
- बस हादसे के बाद डीटीओ पर कार्रवाई,लेकिन अनफिट बसों को सड़कों पर दौड़ने देने वाला जिम्मेदार कौन?
- 22 अक्टूबर को बस हादसा,23 को बसों पर कार्रवाई और शाम को डीटीओ अटैच—क्या यही है जवाबदेही का पूरा हिसाब?
- सड़कों पर दौड़ती रहीं अनफिट बसें, हादसे के बाद जागा विभाग…अब सवाल—कहां था परिवहन उड़नदस्ता?
- केल्हारी हादसे के बाद कोरिया डीटीओ पर गिरी गाज,मगर वाहन मालिकों और निगरानी तंत्र की जवाबदेही कौन तय करेगा?
- दो जिलों की परिवहन व्यवस्था, एक ही अधिकारी…हादसे के बाद डीटीओ अटैच,व्यवस्था की खामियों पर चुप्पी क्यों?
- छह मौतों के बाद कार्रवाई का पहिया घूमा,पर सवाल बरकरार—अनफिट बसों को किसकी शह?
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/ एमसीबी,२4 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। केल्हारी क्षेत्र में 22 अक्टूबर को हुए दर्दनाक यात्री बस हादसे में छह लोगों की मौत और 37 लोगों के घायल होने के बाद परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है,दुर्घटना के अगले दिन 23 अक्टूबर को परिवहन विभाग ने यात्री बसों के खिलाफ सघन जांच अभियान चलाया, इस दौरान तीन बसें जब्त की गईं और चार बसों पर कुल 11 हजार रुपये की चालानी कार्रवाई की गई,इसी दिन शाम को कोरिया के जिला परिवहन कार्यालय में पदस्थ अधिकारी अमित प्रकाश कश्यप को तत्काल प्रभाव से हटाकर आगामी आदेश तक परिवहन आयुक्त कार्यालय, नवा रायपुर में अटैच किए जाने का आदेश जारी हुआ।
घटनाक्रम की समयरेखा देखें तो हादसे के बाद शासन की सक्रियता दिखाई देती है,लेकिन इसके भीतर उठ रहे सवाल कहीं अधिक गंभीर हैं,क्या केवल अधिकारी को अटैच कर देने से यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी? क्या यह जांचा गया कि दुर्घटना के पीछे वाहन की तकनीकी स्थिति,फिटनेस,परमिट,चालक की भूमिका अथवा अन्य कौन-से कारण जिम्मेदार थे? और यदि सड़कों पर नियमों का उल्लंघन करते हुए यात्री बसें संचालित हो रही थीं,तो दुर्घटना से पहले उनकी निगरानी करने वाली व्यवस्था आखिर क्या कर रही थी? इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य पदनाम को लेकर भी है,परिवहन आयुक्त कार्यालय के आदेश में अमित प्रकाश कश्यप के लिए क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी जिला परिवहन कार्यालय कोरिया शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, वहीं, संबंधित कार्यालय में उनकी वास्तविक पदस्थापना जिला परिवहन अधिकारी यानी ष्ठभ्ह्र के रूप में होने की बात सामने रखी जा रही है,ऐसे में खबर में पदनाम को लेकर भ्रम पैदा करने के बजाय विभागीय पदस्थापना रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।
आरटीओ और डीटीओ का अंतर समझना जरूरी
परिवहन विभाग में आरटीओ का सामान्य अर्थ क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी और डीटीओ का अर्थ जिला परिवहन अधिकारी होता है, दोनों पदनामों को एक-दूसरे का पर्याय मानकर इस्तेमाल करना सही नहीं है, किसी अधिकारी का वास्तविक पद, उसके कार्यालय की जिम्मेदारी और आदेश में दर्ज पदनाम अलग-अलग तथ्यों के आधार पर स्पष्ट किए जाने चाहिए,23 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में अधिकारी का नाम अमित प्रकाश कश्यप,कार्यालय जिला परिवहन कार्यालय कोरिया और नई तैनाती कार्यालय परिवहन आयुक्त,नवा रायपुर दर्ज है, आदेश पर संयुक्त परिवहन आयुक्त रोहित कुमार झा के डिजिटल हस्ताक्षर हैं,आदेश में लिखा गया है कि प्रशासनिक कार्य सुविधा की दृष्टि से अमित प्रकाश कश्यप को जिला परिवहन कार्यालय कोरिया से अस्थायी रूप से हटाकर आगामी आदेश तक कार्यालय परिवहन आयुक्त, नवा रायपुर में कर्तव्यस्थ किया जाता है,आदेश में दुर्घटना के लिए उनकी व्यक्तिगत लापरवाही सिद्ध होने,विभागीय जांच में दोषी पाए जाने या दंडात्मक कार्रवाई किए जाने का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं है,इसे प्रशासनिक स्तर पर किया गया अटैचमेंट कहा जा सकता है,यदि विभागीय रिकॉर्ड में कश्यप जिला परिवहन अधिकारी के पद पर पदस्थ थे,तो खबर में डीटीओ लिखते हुए आदेश में प्रयुक्त पदनाम का अंतर भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
दो जिले,परिवहन व्यवस्था और निगरानी की जिम्मेदारी
