भैयाथान के राजस्व प्रकरण में 28 नवंबर 2024 से शुरू हुई कार्रवाई,पटवारी की मौका जांच,पंचनामा और मृत्यु तिथि के उल्लेख पर सवाल; दस्तावेज सही हैं तो जवाब कौन देगा?
एक ही महिला,एक ही जमीन और मौत की तारीख के अलग-अलग उल्लेख का आरोप…राजस्व विभाग की फाइलें अब खुद सवाल पूछ रही हैं…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,11 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। सरकारी दफ्तरों की फाइलों की भी अपनी एक दुनिया होती है। वहां इंसान कभी जीवित होता है, कभी मृत हो जाता है,कभी उसकी जमीन उसकी रहते हुए किसी और की हो जाती है और कभी वर्षों बाद पैदा होने वाला दस्तावेज उससे भी पहले की घटना का प्रमाण बनकर सामने आ जाता है,आम आदमी के लिए यह सब सुनना अजीब लग सकता है, लेकिन राजस्व विभाग की फाइलों में अगर ऐसा कुछ दिखाई दे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कागजों की दुनिया में सच कौन है और झूठ कौन? सूरजपुर जिले की भैयाथान तहसील से जुड़े एक भूमि प्रकरण में सामने आए दस्तावेजों ने कुछ ऐसे ही सवाल खड़े किए हैं। मामला ग्राम कोयलारी/करकोटी से संबंधित भूमि, खसरा नंबर 344/1 एवं 344/2, रकबा 0.16-0.16 और महिला भूमिस्वामी शैल कुमारी देवी,पति स्वर्गीय राधेश्याम दुबे से संबंधित बताया गया है। उपलब्ध तहसीली दस्तावेज में 28 नवंबर 2024 को प्रकरण शुरू किए जाने और शैल कुमारी देवी की मृत्यु 9 फरवरी 1967 बताए जाने के आधार पर उनके स्थान पर नामांतरण के लिए आवेदन किए जाने का उल्लेख है,अब सवाल यह है कि यदि दस्तावेजों में दर्ज तारीख और उससे जुड़ी पूरी प्रक्रिया सही है तो मामला सामान्य राजस्व कार्रवाई है,लेकिन यदि शिकायतकर्ता द्वारा उठाई गई विसंगतियां दस्तावेजों की मूल प्रतियों से सही साबित होती हैं, तो फिर यह महज फाइल की एक गलती नहीं बल्कि गंभीर जांच का विषय बन सकता है, और यहीं से शुरू होती है ‘कागजों में मौत और जमीन का जीवन’ की कहानी।
28 नवंबर 2024 को खुली फाइल, फिर शुरू हुआ नामांतरण का सफर- उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार 28 नवंबर 2024 को तहसील कार्यालय भैयाथान में संबंधित राजस्व प्रकरण दर्ज किया गया, आवेदन में बताया गया कि ग्राम कोयलारी की भूमि खसरा नंबर 344/1 एवं 344/2 पर राजस्व रिकॉर्ड में शैल कुमारी देवी का नाम दर्ज है, आवेदनकर्ता की ओर से यह दावा किया गया कि शैल कुमारी देवी की मृत्यु 9 फरवरी 1967 को हो चुकी है और उनकी जगह आवेदक के नाम नामांतरण किया जाए,तहसील कार्यालय की प्रक्रिया में इश्तहार प्रकाशन और हल्का पटवारी से मौका जांच कराने का निर्देश भी दर्ज है, यानी फाइल ने सरकारी नियमों के रास्ते पर चलना शुरू कर दिया था, यहां तक सब कुछ सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया जैसा दिखाई देता है, लेकिन फाइलों में असली रोमांच तब शुरू होता है जब अलग-अलग कागजों को एक साथ रखकर पढ़ा जाए।
पंचनामा और मौका रिपोर्ट—दो दस्तावेज या एक ही कहानी? शिकायतकर्ता की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि पंचनामा और मौका जांच रिपोर्ट की भाषा और विवरण में अत्यधिक समानता है, अगर दोनों अलग-अलग प्रक्रिया के दस्तावेज हैं तो उनका उद्देश्य भी अलग-अलग होना चाहिए, एक में मौके की स्थिति,उपस्थित व्यक्तियों और स्थानीय सत्यापन की जानकारी हो सकती है, जबकि दूसरे में अधिकारी की जांच का निष्कर्ष हो सकता है,लेकिन अगर दोनों दस्तावेज लगभग एक ही शब्दावली में तैयार हुए हैं,तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दोनों स्वतंत्र रूप से तैयार हुए या एक ही सामग्री को अलग-अलग शीर्षकों के नीचे दर्ज किया गया? फिर वही सरकारी फाइल का दर्शन सामने आता है—कागज दो हों तो क्या जांच भी दो हुई? इसका उत्तर दस्तावेज तैयार करने वाले और संबंधित अधिकारियों से ही मिल सकता है।
