- खंभे खड़े, तार भी बिछे…फिर भी घरों में नहीं जली बिजली…दीये जलाने की तैयारी,गांवों में अब भी बिजली का इंतजार
- दो साल से अधूरा विद्युतीकरण, चंदहा-बंशीपुर के ग्रामीण परेशान ‘आशीर्वाद का दीया’ के बीच गांवों का अंधेरा सवाल बनकर खड़ा
- खंभे और तार मौजूद,ट्रांसफार्मर- कनेक्शन का इंतजार गांव अंधेरे में,दीयों की रोशनी पर सवाल—अधूरे विद्युतीकरण ने बढ़ाई नाराजगी
- 17 सितंबर को जिले में 1.21 लाख से अधिक दीये जलाने की तैयारी, सोनहत के कई गांवों में डेढ़-दो साल से अधूरे पड़े विद्युतीकरण कार्य, छाता टॉगर में तीन साल से बिजली का इंतजार
-संवाददाता-
बैकुंठपुर/सोनहत,17 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में 17 सितंबर से शुरू हो रहे ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम को लेकर बड़े स्तर पर तैयारियां की गई हैं, जिलेभर में 1 लाख 21 हजार 300 से अधिक दीये जलाए जाने की तैयारी है, जबकि झुमका ओपन थिएटर में जिला स्तरीय आयोजन के दौरान 10 हजार दीये जलाने की योजना बताई गई है, जिला प्रशासन ने भी जिले के नागरिकों से कार्यक्रम में भागीदारी की अपील की है। लेकिन इसी रोशनी के बीच कोरिया के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों से बिजली जैसी बुनियादी सुविधा को लेकर सवाल सामने आ रहे हैं,सोनहत विकासखंड के कई गांवों में ग्रामीणों के अनुसार विद्युतीकरण के काम वर्षों से अधूरे पड़े हैं, कहीं खंभे और तार तो पहुंच गए, लेकिन ट्रांसफार्मर और कनेक्शन का इंतजार है तो कहीं वैकल्पिक रूप से लगाए गए सौर ऊर्जा संयंत्र भी काम नहीं कर रहे हैं,ऐसे में सवाल यह है कि जब कई घरों में स्थायी बिजली का उजाला अब भी नहीं पहुंच पाया है, तब सरकारी और सार्वजनिक आयोजनों की रोशनी के साथ उन गांवों की समस्या कब दूर होगी?
छाता टॉगर में तीन साल से बिजली का इंतजार-सोनहत विकासखंड के कैलाशपुर ग्राम पंचायत के छाता टॉगर मोहल्ले की स्थिति इस समस्या को और गंभीर रूप से सामने रखती है,स्थानीय जानकारी के अनुसार करीब तीन वर्ष पहले शॉर्ट सर्किट के कारण बिजली के खंभों के तार जल गए थे,इसके बाद ग्रामीणों को उम्मीद थी कि विद्युत विभाग जल्द मरम्मत कर आपूर्ति बहाल कर देगा,लेकिन लंबे समय बाद भी समस्या बनी हुई है, ग्रामीणों का कहना है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी मोहल्ले में नियमित बिजली आपूर्ति बहाल नहीं हो सकी है,यानी डिजिटल युग और 5 प्रतिशत जैसी तकनीक की चर्चा के बीच इस बस्ती के लोग अब भी मूलभूत विद्युत सुविधा के लिए इंतजार कर रहे हैं।
बिजली नहीं,फिर भी बिल आने का आरोप-छाता टॉगर के ग्रामीणों ने एक और गंभीर सवाल उठाया है, उनका आरोप है कि मोहल्ले में बिजली की खपत नहीं होने के बावजूद कई महीनों तक बिजली के बिल आते रहे, यदि यह आरोप सही है तो मामला केवल बिजली आपूर्ति बाधित होने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विद्युत बिलिंग व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है, हालांकि इस संबंध में विद्युत विभाग की ओर से आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है, इसलिए बिल आने से संबंधित आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और विभागीय रिकॉर्ड से जांच आवश्यक होगी।
सड़क और पानी की समस्या भी बरकरार- छाता टॉगर की समस्या सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है,ग्रामीणों के मुताबिक मोहल्ले में पक्की सड़क और साफ पेयजल की सुविधा भी पर्याप्त नहीं है,बारिश के दिनों में कीचड़ भरे रास्तों और खेतों की मेढ़ों से होकर लोगों को आवागमन करना पड़ता है, रात के समय बिजली नहीं होने से स्थिति और कठिन हो जाती है,ग्रामीणों के अनुसार जंगल से लगे इलाके होने के कारण अंधेरे में जंगली जानवरों का खतरा भी बना रहता है,इसका असर बच्चों की पढ़ाई और ग्रामीणों की सुरक्षा दोनों पर पड़ रहा है।
