स की बस के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का 4 नवंबर 2026 का आदेश इसी गंभीर सवाल को सामने लाता है, अदालत ने बस के संबंध में जारी दोनों चालानों को निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारियों को बस को दोबारा चलने योग्य स्थिति में बहाल करने का निर्देश दिया है,इतना ही नहीं, न्यायालय ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उनकी कार्रवाई को मनमाना बताया और अगली सुनवाई में बस जब्त करने वाले कर्मचारियों की पहचान, उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई तथा बस की बहाली में हुए खर्च का पूरा हिसाब मांगा है,यह मामला रिट-ए संख्या 3658/2026, बस संचालक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य से जुड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने न्यायालय संख्या 21 में इसकी सुनवाई की, याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गोविंद नारायण मिश्रा तथा राज्य की ओर से अधिवक्ता शरद चंद्र उपाध्याय ने पक्ष रखा, याचिका में बस को गलत तरीके से जब्त किए जाने और लंबे समय तक सरकारी अभिरक्षा में रखे जाने को चुनौती दी गई थी।
33 मिनट के भीतर दो अलग-अलग स्थानों पर दो चालान,जब्ती की कार्रवाई पर उठे सवाल-प्रकरण में याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि 21 फरवरी 2026 को बस के विरुद्ध दो अलग-अलग चालान जारी किए गए,पहला चालान सुबह 6 बजकर 21 मिनट पर नवाब युसुफ रोड पर अतिरिक्त सीटों के आरोप में काटा गया,जबकि दूसरा चालान सुबह 6 बजकर 54 मिनट पर महात्मा गांधी मार्ग,जॉर्ज टाउन में परमिट की शर्तों के उल्लंघन का हवाला देकर जारी किया गया,याचिका का प्रमुख सवाल था कि जब पहला चालान जारी करने के साथ ही बस को जब्त कर लिया गया था,तो महज 33 मिनट बाद वही बस दूसरे स्थान पर कैसे पहुंच गई और वहां दूसरा चालान कैसे जारी हुआ? यह सवाल बस संचालक की ओर से अदालत के समक्ष उठाया गया। बस में छत्तीसगढ़ से उत्तर प्रदेश के खागा-फतेहपुर जा रहे यात्री सवार थे,याचिकाकर्ता के अनुसार बस के परमिट में 40 सीटें—11 स्लीपर और 29 सीटिंग—दर्ज थीं,उसने चालान की तारीख पर परमिट सहित आवश्यक दस्तावेज वैध होने का दावा भी किया,याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि बस जब्त किए जाने के समय विधिवत सीजर मेमो उपलब्ध नहीं कराया गया,इस पूरे घटनाक्रम ने जब्ती की प्रक्रिया और दोनों चालानों के आधार पर सवाल खड़े किए,हालांकि,इन आरोपों और घटनाक्रम का अंतिम मूल्यांकन न्यायालय के आदेश में दर्ज टिप्पणियों और निर्देशों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
नौ महीने सरकारी परिसर में खड़ी रही बस, निरीक्षण में गायब मिला सामान- 21 फरवरी 2026 को जब्त की गई बस लंबे समय तक प्रयागराज के सिविल लाइंस स्थित रोडवेज बस स्टैंड परिसर में खड़ी रही, याचिकाकर्ता का आरोप था कि बस को छुड़ाने के लिए उसने विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए, लेकिन राहत नहीं मिली। इस दौरान बस की स्थिति लगातार खराब होती गई,28 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की शिकायतों पर गंभीरता दिखाई, अदालत ने संबंधित अधिकारियों में से सक्षम अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से फाइल सहित उपस्थित होकर सवालों का जवाब देने का निर्देश दिया,इसके बाद 7 अक्टूबर को अधिकारी अदालत में उपस्थित हुए,सुनवाई के दौरान न्यायालय ने जब्ती और चालानों की परिस्थितियों पर सवाल उठाए तथा बस का निरीक्षण कराने का निर्देश दिया, कोर्ट के निर्देश पर 8 अक्टूबर को बस का निरीक्षण किया गया,4 नवंबर के आदेश में राज्य पक्ष की ओर से दी गई जानकारी का उल्लेख है कि बस के दरवाजों के ताले,बैटरी और कुछ स्लीपर गद्दे गायब थे। वहीं याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि 28 सितंबर को निरीक्षण के समय बस के टायर भी गायब थे,जबकि बाद में उनमें दूसरे टायर लगा दिए गए थे,यहां मामला और गंभीर हो गया, जिस बस को विभाग ने जब्त कर अपनी अभिरक्षा में रखा था,उसी से सामान गायब होने की बात निरीक्षण में सामने आई, अदालत ने अपने आदेश में कहा कि निरीक्षण के दौरान बस से चोरी होने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
