क्या प्रशासनिक विवेक और शासन की मंशा में है विरोधाभास?
सुदामा राजवाड़े
बलरामपुर/रामानुजगंज,04 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ शासन पिछले कई महीनों से शिक्षा विभाग में वर्षों से चली आ रही संलग्नीकरण (अटैचमेंट) व्यवस्था को समाप्त करने का अभियान चला रहा है, स्वयं मुख्यमंत्री,स्कूल शिक्षा मंत्री और विभागीय अधिकारी सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट कर चुके हैं कि शिक्षक और शिक्षा विभाग के कर्मचारी अपने मूल कार्यस्थलों पर लौटेंगे तथा विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाएगी,इसी बीच बलरामपुर-रामानुजगंज जिले से जारी एक आदेश ने प्रशासनिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है,जिला कलेक्टर द्वारा जारी आदेश में मूलतः प्रधान पाठक (हेडमास्टर) रहे मुन्ना लाल धुर्वे को जनपद पंचायत कुसमी का प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी नियुक्त किया गया है,आदेश के अनुसार उन्हें प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार भी प्रदान किए गए हैं, यह आदेश सामने आने के बाद अब कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह निर्णय शासन की घोषित नीति की भावना के अनुरूप है अथवा केवल प्रशासनिक आवश्यकता के तहत लिया गया एक अस्थायी कदम है।
क्या कहता है आदेश?
31 जुलाई 2026 को जारी कलेक्टर कार्यालय के आदेश में उल्लेख है कि प्रशासनिक व्यवस्था के तहत मुन्ना लाल धुर्वे,जो वर्तमान में प्रभारी क्षेत्र संयोजक,कार्यालय सहायक आयुक्त आदिवासी विकास के रूप में कार्यरत हैं,उन्हें जनपद पंचायत कुसमी के प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार सौंपा जाता है,आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि उन्हें उक्त पद से संबंधित प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार प्राप्त होंगे तथा यह व्यवस्था आगामी आदेश तक प्रभावशील रहेगी।
मूल पद प्रधान पाठक,फिर
प्रशासनिक दायित्वों की लंबी श्रृंखला
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार मुन्ना लाल धुर्वे का मूल पद प्रधान पाठक है,वर्ष 2024 में आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा जारी आदेश के माध्यम से उन्हें कार्यालय आयुक्त, आदिम जाति विकास विभाग में आगामी आदेश तक कार्य करने हेतु प्रतिनियुक्त किया गया था,इसके बाद वर्तमान में वे सहायक आयुक्त कार्यालय में प्रभारी क्षेत्र संयोजक के रूप में कार्यरत हैं और अब उन्हें जनपद पंचायत कुसमी के सीईओ का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया है, यही तथ्य अब चर्चा का विषय बना हुआ है कि एक शिक्षक संवर्ग के अधिकारी को लगातार विभागीय एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंपे जाने का औचित्य क्या है।
कोरिया जिले का कार्यकाल भी फिर चर्चा में…
इस आदेश के बाद वर्तमान कलेक्टर का पूर्व कार्यकाल भी चर्चा में आ गया है, जानकारों का कहना है कि जब वे कोरिया जिले में कलेक्टर थीं, तब भी दो नियमित शासन नियुक्त जनपद पंचायत सीईओ जिला कार्यालय में कार्यरत रहे,जबकि जनपद पंचायतों में अन्य अधिकारियों को प्रभार सौंपा गया था,यह भी दावा किया जा रहा है कि उस समय इस विषय को लेकर न्यायालय में मामला विचाराधीन था तथा शासन नियुक्त अधिकारियों के संबंध में न्यायालय के निर्देशों की भी चर्चा हुई थी,हालांकि इन दावों की अंतिम पुष्टि संबंधित न्यायालयीन अभिलेखों और शासन के रिकॉर्ड से ही हो सकती है, फिर भी वर्तमान आदेश के बाद उस पुराने प्रशासनिक निर्णय की चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है।
शिक्षा विभाग में संलग्नीकरण समाप्त करने के दावे
राज्य शासन ने पिछले कुछ समय में शिक्षा व्यवस्था सुधारने के उद्देश्य से स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जाए,संलग्न शिक्षकों को मूल विद्यालयों में वापस भेजा जाए, विद्यालयों में शिक्षक उपलब्धता सुनिश्चित की जाए,शिक्षा विभाग के कर्मचारी अपने मूल दायित्वों का निर्वहन करें,इन्हीं निर्देशों के बाद प्रदेश के कई जिलों में संलग्नीकरण समाप्त करने की कार्रवाई भी हुई,ऐसे में बलरामपुर-रामानुजगंज का यह आदेश कई प्रशासनिक और नीतिगत प्रश्न खड़े कर रहा है।
क्या यह शासन की मंशा के अनुरूप है?