कोरिया जन सहयोग समिति ने उठाए सवाल-मामले को लेकर कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े ने शासन-प्रशासन की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए हैं, उनका कहना है कि यदि जिस तरह ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के लिए तैयारियां की जा रही हैं,उसी तरह विद्युतविहीन और अधूरे विद्युतीकरण वाले गांवों की समस्याओं को दूर करने पर भी ध्यान दिया जाए तो ग्रामीणों को वास्तविक राहत मिलेगी, राजवाड़े के अनुसार दीया जलाना गलत नहीं है,लेकिन इसके साथ ग्रामीणों की मूलभूत समस्याओं का समाधान भी जरूरी है,उनका कहना है कि सत्ता पक्ष और प्रशासन को उन गांवों की वास्तविक परेशानियों को प्राथमिकता देते हुए बिजली जैसी बुनियादी सुविधा सुनिश्चित करनी चाहिए।
झुमका की रोशनी बनाम गांवों का अंधेरा- ‘आशीर्वाद का दीया’ के तहत झुमका ओपन थिएटर को 10 हजार दीयों से सजाने और जिलेभर में 1.21 लाख से अधिक दीप प्रज्ज्वलित करने की तैयारियां की गई हैं, प्रशासनिक अपील में इसे सेवा,समर्पण और जनभागीदारी से जोड़कर देखा जा रहा है, दूसरी तरफ सोनहत के दूरस्थ गांवों में बिजली की समस्या का बने रहना आयोजन और बुनियादी जरूरतों के बीच का अंतर सामने लाता है,एक तरफ कुछ घंटों के लिए हजारों दीयों से सार्वजनिक स्थल रोशन होंगे,दूसरी तरफ कुछ गांवों में परिवार वर्षों से स्थायी बिजली के उजाले का इंतजार कर रहे हैं,यही विरोधाभास अब ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा का विषय बन रहा है।
चंदहा से तंजरा तक अधूरे विद्युतीकरण का सवाल
सोनहत विकासखंड के चंदहा, बंशीपुर, कचौहर, नवाटोला और तंजरा ठाकुरहथी जैसे दूरस्थ इलाकों में विद्युतीकरण कार्य अधूरा होने का मुद्दा सामने आया है, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इन क्षेत्रों में पूर्व में स्वीकृत कार्यों के तहत खंभे और तार लगाए गए, लेकिन आगे का काम लंबे समय से आगे नहीं बढ़ सका, ग्रामीणों का कहना है कि कई स्थानों पर डेढ़ से दो साल से काम ठप है, ट्रांसफार्मर नहीं लगने और विद्युत कनेक्शन नहीं मिलने के कारण अधोसंरचना तैयार होने के बावजूद बिजली की आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी है, यह स्थिति खासतौर पर उन दूरस्थ बस्तियों के लिए परेशानी का कारण है, जहां पहले से ही सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य और संचार जैसी सुविधाओं की पहुंच सीमित है।
सौर ऊर्जा भी बनी स्थायी समाधान नहीं
विद्युत लाइन नहीं पहुंचने वाले कुछ इलाकों में शासन-प्रशासन की ओर से सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए गए थे, ग्रामीणों के मुताबिक शुरुआती दौर में इनसे कुछ राहत मिली, लेकिन वर्तमान में कई संयंत्र काम नहीं कर रहे हैं, स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के मौसम में पर्याप्त धूप नहीं मिलने, बैटरी की खराबी और रखरखाव के अभाव में सौर ऊर्जा व्यवस्था प्रभावित हुई है, परिणाम यह है कि कई घरों में रोशनी की जरूरत पूरी करना भी मुश्किल हो गया है, ग्रामीणों के सामने समस्या सिर्फ घरेलू रोशनी तक सीमित नहीं है। बिजली के अभाव में पंखे, पानी के पंप और अन्य आवश्यक उपकरण भी नहीं चल पाते, बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।
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