कोरिया जिले से अलग होकर मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर यानी एमसीबी जिला अस्तित्व में आया,इसके बाद दोनों जिलों की परिवहन व्यवस्था के संचालन,कार्यालयों की वास्तविक स्थिति और अधिकारियों के कार्यक्षेत्र को लेकर सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं, उपलब्ध जानकारी के अनुसार,दोनों जिलों की परिवहन व्यवस्था कोरिया स्थित कार्यालय से संचालित हो रही थी और अमित प्रकाश कश्यप दोनों जिलों से जुड़ी परिवहन व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण अधिकारी थे,हालांकि,दोनों जिलों के लिए उनकी औपचारिक जिम्मेदारी,अधिकार क्षेत्र और कार्यालयीन व्यवस्था की पुष्टि विभागीय रिकॉर्ड से ही हो सकती है,यदि एक ही अधिकारी या सीमित अमले के माध्यम से दो जिलों में परिवहन संबंधी जिम्मेदारियां निभाई जा रही थीं, तो यह जांचना आवश्यक है कि क्षेत्र में बसों की नियमित जांच के लिए पर्याप्त कर्मचारी,संसाधन और निरीक्षण व्यवस्था उपलब्ध थी या नहीं,क्या एमसीबी जिले के लिए अलग से पर्याप्त प्रवर्तन व्यवस्था थी? क्या कोरिया और एमसीबी में चलने वाली बसों की जांच का अलग-अलग रिकॉर्ड रखा जाता था? क्या दोनों जिलों में नियमित निरीक्षण की कार्ययोजना बनाई गई थी? और क्या निर्धारित समय पर निरीक्षण वास्तव में किए गए? इन सवालों का उत्तर केवल अधिकारी के अटैचमेंट आदेश से नहीं मिलेगा,इसके लिए परिवहन विभाग की प्रशासनिक संरचना, कार्यविभाजन,निरीक्षण रिपोर्ट और प्रवर्तन रिकॉर्ड की जांच करनी होगी।
उड़नदस्ता कहां था,जब सड़कों पर यात्री बसें चल रही थीं?
परिवहन विभाग के उड़नदस्ते का काम केवल दुर्घटना के बाद सड़कों पर उतरकर जांच करना नहीं है,उसका एक प्रमुख उद्देश्य वाहनों के दस्तावेजों,फिटनेस और नियमों के अनुपालन की जांच करना तथा उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई करना है,23 अक्टूबर को परिवहन विभाग ने स्वयं बताया कि उड़नदस्ता दल ने यात्री बसों की सघन जांच की,इस दौरान तीन बसें जब्त की गईं और चार बसों पर कुल 11 हजार रुपये का चालान किया गया,जांच के दायरे में फिटनेस,परमिट,बीमा,प्रदूषण प्रमाणपत्र, चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस, वाहनों की तकनीकी स्थिति,ओवरलोडिंग और ओवरस्पीडिंग जैसे पहलू शामिल बताए गए, अब सवाल यह है कि क्या इसी तरह की जांच दुर्घटना से पहले नियमित रूप से की जा रही थी? यदि नियमित जांच हो रही थी,तो विभाग को पिछले महीनों का रिकॉर्ड सामने रखना चाहिए, कितनी बसों का निरीक्षण किया गया,कितनों में कमियां मिलीं, कितने चालान काटे गए,कितने वाहनों को जब्त किया गया और किन वाहनों को दोबारा संचालन की अनुमति दी गई—इन सभी सवालों का जवाब निरीक्षण रजिस्टर और कार्रवाई के रिकॉर्ड से मिल सकता है, यदि नियमित जांच नहीं हो रही थी,तो यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जिम्मेदार अधिकारियों ने निरीक्षण व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए क्या कदम उठाए, यहां किसी व्यक्ति को बिना जांच दोषी ठहराना उद्देश्य नहीं है, उद्देश्य यह जानना है कि यात्री सुरक्षा की निगरानी करने वाला तंत्र हादसे से पहले कितना सक्रिय था और दुर्घटना के बाद उसकी सक्रियता में अचानक तेजी क्यों दिखाई दी।
वाहन मालिक की जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
किसी भी यात्री बस का मालिक या ऑपरेटर अपने वाहन के सुरक्षित और वैधानिक संचालन के लिए जिम्मेदार होता है,वाहन की फिटनेस, आवश्यक दस्तावेजों की वैधता,तकनीकी स्थिति और निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है,यदि कोई वाहन मालिक नियमों का उल्लंघन करते हुए बस संचालित करता है, तो केवल इस आधार पर उसे जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता कि परिवहन विभाग ने उसे पहले नहीं रोका,लेकिन दूसरी तरफ, यदि किसी वाहन के दस्तावेजों में गंभीर कमियां थीं या वाहन की स्थिति यात्रियों की सुरक्षा के अनुकूल नहीं थी,तो विभागीय निगरानी और प्रवर्तन की भूमिका की जांच भी जरूरी है, इसलिए दो स्तरों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए, पहला, वाहन मालिक और ऑपरेटर ने नियमों का पालन किया या नहीं,दूसरा, परिवहन विभाग ने अपनी निर्धारित निगरानी और प्रवर्तन संबंधी जिम्मेदारियां कितनी प्रभावी ढंग से निभाईं,यदि किसी बस के खिलाफ पहले भी कार्रवाई हुई थी,तो उस कार्रवाई का परिणाम क्या रहा? यदि वाहन की फिटनेस समाप्त थी,तो वह किस आधार पर संचालित हो रही थी? यदि चालक ने नियमों का उल्लंघन किया,तो उसकी जिम्मेदारी क्या थी? इन सवालों का जवाब वाहन के रिकॉर्ड और दुर्घटना की जांच से मिलना चाहिए।
तीन बसें जब्त और चार पर चालान, लेकिन जांच का आधार क्या?
