- चार महीने बाद होगा राजनीतिक इम्तिहान,बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में किसकी होगी जीत?
- कोरिया की दो नगरपालिकाओं में दिलचस्प मुकाबला,इतिहास दोहराएगा या बनेगा नया अध्याय?
- सत्ता भाजपा की…लेकिन क्या नगर पालिकाओं में भी बजेगा जीत का डंका?
- बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में चुनावी बिसात तैयार,किसकी चाल पड़ेगी भारी?
- गुटबाजी,टिकट और विकास…इन्हीं तीन सवालों पर टिकी कोरिया की चुनावी जंग
- बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में चुनावी रण, क्या सत्ता का साथ मिलेगा या जनता बदलेगी समीकरण?
- चार महीने बाद बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा में लोकतंत्र का महायुद्ध,जनता के मुद्दे बनेंगे हथियार या फिर गुटबाजी ही लिखेगी चुनावी पटकथा?
रवि सिंह
कोरिया/बैकुण्ठपुर,04 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। राजनीति में एक कहावत अक्सर सुनने को मिलती है,‘चुनाव जनता लड़ती है,लेकिन हार अक्सर नेता आपस में लड़कर जाते हैं,’कोरिया जिले की दो प्रमुख नगरीय निकायों में बैकुंठपुर नगर पालिका और शिवपुर-चरचा नगर पालिका—का चुनावी इतिहास इस कहावत को कई बार सच साबित करता नजर आता है। वर्ष 2027 की शुरुआत में इन दोनों निकायों में चुनाव होने हैं,अभी लगभग चार महीने का समय शेष है,लेकिन राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है, दावेदार सक्रिय हैं,समर्थक अपने-अपने नेताओं के लिए माहौल बनाने में जुट गए हैं और दोनों प्रमुख दल—भाजपा और कांग्रेस—अपने चुनावी गणित को साधने में लगे हैं, प्रदेश में भाजपा की सरकार है, ऐसे में भाजपा के लिए यह चुनाव केवल नगर पालिका जीतने का नहीं, बल्कि सरकार की लोकप्रियता की परीक्षा भी होगा,वहीं कांग्रेस इसे खोया जनाधार वापस पाने का अवसर मान रही है,लेकिन कोरिया की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां सत्ता की हवा हमेशा वोटों में नहीं बदलती,कई बार स्थानीय नाराजगी,उम्मीदवार की छवि और दलों की अंदरूनी राजनीति चुनाव का पूरा गणित बदल देती है।
बैकुंठपुरःजहां विरोधियों से ज्यादा अपनों ने नुकसान पहुंचाया-बैकुंठपुर नगर पालिका का पिछला चुनाव आज भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना रहता है,उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी,सामान्य धारणा थी कि सत्ता का लाभ कांग्रेस को मिलेगा,लेकिन परिणाम भाजपा के पक्ष में गया,राजनीतिक विश्लेषणों में उस चुनाव का सबसे चर्चित निष्कर्ष यही रहा कि कांग्रेस को जितना नुकसान भाजपा ने नहीं पहुंचाया,उससे अधिक नुकसान उसकी अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी ने पहुंचाया, चुनाव जीतने के बाद भी यदि संगठन एकजुट न रहे तो सत्ता हाथ से फिसल सकती है—बैकुंठपुर इसका उदाहरण माना जाता है,आज भी राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा सुनाई देती है कि यदि कांग्रेस उस समय पूरी तरह एकजुट होती,तो परिणाम अलग भी हो सकते थे। हालांकि यह विश्लेषण राजनीतिक पर्यवेक्षकों की राय है और चुनावी परिणाम अनेक कारणों से प्रभावित होते हैं।
शिवपुर-चरचाः यहां मतदाता किसी का स्थायी वोट बैंक नहीं-शिवपुर-चरचा नगर पालिका की राजनीति को समझना आसान नहीं है, यहां के मतदाता समय-समय पर दोनों प्रमुख दलों को अवसर देते रहे हैं, अब तक के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो भाजपा और कांग्रेस—दोनों ने दो-दो बार नगर पालिका की सत्ता संभाली है, यानी यहां जनता ने किसी एक दल को स्थायी अधिकार नहीं दिया, यह भी सच है कि कांग्रेस के दूसरे कार्यकाल के दौरान राजनीतिक समीकरण बदले और भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की, इस घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि स्थानीय राजनीति में केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं होता, संगठन और जनविश्वास बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
