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अंबिकापुर@ 1954-55 के रिकॉर्ड में खसरा ही नहीं…फिर कैसे निजी हो गई सरकारी जमीन?

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  • मैनपाट में सरकारी जमीन की कथित हेराफेरी पर बड़ा एक्शन,पांच के खिलाफ एफआईआर का आदेश
  • राजस्व रिकॉर्ड में कूटरचना कर सरकारी जमीन निजी नाम पर दर्ज कराने का आरोप,कलेक्टर ने दिया एफआईआर का आदेश
  • केसरा की 3.46 हेक्टेयर जमीन पर विवादः शिकायतकर्ता आलोक दुबे की शिकायत के बाद प्रशासन सख्त…
  • सरकारी जमीन की रजिस्ट्री पर प्रशासन का शिकंजा,पांच क्रेता-विक्रेताओं के खिलाफ एफआईआर की तैयारी
  • राजस्व अभिलेखों में कथित फर्जीवाड़ा उजागर,सरकारी भूमि की अवैध प्रविष्टि हटाने के निर्देश
  • मैनपाट में 3.46 हेक्टेयर शासकीय भूमि की कथित कूटरचना का मामला, आजाद इराकी समेत 5 के खिलाफ
  • एफआईआर के निर्देश
  • 1954-55 के अधिकार अभिलेख में खसरा नंबर 1378 का अस्तित्व नहीं,फिर निजी नाम पर कैसे दर्ज हुई जमीन?
  • शिकायतकर्ता आलोक दुबे की शिकायत और तहसीलदार की जांच के बाद कलेक्टर की कार्रवाई,राजस्व रिकॉर्ड से कथित अवैध प्रविष्टि हटाने के भी निर्देश


–न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,24 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)
। सरकारी जमीन को राजस्व अभिलेखों में कथित कूटरचना के जरिए निजी संपत्ति के रूप में दर्ज कराने और बाद में उसकी रजिस्ट्री किए जाने का मामला सरगुजा जिले में गंभीर प्रशासनिक कार्रवाई के स्तर तक पहुंच गया है,मैनपाट तहसील के ग्राम केसरा स्थित 3.460 हेक्टेयर शासकीय भूमि से जुड़े इस प्रकरण में कलेक्टर सरगुजा ने आजाद इराकी सहित कुल पांच क्रेता-विक्रेताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश तहसीलदार मैनपाट को दिए हैं, साथ ही राजस्व अभिलेखों में की गई कथित अवैध प्रविष्टि को विलोपित करने के लिए भी संबंधित राजस्व अधिकारी को निर्देशित किया गया है। इस मामले को सामने लाने वाले शिकायतकर्ता आलोक दुबे ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि ग्राम केसरा की शासकीय भूमि, खसरा नंबर 1378,रकबा 3.460 हेक्टेयर को राजस्व अधिकारियों-कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से अभिलेखों में कूटरचना कर निजी भूमि के रूप में दर्ज करा लिया गया,शिकायत में यह भी कहा गया कि इसके बाद भूमि का विक्रय कर दिया गया। आलोक दुबे ने कलेक्टर से पूरे मामले की जांच कराने,जमीन को शासकीय घोषित करने और कथित अनियमितता में शामिल लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी,शिकायत पर तहसीलदार मैनपाट से जांच प्रतिवेदन मंगाया गया,प्रशासनिक जानकारी के अनुसार,जांच में पुराने अधिकार अभिलेख और बाद के राजस्व दस्तावेजों के बीच महत्वपूर्ण अंतर सामने आया,इसी आधार पर कलेक्टर ने प्राथमिकी दर्ज कराने तथा राजस्व रिकॉर्ड में सुधार की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं,अब यह मामला केवल जमीन के स्वामित्व के विवाद तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि राजस्व अभिलेखों की विश्वसनीयता और शासकीय संपत्ति की सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है।
