बिलासपुर,01 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्थानीय स्वशासन और प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि लोकतंत्र में बहुमत कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह कानून और तय प्रक्रिया से ऊपर नहीं हो सकता। इसी के साथ हाई कोर्ट ने भिलाई नगर निगम के 32 पार्षदों की याचिका खारिज कर दी,जिसमें निगम कमिश्नर को हटाने के प्रस्ताव को लागू करने की मांग की गई थी। यह पूरा विवाद भिलाई नगर निगम के निर्वाचित पार्षदों और कमिश्नर के बीच प्रशासनिक और वित्तीय फैसलों को लेकर लंबे समय से चल रहे टकराव से जुड़ा है। पार्षदों का आरोप था कि कमिश्नर राजीव पांडेय बिना मेयर-इन-काउंसिल और सामान्य सभा की मंजूरी के कई वित्तीय निर्णय ले रहे थे और पारित प्रस्तावों को लागू नहीं किया जा रहा था। मामला तब और बढ़ गया जब 25 मार्च 2026 को नगर निगम की विशेष बजट बैठक बुलाई गई। इस बैठक में पार्षदों ने अचानक नगर निगम अधिनियम, 1956 की धारा 54(2) का हवाला देते हुए कमिश्नर को हटाने का प्रस्ताव पेश कर दिया। पार्षदों ने दावा किया कि इस प्रस्ताव को तीन-चौथाई बहुमत से पारित कर दिया गया। इसके बाद राज्य सरकार और जिला प्रशासन को पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग की गई, लेकिन जब कोई निर्णय नहीं हुआ तो मामला हाई कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि स्थानीय निकायों को संविधान के तहत स्वायत्तता प्राप्त है और जब निर्वाचित सदस्यों का भारी बहुमत किसी अधिकारी पर अविश्वास जताता है तो सरकार को उसे हटाना ही चाहिए। उनका कहना था कि जनप्रतिनिधियों की सामूहिक इच्छा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं राज्य सरकार की ओर से उप-महाधिवक्ता ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि नगर निगम की विशेष बैठक केवल बजट पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी।
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