सबसे पहले टिकट का रण,फिर चुनाव का रण-राजनीतिक जानकारों का कहना है कि स्थानीय निकाय चुनावों में असली मुकाबला मतदान वाले दिन नहीं,बल्कि टिकट घोषित होने के दिन शुरू हो जाता है,एक टिकट के लिए कई दावेदार होते हैं,टिकट मिलने पर उत्सव और टिकट कटने पर असंतोष—यह हर चुनाव की कहानी है, यदि कोई दल अपने असंतुष्ट नेताओं को समय रहते साथ नहीं रख पाया तो वही नेता चुनावी गणित बिगाड़ने का कारण भी बन सकते हैं।
जनता अब केवल वादे नहीं,हिसाब भी मांगेगी-इस बार मतदाता विकास का रिपोर्ट कार्ड भी देखेगा,नगर की सड़कें कैसी हैं? सफाई व्यवस्था में कितना सुधार हुआ? पेयजल की स्थिति क्या है? नगर पालिका की योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचा या नहीं? जनप्रतिनिधि जनता के बीच कितने सक्रिय रहे? इन सवालों के जवाब चुनावी सभाओं से नहीं,बल्कि जनता के अनुभव से तय होंगे।
निर्दलीय उम्मीदवार भी बदल सकते हैं खेल-स्थानीय निकाय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है, कई बार नाराज नेता निर्दलीय मैदान में उतरकर जीत-हार का अंतर तय कर देते हैं,इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों की कोशिश रहेगी कि टिकट वितरण के बाद असंतोष को कम से कम रखा जाए।
सियासत की असली परीक्षा अब शुरू- अगले चार महीने दोनों दलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे,भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की कोशिश करेगी,कांग्रेस स्थानीय मुद्दों,नगर पालिकाओं के कामकाज और सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने का प्रयास करेगी,लेकिन इन सबके बीच अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होगा।
बैकुंठपुर एवं शिवपुर-चरचा : नगर पंचायत से नगर पालिका बनने के बाद का चुनावी इतिहास
कोरिया जिले की बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा ऐसी नगरीय निकाय हैं, जिन्हें नगर पंचायत से नगर पालिका का दर्जा मिलने के बाद स्थानीय राजनीति का केंद्र माना जाने लगा, नगर पालिका बनने के बाद से दोनों निकायों का चुनावी इतिहास काफी दिलचस्प रहा है और समय-समय पर मतदाताओं ने अलग-अलग राजनीतिक संदेश दिए हैं, नगर पालिका बनने के बाद बैकुंठपुर के पहले अध्यक्ष स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता बने, स्थानीय स्तर पर उन्हें बैकुंठपुर को नगर पंचायत से नगर पालिका का दर्जा दिलाने का श्रेय भी दिया जाता है, वहीं शिवपुर-चरचा नगर पालिका के प्रथम अध्यक्ष राजेश सिंह निर्वाचित हुए, उस समय प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और दोनों निकायों में भाजपा ने जीत दर्ज की थी, दूसरे चुनाव में भी प्रदेश की सत्ता भाजपा के पास ही रही, लेकिन चुनावी नतीजों ने अलग तस्वीर पेश की, शिवपुर-चरचा में भाजपा अपनी सत्ता बचाने में सफल रही, जबकि बैकुंठपुर में भाजपा प्रत्याशी स्वर्गीय तीरथ प्रसाद गुप्ता को निर्दलीय प्रत्याशी शैलेश शिवहरे ने पराजित कर राजनीतिक समीकरण बदल दिए, तीसरे चुनाव में भी प्रदेश में भाजपा सरकार थी, इस बार शिवपुर-चरचा में अजीत लकड़ा ने जीत हासिल की, जबकि बैकुंठपुर में अशोक जायसवाल नगर पालिका अध्यक्ष बने। यानी दोनों निकायों में सत्ता का समीकरण फिर बदल गया और मतदाताओं ने नए नेतृत्व पर भरोसा जताया, चौथे चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद दोनों नगरपालिकाओं में कांग्रेस ने जीत दर्ज कर अपनी मजबूत वापसी की। हालांकि, इसके बाद की राजनीतिक परिस्थितियां कांग्रेस के लिए अनुकूल नहीं रहीं, बैकुंठपुर में आपसी अंतर्कलह और राजनीतिक खींचतान के कारण कांग्रेस को अपेक्षाकृत जल्द ही सत्ता से हाथ धोना पड़ा, जबकि शिवपुर-चरचा में भी लगभग दो वर्ष बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए और कांग्रेस की पकड़ कमजोर पड़ गई, नगर पालिका बनने के बाद के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा की जनता ने किसी एक दल को स्थायी जनादेश नहीं दिया है, यहां चुनावी परिणामों पर प्रदेश की सत्ता के साथ-साथ स्थानीय नेतृत्व, संगठनात्मक मजबूती, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और दलों की आंतरिक एकजुटता का भी महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल-उम्मीदवार कौन?
चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएंगे, कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न उम्मीदवार चयन का होगा, क्या पार्टी ऐसा चेहरा सामने लाएगी जिसे संगठन के सभी गुट स्वीकार करें? क्या टिकट वितरण के बाद असंतोष नहीं पनपेगा? क्या जिन नेताओं को टिकट नहीं मिलेगा, वे पूरे मन से अधिकृत उम्मीदवार के लिए काम करेंगे? यही वे सवाल हैं जिनके जवाब चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं, यदि कांग्रेस संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने में सफल रहती है तो मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है, लेकिन यदि पुराने मतभेद फिर सामने आए, तो विपक्ष को अतिरिक्त मेहनत करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ सकती।
भाजपा के सामने भी आसान नहीं है रास्ता
प्रदेश की सत्ता भाजपा के पास है, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाता विधानसभा या लोकसभा से अलग सोच रखता है, यहां चर्चा मुख्यमंत्री या राष्ट्रीय नेतृत्व की कम और नगर की सड़कों, सफाई व्यवस्था, पेयजल, नालियों, स्ट्रीट लाइट और स्थानीय विकास कार्यों की अधिक होती है, यदि जनता को लगता है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने अपेक्षाओं के अनुरूप काम किया है तो सत्ता विरोधी रुझान कमजोर पड़ सकता है। लेकिन यदि नगर की समस्याएं जस की तस रहीं, तो सत्ता पक्ष को भी कठिन सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
व्यंग्य की नजर से…
चुनाव आते ही कई नेता अचानक हर गली,हर मोहल्ले और हर चौपाल के पुराने परिचित बन जाते हैं, जिन रास्तों पर वर्षों तक उनकी गाडि़यां नहीं गुजरीं, वहां भी धूल उड़ने लगती है,जिन नागरिकों का फोन महीनों तक नहीं उठता,वे चुनावी मौसम में ‘सबसे सम्मानित मतदाता’ बन जाते हैं,नगर की टूटी सड़कें चुनावी भाषणों में ‘विकास की योजना’ बन जाती हैं,नालियां ‘प्रस्तावित कार्य’ कहलाने लगती हैं और अधूरे वादे फिर से नए संकल्पों के साथ मंच पर लौट आते हैं,लेकिन कोरिया का मतदाता अब पहले जैसा नहीं माना जाता, पिछले चुनावों में उसने कई बार यह दिखाया है कि वह केवल नारों पर नहीं,परिस्थितियों और अपने अनुभवों के आधार पर भी फैसला ले सकता है।
अब निगाहें चार महीनों पर…
बैकुंठपुर और शिवपुर-चरचा की चुनावी बिसात सज चुकी है,मोहरे अपनी-अपनी जगह लेने लगे हैं,रणनीतियां बन रही हैं, दावेदार सक्रिय हैं,राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है,अब देखना यह होगा कि इस बार जीत का रास्ता सत्ता की ताकत से निकलेगा,संगठन की मजबूती से, उम्मीदवार की लोकप्रियता से या फिर एक बार फिर किसी दल की अंदरूनी खींचतान पूरी बाजी पलट देगी,कोरिया की राजनीति का इतिहास एक बात जरूर कहता है…यहां चुनाव केवल मतों से नहीं,बल्कि भरोसे, संगठन और समय पर चली गई सही राजनीतिक चाल से जीते जाते हैं। अब जनता किसे अपना भरोसा सौंपेगी,इसका फैसला आने वाले चुनाव में होगा।
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