सबसे बड़ा प्रश्न यही उठ रहा है कि यदि शासन का उद्देश्य शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को पुनः शिक्षा व्यवस्था में वापस लाना है, तो क्या मूलतः प्रधान पाठक रहे अधिकारी को जनपद पंचायत सीईओ का प्रभार देना उसी नीति के अनुरूप माना जाएगा? यदि यह केवल प्रशासनिक आवश्यकता है तो नियमित सीईओ की नियुक्ति क्यों नहीं की गई? क्या जिले में योग्य प्रशासनिक अधिकारी उपलब्ध नहीं थे? क्या यह व्यवस्था केवल अस्थायी है या लंबे समय तक जारी रहेगी? इन प्रश्नों के उत्तर फिलहाल प्रशासन की ओर से सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं।
क्या प्रशासनिक
आवश्यकता बनी वजह?
प्रशासनिक विशेषज्ञों का एक वर्ग यह भी मानता है कि कई बार रिक्त पदों,अधिकारियों की कमी या प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण अतिरिक्त प्रभार देना शासन व्यवस्था का सामान्य हिस्सा होता है,यदि कुसमी जनपद पंचायत में नियमित सीईओ उपलब्ध नहीं थे, तो संभव है कि प्रशासनिक कार्य प्रभावित न हों,इसलिए यह व्यवस्था की गई हो,हालांकि आदेश में इस प्रकार की परिस्थितियों का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है।
सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस…
आदेश सार्वजनिक होने के बाद सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं,एक पोस्ट में लिखा गया संलग्नीकरण समाप्त करने के दावों की खुली पोल, प्रधान पाठक को मिला सीईओ का प्रभार,यद्यपि यह व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है, लेकिन इससे स्पष्ट है कि आदेश को लेकर आम लोगों के बीच भी चर्चा प्रारंभ हो चुकी है।
उठ रहे हैं कई अहम सवाल…
– क्या यह आदेश शासन की संलग्नीकरण समाप्त करने की नीति से मेल खाता है?
– क्या प्रधान पाठक का मूल विभाग अब भी शिक्षा विभाग ही माना जाएगा?
– क्या इस आदेश के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग अथवा शासन स्तर से कोई अनुमति ली गई?
– क्या भविष्य में ऐसे आदेशों पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे?
– क्या अन्य जिलों में भी इसी प्रकार की व्यवस्था लागू है?
क्या कहते हैं दस्तावेज़?
– मूल पद — प्रधान पाठक।
– वर्ष 2024 में आदिम जाति विकास विभाग में प्रतिनियुक्ति।
– वर्तमान में सहायक आयुक्त कार्यालय में प्रभारी क्षेत्र संयोजक।
– 31 जुलाई 2026 को कुसमी जनपद पंचायत के प्रभारी सीईओ का अतिरिक्त प्रभार।
द्द प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार भी प्रदान किए गए।
मुख्य सवाल…
जब शासन शिक्षा विभाग के कर्मचारियों को मूल पदस्थापना पर लौटाने की नीति लागू कर रहा है, तब क्या मूलतः प्रधान पाठक रहे अधिकारी को जनपद पंचायत सीईओ का प्रभार देना उसी नीति की भावना के अनुरूप माना जाएगा,या यह केवल प्रशासनिक आवश्यकता के तहत लिया गया निर्णय है? इस प्रश्न का उत्तर अब जिला प्रशासन और राज्य शासन के स्पष्टीकरण से ही स्पष्ट हो सकेगा।
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