एक जमीन,कई सवाल और राजस्व व्यवस्था की परीक्षा-मामला सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि जमीन किसके नाम होगी, असली प्रश्न राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता का है,अगर कोई व्यक्ति अपनी जमीन का मालिक है और उसके जीवित रहते उसे मृत बताकर जमीन का नामांतरण किसी और के पक्ष में हो जाए तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक होगी,और अगर दस्तावेजों में ऐसी बात नहीं हुई है तथा सभी कार्यवाहियां नियमों के अनुरूप हुई हैं तो शिकायतों का समाधान भी दस्तावेजों की जांच से ही हो सकता है,अर्थात दोनों ही परिस्थितियों में रास्ता एक ही है—निष्पक्ष जांच।
तहसीलदार की भूमिका पर भी उठेंगे सवाल-इस प्रकरण में तत्कालीन तहसीलदार की भूमिका इसलिए भी जांच के दायरे में आती है क्योंकि उपलब्ध दस्तावेजों में तहसीलदार कार्यालय से जारी आदेश, इश्तहार और पटवारी को मौका जांच के निर्देश मौजूद हैं,किसी भी राजस्व अधिकारी को दोषी मान लेना पत्रकारिता नहीं है,लेकिन किसी अधिकारी के आदेश से प्रक्रिया चली है तो उस प्रक्रिया की वैधानिकता पर सवाल उठाना भी पत्रकारिता का हिस्सा है, इसलिए जांच में यह देखा जाना चाहिए कि तहसीलदार के सामने कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत हुए थे,उन दस्तावेजों की सत्यता कैसे जांची गई,मृत्यु और उत्तराधिकार का सत्यापन किस स्तर पर हुआ तथा नामांतरण की प्रक्रिया में कौन-कौन से अभिलेख आधार बनाए गए।
मृत्यु के बाद जमीन खरीदने का दावा…सबसे सनसनीखेज सवाल- शिकायतकर्ता द्वारा इस प्रकरण में एक बेहद गंभीर दावा किया गया है कि जमीन की खरीद की तारीख और कथित मृत्यु तिथि के बीच वर्षों का अंतर है और इसी कारण यह सवाल उठता है कि क्या दस्तावेजी घटनाक्रम कालक्रम की कसौटी पर खरा उतरता है,यह दावा अगर मूल रजिस्ट्री और राजस्व दस्तावेजों से प्रमाणित होता है तो मामला असाधारण हो जाएगा,लेकिन यहां सावधानी भी जरूरी है,किसी दस्तावेज में तारीख का उल्लेख मात्र यह सिद्ध नहीं करता कि पूरा लेन-देन उसी तरह हुआ था जैसा शिकायत में बताया गया है,इसके लिए मूल विक्रय विलेख,पंजीयन रिकॉर्ड,मृत्यु पंजी, नामांतरण रिकॉर्ड और संबंधित समय के राजस्व अभिलेख की तुलना करनी होगी,यानी कहानी में रोमांच जितना है,जांच की जरूरत उससे कहीं ज्यादा है।
अगर कागज सही हैं तो जवाब कौन देगा,और अगर गलत हैं तो किसने बनाया?-यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा व्यंग्यात्मक प्रश्न है,सरकारी फाइल में अगर सब कुछ सही है तो शिकायतकर्ता के सवालों का जवाब देने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए, दस्तावेज सामने रखिए,मृत्यु प्रमाण-पत्र दिखाइए,नामांतरण का आधार बताइए,पंचनामा के हस्ताक्षरकर्ताओं की पहचान कराइए और मामला खत्म,लेकिन यदि दस्तावेजों में विरोधाभास हैं तो फिर सवाल और गंभीर होंगे, गलत तारीख किसने लिखी? गलत जानकारी किसने दी? सत्यापन किसने किया? फाइल किसने आगे बढ़ाई? आदेश किस आधार पर हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण—अगर किसी की जमीन को गलत दस्तावेजों के सहारे दूसरे के नाम करने का प्रयास हुआ,तो जिम्मेदारी तय कौन करेगा?