1995-96 के बंदोबस्त में भी शासकीय भूमि के रूप में दर्ज थी जमीन-जांच प्रतिवेदन में वर्ष 1995-96 के बंदोबस्त रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया गया है, इसके अनुसार,खसरा नंबर 1378, रकबा 3.460 हेक्टेयर भूमि छोटे झाड़ के जंगल यानी शासकीय मद में दर्ज थी,प्रतिवेदन में यह भी उल्लेख है कि संबंधित भूमि खसरा नंबर 576 से निर्मित हुई थी,पुराने सेटलमेंट रिकॉर्ड में खसरा नंबर 576, रकबा 84.38 एकड़,गोचर यानी शासकीय मद में दर्ज होने की बात कही गई है,इसके बाद वर्ष 1995-96 के बंदोबस्त में खसरा नंबर 1378 को छोटे झाड़ के जंगल की श्रेणी में दर्ज किए जाने का उल्लेख है,यह विवरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायत का मूल आधार ही यह है कि शासकीय मद में दर्ज जमीन को कथित रूप से निजी भूमि के रूप में दिखाया गया, यदि पुराने और बंदोबस्त अभिलेखों में जमीन का स्वरूप शासकीय पाया जाता है,तो बाद की निजी प्रविष्टियों का आधार, उनकी वैधता और उन्हें दर्ज करने की प्रक्रिया की जांच आवश्यक हो जाती है,इस मामले में अब संबंधित मूल अभिलेखों,खसरा पंचशाला,अधिकार अभिलेख,बंदोबस्त रिकॉर्ड और नामांतरण से जुड़े दस्तावेजों का मिलान जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
विजय सिंह के नाम प्रविष्टि से लेकर रजिस्ट्री तक की कड़ी जांच के घेरे में- प्रशासनिक जांच प्रतिवेदन के मुताबिक, संबंधित जमीन को विजय सिंह पिता चंद्रचरण सिंह के नाम दर्ज किए जाने के बाद उसके विक्रय से संबंधित दस्तावेज सामने आए, शिकायत और जांच में दिलीप चिकवा तथा तुलेश्वर गुप्ता का नाम मुख्तार आम के रूप में उल्लेखित है,उपलब्ध प्रशासनिक विवरण के अनुसार, 20 सितंबर 2022 को भूमि की रजिस्ट्री आजाद इराकी पिता रियाजुद्दीन इराकी और अनुपम कुमार सिंह के पक्ष में किए जाने का उल्लेख है,इसके बाद तहसीलदार मैनपाट ने 6 अक्टूबर 2022 को नामांतरण निरस्त कर दिया था,जांच प्रतिवेदन में 1 मई 2024 को पावर ऑफ अटॉर्नी से संबंधित दस्तावेज निष्पादित किए जाने का भी उल्लेख है, इस घटनाक्रम से भूमि के कथित हस्तांतरण, उसके आधार और संबंधित दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठते हैं,अब जांच का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह होगा कि जब भूमि के शासकीय होने से संबंधित पुराने रिकॉर्ड मौजूद थे,तो निजी स्वामित्व की प्रविष्टि किन दस्तावेजों के आधार पर हुई, रजिस्ट्री के समय प्रस्तुत दस्तावेजों का सत्यापन कैसे किया गया और नामांतरण की प्रक्रिया में किन अभिलेखों को आधार बनाया गया,इसकी भी पड़ताल आवश्यक है, हालांकि, किसी भी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा,फिलहाल कलेक्टर के निर्देश प्राथमिकी दर्ज कराने की कार्रवाई से संबंधित हैं।
आलोक दुबे की शिकायत के बाद प्रशासनिक जांच में सामने आए दस्तावेजी सवाल-शिकायतकर्ता आलोक दुबे ने कलेक्टर सरगुजा को दिए आवेदन में ग्राम केसरा की शासकीय भूमि को राजस्व अभिलेखों में कथित कूटरचना के जरिए निजी भूमि के रूप में दर्ज किए जाने का आरोप लगाया था,शिकायत में जमीन के पुराने रिकॉर्ड, खसरा नंबर और बाद में हुए कथित हस्तांतरण की जांच कराने की मांग की गई थी,आलोक दुबे की शिकायत में यह भी कहा गया कि जमीन को पहले निजी संपत्ति के रूप में दर्ज कराया गया और फिर दूसरे व्यक्तियों को बेच दिया गया,शिकायतकर्ता ने पूरे प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए संबंधित भूमि को