दोनों चालान निरस्त,बस को चलने योग्य बनाकर लौटाने का आदेश- हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में दोनों विवादित चालानों को निरस्त कर दिया। साथ ही उत्तर प्रदेश के परिवहन आयुक्त और संबंधित संभागीय परिवहन अधिकारी,प्रयागराज को बस को दोबारा चलने योग्य स्थिति में बहाल करने का निर्देश दिया,अदालत ने आदेश दिया कि बस की मरम्मत और बहाली के बाद उसे फिटनेस प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए पंजीकरण प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, पंजीकरण प्राधिकारी जांच के बाद यह प्रमाणित करेगा कि बस राज्य की यात्री गाड़ी के रूप में संचालन के योग्य है या नहीं,आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि बस का परमिट समाप्त हो चुका है,इसलिए फिटनेस प्रमाणन के बाद याचिकाकर्ता को परमिट नवीनीकरण के लिए आवेदन करना होगा,इस पूरी प्रक्रिया को आदेश की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया गया है, यानी बस को चलने योग्य स्थिति में बहाल करने,फिटनेस प्रमाणन और परमिट नवीनीकरण की प्रक्रिया के लिए निर्धारित समय-सीमा में कार्रवाई करनी होगी,अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को आदेश की वेबसाइट प्रति संबंधित अधिकारियों और पंजीकरण प्राधिकारी तक पहुंचानी है,इसके अतिरिक्त आदेश के अनुपालन के लिए उसे कोई अन्य औपचारिक प्रक्रिया पूरी करने की आवश्यकता नहीं है, इसका अर्थ यह है कि हाईकोर्ट ने बस को तत्काल बिना फिटनेस और परमिट नवीनीकरण के सड़क पर चलाने की अनुमति नहीं दी है, बल्कि उसे निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया पूरी कर संचालन योग्य बनाने का रास्ता दिया है।
30 नवंबर को फिर अदालत में पेश होगा पूरा हिसाब- हाईकोर्ट ने मामले को समाप्त नहीं किया है, आदेश में अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है,इस तारीख पर परिवहन आयुक्त और संबंधित परिवहन अधिकारियों को कई महत्वपूर्ण जानकारियां अदालत के सामने रखनी होंगी, अदालत ने निर्देश दिया है कि बस जब्त करने वाले कर्मचारियों की पहचान की जाए और उनका पूरा विवरण प्रस्तुत किया जाए, साथ ही उनके विरुद्ध राज्य सरकार की ओर से क्या कार्रवाई शुरू की गई है,इसकी जानकारी भी देनी होगी,इसके अतिरिक्त बस को चलने योग्य स्थिति में बहाल करने और न्यायालय के आदेश का पालन कराने में कितना खर्च हुआ तथा उसके लिए राशि किस प्रकार उपलब्ध कराई गई,इसका विवरण भी अदालत में पेश करना होगा,इस निर्देश से स्पष्ट है कि न्यायालय केवल बस लौटाने तक सीमित नहीं रहना चाहता,बल्कि जब्ती की कार्रवाई करने वाले कर्मचारियों की पहचान और सरकारी अभिरक्षा में बस की सुरक्षा में हुई चूक की जवाबदेही भी जानना चाहता है।
अंतरराज्यीय बस संचालन और परिवहन विभाग की जवाबदेही पर बड़ा सवाल- यह मामला केवल एक बस संचालक और परिवहन विभाग के बीच विवाद नहीं रह गया है,अंतरराज्यीय यात्री परिवहन में परमिट, फिटनेस और अन्य वैधानिक दस्तावेजों का पालन जितना जरूरी है,उतना ही जरूरी है कि परिवहन विभाग भी कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करे,यदि किसी वाहन के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है,तो उसका स्पष्ट वैधानिक आधार होना चाहिए और जब्त वाहन की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी संबंधित विभाग की होती है, इस मामले में 33 मिनट के भीतर दो अलग-अलग स्थानों पर जारी चालानों का सवाल, जब्ती की प्रक्रिया,सीजर मेमो का अभाव,लंबे समय तक बस का