-संवाददाता-
अम्बिकापुर,09 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिस स्वास्थ्य विभाग ने हाल ही में निजी अस्पतालों को नर्सिंग होम एक्ट के नियमों का पालन करने की सख्त चेतावनी दी है,उसी विभाग की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि एनएच गोयल हॉस्पिटल आयुष्मान भारत योजना में पंजीकृत नहीं है। इसके बावजूद अस्पताल में कथित रूप से आयुष्मान हितग्राहियों का उपचार किए जाने और ग्रामीणों के आयुष्मान कार्ड का उपयोग होने के आरोप सामने आए हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि बिना अधिकृत पंजीयन के आयुष्मान योजना का लाभ लिया गया या मरीजों से राशि वसूली गई,तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि सार्वजनिक धन और गरीब मरीजों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला होगा। संभागीय संयुक्त संचालक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण डॉ. अनिल कुमार शुक्ला ने सीएमएचओ से जांच कराई। 6 जुलाई को प्राप्त रिपोर्ट में अस्पताल का आयुष्मान योजना में पंजीयन नहीं होने की जानकारी दी गई। अब पूरे मामले की विस्तृत जांच के निर्देश दिए गए हैं तथा जिला कलेक्टर को भी पत्र भेजा जा रहा है। विभाग का कहना है कि यदि आरोप सही पाए गए तो अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने सहित नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाएगी। मामले की शिकायत करने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ. डी.के. सोनी का दावा है कि बलरामपुर जिले के ग्राम कोदौरा सहित कई ग्रामीणों ने शिकायत की थी कि उन्हें मुफ्त इलाज का भरोसा देकर अस्पताल ले जाया गया, आयुष्मान कार्ड का उपयोग किया गया, लेकिन इलाज के बाद न मेडिकल रिपोर्ट दी गई और न ही कोई बिल उपलब्ध कराया गया। इन शिकायतों के आधार पर विभागीय जांच कराई गई।
सबसे बड़ा सवाल…अगर पंजीयन नहीं था तो सिस्टम सोता क्यों रहा?
इस पूरे प्रकरण ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि अस्पताल वास्तव में आयुष्मान योजना में पंजीकृत नहीं था,तो फिर वहां कथित रूप से आयुष्मान हितग्राहियों का इलाज कैसे होता रहा? क्या संबंधित विभागों ने कभी सत्यापन नहीं किया? क्या आयुष्मान योजना की निगरानी केवल कागजों तक सीमित है? और यदि मरीजों के कार्ड का दुरुपयोग हुआ है तो इसकी जिम्मेदारी केवल अस्पताल की होगी या निगरानी तंत्र की भी तय होगी? यदि जांच में ग्रामीणों के आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक अस्पताल का मामला नहीं रहेगा, बल्कि पूरे स्वास्थ्य प्रशासन की जवाबदेही का प्रश्न बन जाएगा।
सिर्फ अस्पताल नहीं,जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आए
जनहित की दृष्टि से अब जांच केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित अवधि में निरीक्षण किसने किया, किन अधिकारियों ने निगरानी की,और यदि अनियमितताएं थीं तो उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होना आवश्यक है।
जांच पूरी होने तक आरोप,लेकिन जवाब जरूरी
फिलहाल विभागीय जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है। अस्पताल का पक्ष इस समाचार के प्रकाशन तक प्राप्त नहीं हो सका है। अस्पताल की ओर से प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
घटती-घटना की टिप्पणी…
नियमों की किताब हाथ में लेकर विभाग निजी अस्पतालों को चेतावनी तो दे रहा है,लेकिन सवाल यह है कि जब कथित अनियमितताएं हो रही थीं तब निगरानी तंत्र कहां था? यदि बिना पंजीयन के कोई संस्थान आयुष्मान योजना से जुड़ी गतिविधियां करता रहा और विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी,तो यह केवल अस्पताल की नहीं, पूरे सिस्टम की विफलता है। यदि सरकार वास्तव में गरीबों के स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा करना चाहती है,तो केवल अस्पताल पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। यह भी जांचना होगा कि आखिर किसकी लापरवाही या संरक्षण में ऐसी स्थिति बनी। जनता को दिखावटी सख्ती नहीं, बल्कि ऐसी निष्पक्ष जांच चाहिए जिसमें अस्पताल के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सामने आए। तभी यह स्पष्ट होगा कि स्वास्थ्य व्यवस्था मरीजों के लिए काम कर रही है या फिर केवल कागजी नियमों के सहारे चल रही है।
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