शासकीय घोषित करने तथा दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की थी,प्रशासन ने शिकायत को समय-सीमा में दर्ज कर तहसीलदार मैनपाट से जांच प्रतिवेदन प्राप्त किया,जांच में सामने आए अभिलेखीय तथ्यों के आधार पर अब प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं,इस घटनाक्रम में शिकायतकर्ता की भूमिका महत्वपूर्ण रही,क्योंकि उनके आवेदन के बाद पुराने अधिकार अभिलेख और बाद के बंदोबस्त रिकॉर्ड के बीच अंतर को प्रशासनिक स्तर पर जांच के दायरे में लिया गया,हालांकि,कथित कूटरचना में किसकी क्या भूमिका रही,इसका अंतिम निर्धारण संबंधित दस्तावेजों और पुलिस विवेचना के आधार पर ही होगा।
वन भूमि के हस्तांतरण पर भी लागू होंगे कानूनी प्रावधान-मामले में संबंधित भूमि के छोटे झाड़ के जंगल यानी शासकीय मद में दर्ज होने का उल्लेख जांच प्रतिवेदन में किया गया है,ऐसे में भूमि के स्वरूप और हस्तांतरण की वैधता की जांच करते समय लागू वन संरक्षण संबंधी कानूनों तथा न्यायालयों के निर्देशों का परीक्षण भी महत्वपूर्ण होगा, प्रशासन की ओर से जारी जानकारी में कहा गया है कि वन भूमि के हस्तांतरण के मामलों में वन संरक्षण अधिनियम,1980 के प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप ही कार्रवाई की जा सकती है,इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि संबंधित भूमि की कानूनी श्रेणी क्या है,उस पर कौन-से नियम लागू होते हैं और क्या किसी वैधानिक अनुमति या सक्षम प्राधिकारी के आदेश के आधार पर हस्तांतरण हुआ था, इन प्रश्नों का जवाब संबंधित विभागों के रिकॉर्ड और जांच से ही सामने आएगा।
कलेक्टर के दो अहम निर्देशः एफआईआर और राजस्व रिकॉर्ड में सुधार-इस मामले में कलेक्टर सरगुजा की कार्रवाई के दो प्रमुख पहलू हैं,पहला, तहसीलदार मैनपाट को आजाद इराकी सहित कुल पांच क्रेता-विक्रेताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं,इससे मामले में कथित कूटरचना और भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया की पुलिस जांच का रास्ता खुलता है, दूसरा,राजस्व अभिलेखों में की गई कथित अवैध प्रविष्टि को विलोपित करने के लिए संबंधित राजस्व अधिकारी को निर्देशित किया गया है,इसका उद्देश्य रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियों की जांच कर नियमानुसार आवश्यक सुधार करना है,हालांकि,प्राथमिकी दर्ज होने या उसके निर्देश जारी होने मात्र से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता,पुलिस विवेचना में दस्तावेजों,हस्ताक्षरों,अभिलेखों की उत्पत्ति और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का परीक्षण किया जाना आवश्यक होगा, इसी तरह, राजस्व रिकॉर्ड में सुधार की प्रक्रिया भी लागू नियमों और सक्षम प्राधिकारी के आदेशों के अनुसार पूरी की जानी होगी।
अब पुलिस जांच में खुलेंगी अभिलेखों की परतें-ग्राम केसरा की 3.460 हेक्टेयर भूमि का मामला सरकारी जमीन की सुरक्षा,राजस्व रिकॉर्ड के रखरखाव और भूमि हस्तांतरण की वैधानिक प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने लाता है,वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख,वर्ष 1995-96 के बंदोबस्त रिकॉर्ड,वर्ष 2022 की रजिस्ट्री और नामांतरण निरस्त किए जाने से जुड़े दस्तावेज इस पूरे प्रकरण की जांच में अहम भूमिका निभा सकते हैं,शिकायतकर्ता आलोक दुबे