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सूरजपुर@ पुल टूटा या व्यवस्था? गोबरी नदी पुल 7 महीने से टूटा पड़ा,समाधान अब भी फाइलों में—रपटा भी भूमिपूजन के इंतजार में अटका

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  • कोरिया–सूरजपुर सीमा पर डुमरिया–NH-43 से शिवप्रसादनगर मार्ग बाधित; 15 लाख स्वीकृत, टेंडर पूरा, फिर भी काम शुरू नहीं—बरसात से पहले संकट गहराया
  • कवायत कहां है?” गोबरी नदी पुल पर 7 महीने से ठप काम, फाइलों में ही विकास
  • गोबरी नदी पुल: 7 महीने से टूटा, सिस्टम “भूमिपूजन” में व्यस्त – जनता खुद बनाए रास्ता?
  • जुलाई–अगस्त 2025 की खबरों में उठे सवाल आज भी कायम

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,09 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया और सूरजपुर जिले की सीमा पर गोबरी) नदी पर बना पुल पिछले लगभग 7 महीनों से टूटा पड़ा है, यह पुल डुमरिया से राष्ट्रीय राजमार्ग 43 (एनएच-43) होते हुए शिवप्रसादनगर को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग था,जिसके टूटने से क्षेत्रीय आवागमन पूरी तरह प्रभावित हो गया है,हैरानी की बात यह है कि इस समस्या को लेकर पहले भी कई बार खबरें प्रकाशित हुईं,चेतावनियां दी गईं, प्रशासनिक निरीक्षण हुए और समाधान के आश्वासन दिए गए, लेकिन आज तक जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्य शुरू नहीं हो सका है,वर्तमान में स्थिति यह है कि न स्थायी पुल का निर्माण शुरू हुआ है और न ही अस्थायी रपटा पुल बन पाया है।
कोरिया और सूरजपुर जिले की सीमा पर गोबरी नदी पर बना पुल पिछले 7 महीनों से टूटा पड़ा है, लेकिन सवाल यह है कि इस पुल को बनाने की कवायत आखिर कहां है? शुरुआत में जब पुल टूटा था, तब इसे लेकर तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था और स्थायी समाधान की बातें कही गई थीं,स्थायी पुल को बजट में शामिल करने का दावा भी हुआ, लेकिन वह बजट कब जमीन पर उतरेगा,इसका आज तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं है,दूसरी ओर, तत्काल राहत के रूप में रपटा पुल बनाने की बात कही गई,जिसे 7 महीने बाद भी हकीकत में नहीं बदला जा सका,स्थिति की विडंबना यह है कि जिस रपटा पुल को कुछ ही हफ्तों में बन जाना चाहिए था, वह अब तक शुरू भी नहीं हो पाया है, शुरुआती दौर में स्थानीय ग्रामीणों ने खुद चंदा जुटाकर और श्रमदान कर इस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की, कुछ हद तक काम भी शुरू हुआ, लेकिन जैसे ही यह मुद्दा राजनीतिक दायरे में आया, मामला जनसहयोग से निकलकर प्रशासनिक फाइलों में उलझ गया,अब स्थिति यह है कि रपटा पुल निर्माण के लिए लगभग 15 लाख रुपये की स्वीकृति मिल चुकी है,टेंडर प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है, लेकिन काम अभी तक शुरू नहीं हुआ,सूत्रों के अनुसार ठेकेदार काम शुरू करने के लिए मंत्री और विधायक के भूमिपूजन का इंतजार कर रहा है। यानी जिस पुल पर रोजाना लोगों की जिंदगी दांव पर लगी है,उसका निर्माण कार्यक्रम तय होने पर निर्भर हो गया है,सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह रपटा पुल अब बन भी जाता है,तो क्या यह आने वाले 4 महीने बाद की बरसात झेल पाएगा? या फिर यह भी पहली तेज बारिश में बह जाएगा और फिर वही कहानी दोहराई जाएगी—नई स्वीकृति, नया टेंडर, और फिर इंतजार,आज हालात यह हैं कि लोग जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहे हैं, बच्चे स्कूल जाने के लिए खतरा उठा रहे हैं और मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं, ऐसे में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि जब एक अस्थायी रपटा पुल बनाने में 7 महीने लग रहे हैं,तो स्थायी पुल कब बनेगा? क्या यह सिर्फ घोषणाओं और फाइलों तक सीमित रहेगा या कभी जमीन पर उतरकर लोगों की समस्या का वास्तविक समाधान करेगा?
पूर्व में प्रकाशित खबरें: चेतावनी को नजरअंदाज किया गया- जुलाई 2025 में प्रकाशित पहली खबर में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे, उसमें यह उल्लेख किया गया था कि पुराने समय में बने पुल आज भी मजबूती से खड़े हैं, जबकि वर्तमान में बनने वाले निर्माण कार्य कुछ ही समय में जर्जर हो जाते हैं, इसके बाद 13 जुलाई 2025 को प्रकाशित खबर में गोबरी नदी पुल के क्षतिग्रस्त होने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था न किए जाने पर सवाल उठे, वहीं 3 अगस्त 2025 को प्रकाशित खबर में प्रशासनिक निर्देशों के बावजूद कार्य शुरू न होने की स्थिति को उजागर किया गया, इन खबरों में स्पष्ट रूप से यह चेतावनी दी गई थी कि यदि समय रहते कार्य नहीं हुआ, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है, आज 7 महीने बाद यह साफ हो गया है कि उन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