सरकारी परिसर में खड़ा रहना और निरीक्षण के दौरान सामान गायब मिलने जैसे पहलू एक साथ सामने आए, हाईकोर्ट ने इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए चालानों को निरस्त किया और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी दर्ज की,अब सवाल यह है कि बस को निर्धारित समयसीमा में कितनी अच्छी स्थिति में बहाल किया जाता है? जिन कर्मचारियों ने बस जब्त की थी, उनकी पहचान और जवाबदेही किस तरह तय होती है? सरकारी अभिरक्षा में बस से गायब हुए सामान के संबंध में क्या कार्रवाई होती है? और सबसे अहम,इस पूरे घटनाक्रम में हुई लापरवाही का आर्थिक बोझ आखिर किस पर पड़ेगा? फिलहाल 30 नवंबर 2026 की सुनवाई इस मामले की अगली महत्वपूर्ण कड़ी होगी,अब परिवहन विभाग को केवल आदेश के अनुपालन की जानकारी ही नहीं देनी है,बल्कि यह भी बताना है कि बस किसने जब्त की,किस आधार पर की,सरकारी अभिरक्षा में उसकी सुरक्षा कैसे प्रभावित हुई और जिम्मेदार कर्मचारियों के विरुद्ध क्या कदम उठाए गए,हाईकोर्ट की सख्त निगरानी के बीच अब विभाग की जवाबदेही से जुड़े इन सवालों का जवाब सामने आना बाकी है।
धारा 207 का हवाला,लेकिन जब्ती की प्रक्रिया पर अदालत ने मांगा जवाब– बस को जब्त करने के अधिकार के संबंध में राज्य पक्ष के अधिवक्ता ने मोटर वाहन अधिनियम,1988 की धारा 207 का हवाला दिया, इस प्रावधान के तहत निर्धारित परिस्थितियों में वाहन को निरुद्ध किए जाने की व्यवस्था है,राज्य पक्ष की ओर से कहा गया कि बस के चालान में परमिट उल्लंघन का उल्लेख था और कोई दस्तावेज जब्त नहीं किया गया था,यह भी बताया गया कि जारी दस्तावेज चालान था,सीजर मेमो नहीं, लेकिन अदालत के सामने बड़ा सवाल यह था कि जब बस को जब्त कर अधिकारियों की अभिरक्षा में रखा गया,तो उसके सुरक्षित रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी और कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं किया गया? न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि बस जब्त होने और चालान जारी किए जाने के बाद अधिकारियों की अभिरक्षा में रही,ऐसे में वाहन की स्थिति और उसकी सुरक्षा को लेकर विभाग की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी : अधिकारी स्पष्ट रूप से दोषपूर्ण, कार्रवाई मनमाने तरीके से की गई– 4 नवंबर 2026 के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जिसमें न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है, आदेश के पैरा 4 में अदालत ने कहा कि बस जब्त किए जाने और चालान जारी होने के बाद अधिकारियों की अभिरक्षा में रही, निरीक्षण के दौरान बस से सामान गायब होने की बात सामने आई, जिसे विवादित नहीं किया जा सकता, न्यायालय ने अतिरिक्त सीटों के आरोप को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की, अदालत के अनुसार, जब बस को जब्त किया गया था, तब उसकी मूल स्थिति को साक्ष्य के रूप में सुरक्षित नहीं रखा गया, ऐसी स्थिति में अधिकारी अतिरिक्त सीटों के आरोप को प्रमाणित नहीं कर सकते, न्यायालय ने कहा कि संबंधित अधिकारी स्पष्ट रूप से दोषपूर्ण हैं और उन्होंने मनमाने तरीके से कार्रवाई की, जिसमें अनुचित मंशा का संकेत मिलता है, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 207 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन वाहन की सुरक्षित अभिरक्षा के संबंध में नहीं किया गया, यह टिप्पणी महज प्रशासनिक प्रक्रिया की कमी की ओर संकेत नहीं करती, बल्कि सरकारी अभिरक्षा में रखे वाहन की सुरक्षा और कार्रवाई करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही को भी केंद्र में लाती है, जिस विभाग के पास कानून लागू कराने की जिम्मेदारी है, उसी की अभिरक्षा में वाहन से सामान गायब होने का मामला न्यायालय के सामने आया, ऐसे में विभागीय जवाबदेही तय होना स्वाभाविक है।


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