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कोरिया@ बैकुंठपुर में कांग्रेस की सियासत गरम, दावेदारों की भीड़ में अशोक जायसवाल सबसे आगे?

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  • बैकुंठपुर में चुनाव से पहले ही सियासी तपिश, कांग्रेस में दावेदारों की भीड़, अशोक जायसवाल की सक्रियता चर्चा में
  • भूमिका : चुनाव दूर,लेकिन राजनीति अभी से तेज

कोरिया,13 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले की बैकुंठपुर विधानसभा सीट पर आगामी चुनाव में अभी लगभग तीन वर्ष का समय बाकी है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां जिस गति से बढ़ रही हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि चुनावी जमीन अभी से तैयार की जा रही है, खासतौर पर कांग्रेस पार्टी के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर चर्चा तेज हो चुकी है,राजनीतिक गलियारों, कार्यकर्ता बैठकों और आम चर्चाओं में एक ही सवाल गूंज रहा है, आखिर इस बार कांग्रेस किस चेहरे पर भरोसा जताएगी? यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि पिछले चुनाव में पार्टी को यहां करारी हार का सामना करना पड़ा था।
अशोक जायसवालः लगातार सक्रियता से बने केंद्र बिंदु
पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष और वर्तमान में जिला कांग्रेस कमेटी कोरिया के कोषाध्यक्ष अशोक जायसवाल इन दिनों बैकुंठपुर की राजनीति में सबसे ज्यादा सक्रिय चेहरा बनकर उभरे हैं,उनकी सक्रियता केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे लगातार,सामाजिक कार्यक्रमों में भाग ले रहे हैं, जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं, कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों से सीधे संवाद कर रहे हैं,राजनीतिक जानकार मानते हैं कि उनकी यह सक्रियता आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी का स्पष्ट संकेत है, कुछ लोग इसे ‘जल्दबाजी’ कह रहे हैं, तो वहीं अन्य इसे ‘रणनीतिक बढ़त’ के रूप में देख रहे हैं।
क्या मिला है अंदरूनी संकेत?
अशोक जायसवाल की बढ़ती सक्रियता को लेकर यह चर्चा भी जोरों पर है कि उन्हें पार्टी के भीतर से किसी प्रकार का सकारात्मक संकेत मिला हो सकता है, हालांकि इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन जिस तरह से वे लगातार हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में नजर आ रहे हैं, उससे यह कयास जरूर लगाए जा रहे हैं कि वे खुद को मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित करने में जुटे हैं।
दावेदारों की लंबी कतार, मुकाबला बहुस्तरीय
कांग्रेस में इस बार दावेदारों की संख्या कम नहीं है,अशोक जायसवाल के अलावा कई अन्य नेता भी टिकट की दौड़ में शामिल हैं, प्रमुख नाम इस प्रकार हैंः
योगेश शुक्ला : रणनीति और नेटवर्क की ताकत
योगेश शुक्ला को एक रणनीतिक रूप से मजबूत नेता माना जाता है, उनके पास पारिवारिक राजनीतिक संपर्क,संगठन में पकड़ और चुनावी रणनीति की समझ उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है।
वेदांती तिवारीः अनुभव का वजन
वेदांती तिवारी का राजनीतिक अनुभव उन्हें अन्य दावेदारों से अलग पहचान देता है, उन्होंने संगठन में लंबा समय बिताया है और चुनावी राजनीति का व्यावहारिक अनुभव भी हासिल किया है, उनकी यही विशेषता उन्हें गंभीर दावेदारों की सूची में बनाए रखती है।
बिहारी लाल राजवाड़े और संगीता राजवाड़ेः सामाजिक समीकरण का आधार
बिहारी लाल राजवाड़े और संगीता राजवाड़े की दावेदारी सामाजिक समीकरणों पर आधारित मानी जा रही है, क्षेत्र में जातीय और सामाजिक संतुलन को देखते हुए, इन दोनों नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, और पार्टी यदि सामाजिक समीकरण को प्राथमिकता देती है, तो इनकी दावेदारी मजबूत हो सकती है।
समीकरणों की जंगः संगठन बनाम सामाजिक आधार