राजस्व विभाग के लिए यह सिर्फ एक फाइल नहीं होनी चाहिए…
ऐसे मामले में विभाग को केवल यह देखकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए कि फाइल में नोटशीट पूरी है और आदेश पर हस्ताक्षर मौजूद हैं, जरूरत इस बात की है कि पूरी प्रक्रिया की तारीखवार जांच की जाए,28 नवंबर 2024 को आवेदन से लेकर इश्तहार,पटवारी को निर्देश,मौका जांच, पंचनामा,मृत्यु संबंधी दस्तावेज,नामांतरण की कार्यवाही और उसके बाद के रिकॉर्ड तक प्रत्येक कड़ी को जोड़ा जाए,उपलब्ध दस्तावेजों में तहसील कार्यालय की प्रमाणित प्रतियों पर 13 मई 2025 की तारीख भी दिखाई देती है,यानी अब विभाग के पास यह पता लगाने का पूरा अवसर है कि फाइल में कौन-सा दस्तावेज कब आया और किस आधार पर आगे बढ़ा।
अब फैसला फाइल नहीं,निष्पक्ष जांच करेगी
इस प्रकरण में आरोप गंभीर हैं, लेकिन आरोप और अपराध सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए किसी अधिकारी,कर्मचारी या अन्य व्यक्ति को बिना जांच दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा,लेकिन यही बात दूसरी तरफ भी लागू होती है,गंभीर दस्तावेजी सवालों को केवल शिकायत कहकर फाइल में दबा देना भी उचित नहीं होगा,मूल रिकॉर्ड निकाला जाए। जन्म-मृत्यु रजिस्टर देखा जाए,मृत्यु प्रमाण-पत्र की सत्यता जांची जाए। संबंधित जमीन की रजिस्ट्री और नामांतरण रिकॉर्ड का मिलान किया जाए। पंचनामा पर हस्ताक्षर करने वालों के बयान लिए जाएं,वंशावली की स्वतंत्र पुष्टि की जाए,जरूरत हो तो संदिग्ध दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच कराई जाए,तभी पता चलेगा कि यह राजस्व रिकॉर्ड की सामान्य त्रुटि थी, लापरवाही थी या फिर किसी सुनियोजित फर्जीवाड़े का हिस्सा,फिलहाल दस्तावेजों की फाइल एक सवाल पर अटकी है जिसे कागजों में मृत बताया गया,उसकी जमीन आखिर जिंदा किसके नाम हो गई? और शायद इस सवाल का जवाब अगली फाइल खोलेगी।
फाइल कहती है मौत 1967 में हुई,सवाल पूछता है रिकॉर्ड
मामले की सबसे बड़ी गांठ मृत्यु तिथि को लेकर है,तहसील कार्यालय के दस्तावेज में शैल कुमारी देवी की मृत्यु 09.02.1967 बताई गई है,यही तारीख नामांतरण आवेदन के आधार में भी दिखाई देती है,शिकायतकर्ता का आरोप है कि मौका जांच से जुड़े दस्तावेज में मृत्यु की तारीख को अलग तरीके से दर्ज किया गया,यदि मूल दस्तावेजों की जांच में यह अंतर प्रमाणित होता है तो सवाल बहुत सीधा है—एक ही महिला की मृत्यु की तारीख आखिर कितनी हो सकती है? सरकारी रिकॉर्ड में तारीख कोई साहित्यिक कल्पना नहीं होती कि लेखक की सुविधा से बदल जाए,मृत्यु की तारीख के आधार पर उत्तराधिकार तय होता है,उत्तराधिकार के आधार पर नामांतरण होता है और नामांतरण के बाद जमीन के अधिकार बदल सकते हैं,इसलिए यहां तारीख का अंतर यदि वास्तविक है तो वह छोटा सवाल नहीं है।
और साहब,कहानी में ‘मौका जांच’ भी है…