वर्तमान स्थिति: समस्या जस की तस- पुल टूटने के 7 महीने बाद भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है, पुल अब भी क्षतिग्रस्त है और उपयोग के योग्य नहीं है, वैकल्पिक मार्ग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है और अस्थायी व्यवस्था भी अपर्याप्त है, इस कारण से कोरिया और सूरजपुर जिले के बीच सीधा संपर्क प्रभावित हो गया है और लोगों को लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है।
डुमरिया–NH-43 मार्ग का महत्व और प्रभाव- यह पुल केवल एक सामान्य मार्ग नहीं था, बल्कि डुमरिया से राष्ट्रीय राजमार्ग 43 होते हुए शिवप्रसाद नगर तक जाने का प्रमुख संपर्क माध्यम था, पुल के टूटने से दो जिलों के बीच आवागमन प्रभावित हुआ है, व्यापार और परिवहन गतिविधियां बाधित हुई हैं, ग्रामीणों को अतिरिक्त समय और खर्च उठाना पड़ रहा है, इसका प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक है।
ग्रामीणों की स्थिति: रोज का संघर्ष- पुल टूटने के बाद स्थानीय लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। स्कूली बच्चे जोखिम उठाकर नदी पार कर रहे हैं, बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने में कठिनाई हो रही है और किसानों तथा मजदूरों के कार्य प्रभावित हो रहे हैं, ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या अब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है और इसका कोई स्थायी समाधान दिखाई नहीं दे रहा है।
हल्की बारिश में भी आवागमन बाधित- गोबरी नदी में जलस्तर बढ़ते ही आवागमन पूरी तरह रुक जाता है, हल्की बारिश में भी लोग फंस जाते हैं और उन्हें जोखिम उठाकर नदी पार करनी पड़ती है, यह स्थिति दुर्घटनाओं की संभावना को बढ़ा रही है और लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बनी हुई है।
रपटा पुल: स्वीकृति के बावजूद काम शुरू नहीं अस्थायी समाधान के रूप में रपटा पुल निर्माण के लिए लगभग 15 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई है, टेंडर प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है और ठेकेदार का चयन हो चुका है, इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है, बताया जा रहा है कि भूमिपूजन कार्यक्रम के बाद ही कार्य प्रारंभ किया जाएगा। यह स्थिति प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है।
व्यंग्य: काम से पहले कार्यक्रम जरूरी- पूरी स्थिति को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि विकास कार्यों की प्राथमिकता बदल गई है, यहां पुल टूटा हुआ है, लोग परेशान हैं, संसाधन उपलब्ध हैं फिर भी काम इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि कार्यक्रम तय नहीं हुआ है, यह स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या अब विकास कार्य भी केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं?
जनसहयोग से प्रयास, लेकिन अधूरा रह गया काम- पुल टूटने के बाद स्थानीय लोगों ने स्वयं रपटा पुल बनाने का प्रयास किया। उन्होंने चंदा एकत्र किया और श्रमदान के माध्यम से काम शुरू किया, लेकिन यह प्रयास अधूरा रह गया और कार्य आगे नहीं बढ़ सका, इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थानीय स्तर पर प्रयास होने के बावजूद समुचित समर्थन नहीं मिल पाया।
निरीक्षण और आश्वासन: जमीनी असर नहीं- इस दौरान कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों द्वारा स्थल निरीक्षण किया गया, हर बार समाधान का आश्वासन दिया गया, लेकिन वास्तविकता में कोई ठोस कार्य शुरू नहीं हुआ, यह स्थिति दर्शाती है कि निरीक्षण और आश्वासन के बावजूद क्रियान्वयन में कमी है।
प्रशासनिक स्थिति: प्रक्रिया बनाम परिणाम- इस पूरे मामले में प्रशासनिक प्रक्रिया और परिणाम के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है, निर्देश दिए गए, लेकिन पालन नहीं हुआ, फंड स्वीकृत हुआ, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ, टेंडर पूरा हुआ, लेकिन निर्माण नहीं हुआ, यह स्थिति प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है।
आगामी मानसून: बढ़ता संकट- आने वाले बरसात को लेकर स्थानीय लोगों में चिंता है, यदि जल्द ही रपटा पुल का निर्माण नहीं हुआ, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है, आवागमन पूरी तरह बाधित हो सकता है और लोगों को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
जनता की अपेक्षाएं और सवाल- स्थानीय नागरिकों की अपेक्षा है कि समस्या का जल्द समाधान किया जाए, वे यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की प्राथमिकताओं में यह समस्या शामिल है या नहीं।
चेतावनी से संकट तक की कहानी- गोबरी नदी पुल का मामला यह दर्शाता है कि समय पर उठाए गए सवालों और चेतावनियों को नजरअंदाज करने का परिणाम कितना गंभीर हो सकता है, आज 7 महीने बाद भी समस्या जस की तस है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समाधान की दिशा में अपेक्षित प्रयास नहीं किए गए, यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है और इसका प्रभाव व्यापक स्तर पर पड़ेगा।


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