दुर्घटना के अगले दिन हुई कार्रवाई निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है,लेकिन कार्रवाई की संख्या अपने आप में यह साबित नहीं करती कि परिवहन व्यवस्था पहले पूरी तरह निष्कि्रय थी या अब सभी कमियां दूर हो गई हैं,तीन बसों की जब्ती के पीछे कौन-सी कमियां पाई गईं,यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। इसी तरह, चार बसों पर कुल 11 हजार रुपये का चालान किन उल्लंघनों के लिए लगाया गया, इसकी जानकारी भी सामने आनी चाहिए,क्या जब्त बसों की फिटनेस समाप्त थी? क्या उनके परमिट या बीमा में कोई समस्या थी? क्या वाहनों में तकनीकी खामी पाई गई? क्या किसी बस में ओवरलोडिंग थी? क्या संबंधित मालिकों को पहले नोटिस या चेतावनी दी गई थी? इन सवालों के जवाब से यह पता चलेगा कि जांच अभियान सामान्य दस्तावेजी कार्रवाई तक सीमित था या वास्तव में यात्रियों की सुरक्षा को प्रभावित करने वाली गंभीर कमियों पर कार्रवाई की गई, साथ ही,यह भी देखना होगा कि जब्त वाहनों के संबंध में आगे क्या वैधानिक कार्रवाई हुई और कमियों को दूर किए बिना उनके दोबारा संचालन पर रोक सुनिश्चित की गई या नहीं।
क्या अधिकारी को अटैच करना ही जवाबदेही तय करना है?
अमित प्रकाश कश्यप को नवा रायपुर अटैच करने का आदेश जारी होना प्रशासनिक स्तर पर उठाया गया कदम है,लेकिन इस आदेश से अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि दुर्घटना के लिए वे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार थे, जवाबदेही तय करने के लिए यह देखना होगा कि उनके कार्यक्षेत्र में कौन-कौन सी जिम्मेदारियां थीं, निरीक्षण व्यवस्था कैसे संचालित होती थी, किस स्तर पर निर्णय लिए जाते थे और क्या किसी विशिष्ट लापरवाही के प्रमाण उपलब्ध हैं, इसी तरह, उड़नदस्ते के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका,वाहन मालिकों की जिम्मेदारी तथा दुर्घटना के वास्तविक कारणों की जांच भी आवश्यक है,यदि विभागीय जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है,तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए,लेकिन जांच से पहले किसी अधिकारी या कर्मचारी को दुर्घटना का दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
हादसे के बाद कार्रवाई से आगे बढ़कर स्थायी व्यवस्था की जरूरत
केल्हारी बस दुर्घटना ने यात्री सुरक्षा की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं,दुर्घटना के बाद जांच अभियान चलाना और अधिकारी को अटैच करना प्रशासनिक प्रतिक्रिया है,लेकिन स्थायी समाधान के लिए नियमित निरीक्षण और प्रभावी प्रवर्तन व्यवस्था जरूरी है,शासन को कोरिया और एमसीबी दोनों जिलों की परिवहन व्यवस्था का परीक्षण करना चाहिए, दोनों जिलों में अधिकारियों और कर्मचारियों की उपलब्धता,उड़नदस्ते की कार्यप्रणाली,बसों की फिटनेस जांच,परमिट सत्यापन और नियमों के उल्लंघन पर की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड सामने आना चाहिए, इसके साथ ही दुर्घटना की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के माध्यम से यह पता लगाया जाना चाहिए कि हादसा किन परिस्थितियों में हुआ और क्या किसी स्तर पर लापरवाही ने जोखिम बढ़ाया,छह लोगों की मौत और 37 लोगों के घायल होने के बाद सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि किस अधिकारी को हटाया गया, असली सवाल यह है कि यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था ने हादसे से पहले क्या किया,क्या नहीं किया और आगे ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कौन-से ठोस कदम उठाए जाएंगे,क्योंकि किसी अधिकारी को अटैच करना प्रशासनिक आदेश है,जबकि दुर्घटना के कारणों की जांच,वाहन मालिकों की जवाबदेही और निगरानी तंत्र की कमियों को दूर करना वास्तविक जवाबदेही की कसौटी है।
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