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बैकुंठपुर,@ 52 गड्ढे, एक दिन और जेसीबी क्या यही है ‘जनभागीदारी’ का मॉडल?

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  • आवा पानी झोंकी’ पर उठे सवाल,मन की बात में सराहना, जमीनी हकीकत पर विवाद
  • प्रधानमंत्री की सराहना के बाद घिरा ‘आवा पानी झोंकी’ अभियान,डुमरिया की तस्वीर ने खोली पोल
  • जनभागीदारी या मशीनों का खेल? ‘आवा पानी झोंकी’ अभियान पर गंभीर सवाल
  • मन की बात से राष्ट्रीय मंच तक, अब विवादों में ‘आवा पानी झोंकी’ अभियान
  • सराहना के बीच सच्चाई पर सवाल, कोरिया का ‘आवा पानी झोंकी’ अभियान चर्चा में
  • क्या प्रधानमंत्री तक पहुंची अधूरी जानकारी? ‘आवा पानी झोंकी’ पर उठे बड़े सवाल
  • श्रेय की दौड़ या जनहित का अभियान? ‘आवा पानी झोंकी’ पर मचा बवाल

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,07 अप्रैल 2026(घटती-घटना)।
बैकुंठपुर स्थित कोरिया जिले में भूजल स्तर बढ़ाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा ‘आवा पानी झोंकी’ अभियान इन दिनों चर्चा के केंद्र में है, यह अभियान,जो किसानों की पांच प्रतिशत कृषि भूमि में सोखता गड्ढों के निर्माण के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा देने की अवधारणा पर आधारित बताया जा रहा है, हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर तब सुर्खियों में आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम मन की बात में इसका उल्लेख किया,प्रधानमंत्री ने इसे जनभागीदारी से संचालित एक सफल पहल बताया और कहा कि इससे जिले में भूजल स्तर में वृद्धि दर्ज की गई है। प्रधानमंत्री के इस उल्लेख के बाद यह अभियान न केवल राष्ट्र्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया,बल्कि जिले का प्रशासनिक अमला भी सक्रिय हो गया,सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म,सरकारी प्रचार माध्यमों और स्थानीय स्तर पर इसे एक मॉडल अभियान के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा,अधिकारियों ने इसे जनसहभागिता का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए इसकी सफलता की कहानी को व्यापक रूप से साझा करना शुरू कर दिया।
सराहना के बीच सच्चाई की पड़ताल जरूरी
एक ओर जहां ‘आवा पानी झोंकी’ अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर से उठ रहे सवाल इसकी वास्तविकता की जांच की मांग कर रहे हैं, यह मामला अब केवल एक अभियान तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी की वास्तविकता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है, अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाता है,क्या जांच होती है और क्या सच सामने आता है,फिलहाल,कोरिया जिले का यह अभियान प्रशंसा और विवाद दोनों के बीच खड़ा नजर आ रहा है।
अभियान की अवधारणा और प्रशासनिक दावे…
‘आवा पानी झोंकी’ अभियान की मूल अवधारणा यह बताई गई है कि किसान अपनी कुल कृषि भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण के लिए समर्पित करें और वहां सोखता गड्ढों का निर्माण करें, जिससे वर्षा जल का संचयन हो सके और भूजल स्तर में सुधार आए। प्रशासन का दावा है कि यह अभियान पूरी तरह जनभागीदारी पर आधारित है, जिसमें किसान स्वेच्छा से इस पहल में शामिल हो रहे हैं और प्रशासन केवल मार्गदर्शन एवं प्रेरणा देने की भूमिका निभा रहा है, अभियान की सफलता के दावे भी बड़े स्तर पर किए गए कहा गया कि हजारों की संख्या में गड्ढों का निर्माण हुआ है और इससे जल स्तर में सुधार के सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं,यही कारण रहा कि यह पहल प्रधानमंत्री के मंच तक पहुंची और उसे राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली।
ग्राम डुमरिया की तस्वीर ने बदली चर्चा की दिशा
हालांकि, इसी बीच बैकुंठपुर विकासखंड के ग्राम डुमरिया से सामने आई एक तस्वीर ने पूरे अभियान की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,इस तस्वीर में एक ही स्थान पर बड़ी संख्या में करीब 52 सोखता गड्ढे नजर आ रहे हैं, स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि ये सभी गड्ढे जेसीबी मशीन की मदद से एक ही दिन में खोदे गए हैं,ग्रामीणों के अनुसार, यह वही पांच प्रतिशत मॉडल के अंतर्गत बनाए गए गड्ढे हैं,जिनका उल्लेख प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में किया था, यदि यह दावा सही है,तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस अभियान को जनभागीदारी का उदाहरण बताया जा रहा है,वह वास्तव में मशीन आधारित कार्यों के जरिए पूरा किया जा रहा है।