की शिकायत के बाद प्रशासनिक जांच हुई और कलेक्टर ने प्राथमिकी दर्ज कराने तथा कथित अवैध प्रविष्टि विलोपित करने के निर्देश दिए हैं, अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस विवेचना में कथित कूटरचना के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका कैसे स्थापित होती है और राजस्व विभाग शासकीय भूमि से जुड़े रिकॉर्ड को दुरुस्त करने के लिए क्या कदम उठाता है,सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब बंदोबस्त रिकॉर्ड में जमीन शासकीय मद में दर्ज थी,तो बाद के दस्तावेजों में निजी स्वामित्व की प्रविष्टि किस आधार पर हुई? इसका जवाब पुराने अभिलेखों की जांच,संबंधित दस्तावेजों के सत्यापन और निष्पक्ष पुलिस विवेचना से ही सामने आएगा।
1954-55 के रिकॉर्ड में नहीं था खसरा नंबर 1378
इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम पहलू वर्ष 1954-55 का अधिकार अभिलेख है, तहसीलदार मैनपाट के जांच प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख का अंतिम खसरा नंबर 650 था,ऐसे में उस समय के अधिकार अभिलेख में खसरा नंबर 1378 की प्रविष्टि होने का सवाल ही नहीं उठता,जांच प्रतिवेदन के अनुसार,खसरा नंबर 1378 एक रिनंबरिंग खसरा है,जो पहली बार वर्ष 1995-96 के राजस्व दस्तावेजों में सामने आया,इससे पहले के रिकॉर्ड में इस नंबर की प्रविष्टि नहीं होने का उल्लेख जांच में किया गया है,शिकायतकर्ता आलोक दुबे ने इसी तथ्य को आधार बनाते हुए आरोप लगाया था कि पुराने अधिकार अभिलेख में बाद में कूटरचना कर खसरा नंबर 1378 की जमीन को विजय सिंह पिता चंद्रचरण सिंह के नाम दर्ज कराया गया,जांच प्रतिवेदन में भी वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख और बाद की प्रविष्टियों के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना गया है,यदि किसी भूमि का खसरा नंबर संबंधित समय के मूल अधिकार अभिलेख में मौजूद ही नहीं था,तो बाद में उसी अभिलेख के आधार पर निजी स्वामित्व का दावा कैसे तैयार हुआ? प्रविष्टि किस दस्तावेज के आधार पर की गई और उसे प्रमाणित किसने किया? ये ऐसे सवाल हैं,जिनका जवाब अब पुलिस विवेचना और संबंधित राजस्व रिकॉर्ड की विस्तृत जांच से सामने आना है।
नामांतरण निरस्त होने के बावजूद जमीन के दस्तावेजों पर उठे सवाल…
जांच प्रतिवेदन में उल्लेख है कि भूमि की रजिस्ट्री से संबंधित प्रक्रिया के बाद तहसीलदार मैनपाट ने 6 अक्टूबर 2022 को नामांतरण निरस्त कर दिया था,इसके बावजूद जमीन के पुराने और बाद के दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है,नामांतरण निरस्त होने का आदेश,रजिस्ट्री दस्तावेज और पावर ऑफ अटॉर्नी से संबंधित कागजात अब इस मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं,इन दस्तावेजों की तारीख,आधार और कानूनी प्रभाव का परीक्षण कर ही यह निर्धारित किया जा सकेगा कि भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया में कहां और किस स्तर पर कथित अनियमितता हुई,सवाल यह भी है कि यदि नामांतरण निरस्त कर दिया गया था,तो इसके बाद संबंधित भूमि को लेकर कौन-कौन सी गतिविधियां हुईं और क्या राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक सुधार समय पर किया गया? इन बिंदुओं की जांच से पूरे घटनाक्रम की कड़ी स्पष्ट हो सकती है।


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