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भव्य आयोजन,रामलीला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच बड़ा सवाल-क्या रामगढ़ सिर्फ महोत्सव तक सीमित रहेगा या बनेगा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र?

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अम्बिकापुर@रामगढ़ महोत्सव-2026ः 50 साल की परंपरा के बाद भी अधूरी है विरासत को पहचान दिलाने की कहानी…


-संवाददाता-
अम्बिकापुर,29 जून 2026 (घटती-घटना)। आषाढ़ मास के प्रथम दिवस पर सरगुजा की ऐतिहासिक धरोहर रामगढ़ में शुरू हुआ दो दिवसीय रामगढ़ महोत्सव-2026 एक बार फिर संस्कृति, इतिहास और साहित्य के संगम का गवाह बना। मंच सजा, कलाकारों ने प्रस्तुति दी, रामलीला ने दर्शकों को भाव-विभोर किया और नेताओं ने रामगढ़ की गौरवशाली पहचान को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के संकल्प दोहराए।
लेकिन इस भव्य आयोजन के
बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा है…

क्या रामगढ़ की पहचान केवल दो दिन के महोत्सव तक सीमित रह गई है? 50 वर्ष पूरे कर चुका रामगढ़ महोत्सव आज भी अपने मूल उद्देश्य को तलाश रहा है। जिस रामगढ़ को प्राचीन रंगमंच, पुरातात्विक धरोहर और साहित्यिक परंपरा का केंद्र बताया जाता है, वह आज भी पर्यटन सुविधाओं, बेहतर प्रचार-प्रसार और स्थायी विकास की राह देख रहा है।
इतिहास की संपदा,विकास की चुनौती
रामगढ़ केवल सरगुजा की नहीं बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां स्थित सीताबेंगरा गुफा को विश्व की प्राचीनतम रंगशालाओं में शामिल किया जाता है। जोगीमारा गुफा की ऐतिहासिकता, रामगढ़ पर्वत श्रृंखला और अन्य पुरातात्विक स्थल इस क्षेत्र को विशेष पहचान देते हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने वनवास काल में इस क्षेत्र में समय बिताया था। वहीं साहित्य जगत में भी रामगढ़ का नाम महाकवि कालिदास की रचना मेघदूतम् से जोड़ा जाता है। इतनी समृद्ध विरासत होने के बावजूद यह क्षेत्र अभी तक देश-विदेश के बड़े पर्यटन स्थलों की सूची में अपेक्षित स्थान नहीं बना पाया है।
पहले दिन संस्कृति का दिखा शानदार रंग : महोत्सव के पहले दिन नई दिल्ली से आए कलाकारों ने भव्य रामलीला का मंचन किया। भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों को प्रभावी अभिनय, आकर्षक वेशभूषा और संगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। दर्शकों ने कलाकारों की जमकर सराहना की। कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय उदयपुर की छात्राओं ने ‘जटायु मोक्ष’ पर आधारित नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की। छात्राओं के अभिनय और भावपूर्ण प्रस्तुति ने दर्शकों को भावुक कर दिया। कवि सम्मेलन में देशभक्ति, सामाजिक सरोकार, हास्य और व्यंग्य से जुड़ी कविताओं ने लोगों का मनोरंजन किया। स्थानीय कलाकारों ने सरगुजिहा लोकनृत्य, करमा और पारंपरिक गीतों से क्षेत्र की संस्कृति की झलक पेश की।
मंच से हुए बड़े दावे…
रामगढ़ महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि राज्य सरकार सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि रामगढ़ महोत्सव लोक संस्कृति, इतिहास, पुरातत्व और पर्यटन का संगम है तथा इसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने महोत्सव के 50 वर्ष पूरे होने पर बधाई देते हुए कहा कि रामगढ़ को पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। वहीं सांसद चिंतामणि महाराज ने रामगढ़ को भारत की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि सीताबेंगरा,जोगीमारा,राम-जानकी मंदिर और हाथीपोल जैसे स्थल विश्व पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह बना सकते हैं। लुंड्रा विधायक प्रबोध मिंज ने भी कहा कि रामगढ़ धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है।
लेकिन जमीनी हकीकत क्या कहती है?
सरकारी मंचों से हर वर्ष रामगढ़ की अंतरराष्ट्रीय पहचान की बात कही जाती है,लेकिन स्थानीय स्तर पर कई चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। पर्यटकों के लिए बेहतर सड़क सुविधा,नियमित प्रचार अभियान,गाइड व्यवस्था,स्वच्छता,पेयजल, सुरक्षा और ठहरने की सुविधाओं का विस्तार अभी भी जरूरी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि रामगढ़ को वास्तव में पर्यटन केंद्र बनाया जाए तो इससे क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। होटल, स्थानीय हस्तशिल्प,परिवहन और ग्रामीण पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है।
स्थानीय कलाकारों को मिला मंच, लेकिन स्थायी अवसर जरूरी
महोत्सव में स्थानीय कलाकारों को मंच देना सकारात्मक पहल है,लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इन कलाकारों को सालभर अवसर मिलेंगे? क्या सरगुजा की लोक कला को स्थायी पहचान दिलाने के लिए कोई बड़ा प्रयास होगा?
जनता की उम्मीद : महोत्सव से आगे बढ़े विकास की कहानी
रामगढ़ महोत्सव निश्चित रूप से सरगुजा की पहचान को मजबूत करता है,लेकिन अब जरूरत है कि यह आयोजन केवल उत्सव बनकर न रह जाए। जरूरत है कि रामगढ़ के लिए एक दीर्घकालिक पर्यटन योजना बने,जिसमें धरोहर संरक्षण,सुविधाओं का विस्तार और स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। रामगढ़ की पहचान इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, अब चुनौती यह है कि वर्तमान में भी उसे वही सम्मान और सुविधाएं मिलें।


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