जनभागीदारी बनाम मशीन आधारित कार्यः विरोधाभास की स्थिति
इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यही है कि क्या ‘आवा पानी झोंकी’ वास्तव में जनसहभागिता पर आधारित है या फिर इसे प्रशासनिक स्तर पर मशीनों के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है,यदि गड्ढों का निर्माण जेसीबी जैसी मशीनों से किया जा रहा है, तो यह स्पष्ट रूप से उस दावे के विपरीत है जिसमें इसे किसानों की स्वैच्छिक भागीदारी बताया गया है, जनभागीदारी का अर्थ होता है कि लोग स्वयं श्रमदान या अपनी पहल से कार्य करें, जबकि मशीनों का उपयोग इस अवधारणा को कमजोर करता है,ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस अभियान की वास्तविक तस्वीर को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है।
शासकीय भूमि पर निर्माण,उपयोगिता पर भी प्रश्न
डुमरिया में जहां ये गड्ढे बनाए गए हैं,वह भूमि शासकीय बताई जा रही है और उसका रकबा लगभग डेढ़ से दो एकड़ के बीच बताया गया है, स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इतनी बड़ी भूमि पर अलग-अलग गड्ढे खोदने के बजाय एक समुचित तालाब का निर्माण किया जाता, तो जल संरक्षण अधिक प्रभावी तरीके से हो सकता था,इसके अलावा,तालाब निर्माण से मछली पालन जैसे अतिरिक्त आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता था,जिससे पंचायत को आय का एक स्थायी स्रोत मिलता, इस दृष्टिकोण से भी वर्तमान मॉडल की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या शीर्ष स्तर तक पहुंची अधूरी या गलत जानकारी?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है, क्या अभियान की वास्तविक स्थिति शीर्ष स्तर तक सही रूप में पहुंचाई गई थी? यदि जमीनी हकीकत और प्रस्तुत किए गए दावों में अंतर है, तो यह संभावना भी जताई जा रही है कि उच्च स्तर पर अधूरी या भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की गई हो,प्रधानमंत्री द्वारा किसी पहल का उल्लेख होना अपने आप में बड़ी बात होती है, लेकिन यदि उस पहल की जमीनी सच्चाई अलग हो,तो यह न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाता है बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करता है।
श्रेय और पदोन्नति की होड़ का आरोप
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि इस अभियान को लेकर अधिकारियों के बीच श्रेय लेने और पदोन्नति की होड़ चल रही है,कुछ लोगों का मानना है कि इसी कारण इस अभियान को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया और उसकी वास्तविकता को नजरअंदाज किया गया,हालांकि,इन आरोपों की पुष्टि अभी तक आधिकारिक रूप से नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह मुद्दा सामने आया है,उसने प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता पर असर जरूर डाला है।
प्रशासन की चुप्पी और बढ़ती मांगें…
अब तक इस मामले में जिला प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है,वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग तेज होती जा रही है, लोगों का कहना है कि यदि अभियान वास्तव में सफल है,तो उसकी वास्तविक तस्वीर सामने लाई जाए और यदि कहीं गड़बड़ी है,तो जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
जल संरक्षण की आवश्यकता और सही मॉडल की तलाश
यह भी महत्वपूर्ण है कि जल संरक्षण जैसे गंभीर विषय पर किसी भी प्रकार की लापरवाही या गलत प्रस्तुति दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकती है, कोरिया जिला सहित पूरे क्षेत्र में भूजल स्तर में गिरावट एक वास्तविक समस्या है, जिसके समाधान के लिए ठोस और प्रभावी उपायों की आवश्यकता है, ‘आवा पानी झोंकी’ जैसे अभियान यदि सही तरीके से लागू किए जाएं, तो वे निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम दे सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि योजनाओं को वास्तविकता के आधार पर लागू किया जाए और उनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता बनाए रखी जाए।


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