तहसीलदार कार्यालय ने हल्का पटवारी से मौका जांच रिपोर्ट मांगी,इसके बाद संबंधित पटवारी द्वारा मौका जांच और पंचनामा प्रस्तुत किए जाने की बात दस्तावेजों में सामने आती है,उपलब्ध रिकॉर्ड में पंचनामा पर कई हस्ताक्षर भी दिखाई देते हैं,शिकायतकर्ता ने इस पंचनामा की तारीख, हस्ताक्षरों और उसमें दर्ज व्यक्तियों की पहचान पर सवाल उठाए हैं,अब सवाल यह नहीं कि पंचनामा पर कितने हस्ताक्षर हैं। सवाल यह है कि वे हस्ताक्षर किसके हैं और किस आधार पर किए गए? यदि जमीन ग्राम करकोटी में है तो मौके की जांच करने वाले अधिकारी ने किन ग्रामीणों से जानकारी ली? क्या सभी हस्ताक्षरकर्ताओं की पहचान सत्यापित हुई? क्या उनके बयान दर्ज हुए? क्या उनके गांव और भूमि से संबंध की पुष्टि हुई? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच से मिल सकता है।
वंशावली में भी कहानी ने लिया मोड़…
मामले में एक और महत्वपूर्ण आरोप उत्तराधिकारियों की सूची को लेकर है,शिकायतकर्ता का दावा है कि संबंधित मौका जांच और पंचनामा में शैल कुमारी देवी के उत्तराधिकार को लेकर सीमित जानकारी दर्ज की गई,जबकि उसी अवधि के अन्य राजस्व प्रकरणों में उनके अन्य कथित उत्तराधिकारियों के नाम सामने आते हैं,यदि यह तथ्य रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो सवाल बेहद महत्वपूर्ण है—एक ही व्यक्ति की जमीन के दो अलग-अलग राजस्व मामलों में उसके वारिस अलग-अलग कैसे हो गए? राजस्व विभाग में वंशावली कोई ऐसी चीज नहीं होनी चाहिए जिसे फाइल के हिसाब से छोटा-बड़ा किया जाए। जिस व्यक्ति के नाम जमीन दर्ज है, उसके वास्तविक उत्तराधिकारी कौन हैं, यह निर्धारित करने के लिए जन्म, मृत्यु, परिवार और उत्तराधिकार से जुड़े रिकॉर्ड की जांच आवश्यक होती है, इसलिए इस मामले में वंशावली की स्वतंत्र पुष्टि भी बेहद जरूरी है।
आधार कार्ड भी फाइल में है,लेकिन असली सवाल मृत्यु प्रमाण-पत्र का
उपलब्ध दस्तावेजों में शैल कुमारी दुबे का आधार संबंधी दस्तावेज भी शामिल है, जिसमें नाम, महिला का विवरण और जन्मतिथि 20 जनवरी 1947 दिखाई देती है, यह दस्तावेज अपने आप में किसी निश्चित तारीख तक जीवित होने का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता,लेकिन यह जरूर बताता है कि संबंधित महिला की पहचान से जुड़ा दस्तावेज रिकॉर्ड में मौजूद था, इसलिए जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही रहेगा कि—9 फरवरी 1967 की मृत्यु का मूल प्रमाणपत्र कौन-सा था? वह कब जारी हुआ? किस रजिस्टर के आधार पर जारी हुआ? उस समय संबंधित महिला की पहचान कैसे सत्यापित हुई? और यदि मृत्यु प्रमाणपत्र बाद की तारीख में तैयार हुआ तो उसका आधार क्या था? इन सवालों के जवाब के बिना केवल कागज देखकर किसी को दोषी ठहराना भी सही नहीं होगा और कागज में दर्ज गंभीर विसंगतियों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
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