बैकुंठपुर की राजनीति में इस बार मुकाबला केवल व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि अलग-अलग समीकरणों के बीच भी होगा, एक ओर संगठनात्मक मजबूती और रणनीति है,दूसरी ओर सामाजिक और जातीय संतुलन, ऐसे में पार्टी के लिए यह निर्णय आसान नहीं होगा कि किस आधार को प्राथमिकता दी जाए।
भाजपा से मुकाबले की तैयारी
कांग्रेस को केवल अपने अंदरूनी समीकरण ही नहीं सुलझाने हैं, बल्कि उसे सत्ताधारी भाजपा के मजबूत संगठन से भी मुकाबला करना है,भाजपा का मजबूत कैडर, संसाधनों की उपलब्धता और चुनावी अनुभव कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
राजनीतिक महत्वाकांक्षा और हकीकत
हर दावेदार की अपनी महत्वाकांक्षा है और सभी खुद को योग्य उम्मीदवार मानते हैं, लेकिन राजनीतिक हकीकत यह है कि टिकट केवल एक को मिलेगा और बाकी को उसी उम्मीदवार के समर्थन में खड़ा होना होगा, यहीं पर पार्टी की एकजुटता की असली परीक्षा होगी।
पिछली हार का सायाः कांग्रेस के लिए चेतावनी
बैकुंठपुर विधानसभा सीट पर पिछले चुनाव में कांग्रेस को जो हार मिली, उसे पार्टी के भीतर ‘ऐतिहासिक हार’ के रूप में देखा गया, इस हार के पीछे सबसे बड़ा कारण गुटबाजी को माना गया, जिसने संगठन को कमजोर किया,कार्यकर्ताओं को विभाजित किया और चुनावी रणनीति को प्रभावित किया,अब पार्टी इस अनुभव से सबक लेते हुए प्रत्याशी चयन में सावधानी बरतने की तैयारी में है।
प्रत्याशी चयन में बदलाव के संकेत
कांग्रेस के भीतर यह लगभग तय माना जा रहा है कि इस बार प्रत्याशी चयन में बदलाव देखने को मिल सकता है,पार्टी नेतृत्व इस बार ऐसे उम्मीदवार की तलाश में है जो, सभी गुटों को साथ लेकर चल सके, संगठन को मजबूत कर सके और जमीनी स्तर पर स्वीकार्य हो, इस वजह से पुराने समीकरणों को दरकिनार कर नए विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
गुटबाजी : सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अभी भी गुटबाजी ही बनी हुई है,यदि पार्टी इस समस्या को दूर नहीं कर पाती,तो मजबूत उम्मीदवार भी कमजोर साबित हो सकता है,और चुनावी परिणाम फिर प्रभावित हो सकते हैं,इसलिए दावेदारों के सामने भी यह चुनौती होगी कि वे,अपने समर्थकों को एकजुट रखें,और विरोधी गुटों को साथ लाने का प्रयास करें।
सक्रियता बनाम स्वीकार्यताः कौन पड़ेगा भारी?
अशोक जायसवाल की सक्रियता उन्हें फिलहाल बढ़त दिला रही है, लेकिन केवल सक्रियता ही पर्याप्त नहीं होगी,पार्टी यह भी देखेगी कि,किस उम्मीदवार की जनता में स्वीकार्यता अधिक है, कौन कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चल सकता है, और कौन चुनावी मैदान में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
जनसंपर्क की राजनीति : शुरुआती बढ़त का संकेत
अशोक जायसवाल का लगातार जनसंपर्क अभियान उन्हें फिलहाल ‘सबसे निश्चिंत दावेदार’ के रूप में पेश कर रहा है,वे हर कार्यक्रम में उपस्थित रह रहे हैं,लोगों से सीधे संवाद कर रहे हैं,और खुद को जनता के बीच स्थापित कर रहे हैं, हालांकि,यह भी कहा जा रहा है कि यह ‘जल्दबाजी’ है,लेकिन राजनीति में समय से पहले तैयारी करना कई बार फायदे का सौदा भी साबित होता है।
फैसला समय और रणनीति पर निर्भर
बैकुंठपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के लिए आगामी चुनाव केवल एक राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई साख को वापस पाने की लड़ाई भी होगा,दावेदार कई हैं, समीकरण जटिल हैं और चुनौतियां बड़ी हैं, ऐसे में पार्टी को एक ऐसा चेहरा चुनना होगा जो संगठन को एकजुट कर सके, जनता में विश्वास पैदा कर सके,और भाजपा को कड़ी टक्कर दे सके फिलहाल नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कांग्रेस किसे अपना ‘ट्रंप कार्ड’ बनाती है, क्योंकि बैकुंठपुर की सियासत में खेल अभी शुरू हुआ है,और असली मुकाबला अभी बाकी है।


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