
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,06 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से पहले ही शिक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। अधिवक्ता व अभिभावक संघ के अध्यक्ष धनंजय मिश्रा ने बयान जारी करते हुए कहा है कि जब एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें अभी तक पूरी तरह से छपकर उपलब्ध नहीं हुई हैं,तो ऐसे में स्कूलों को खोलने की जल्दबाजी समझ से परे है। उन्होंने कहा कि हर साल सत्र शुरू होते ही अभिभावकों को किताबों,कॉपियों और अन्य शैक्षणिक सामग्री की व्यवस्था करनी होती है,लेकिन इस बार प्रमुख पाठ्यपुस्तकों की ही कमी बनी हुई है। ऐसी स्थिति में पढ़ाई का सुचारू संचालन संभव नहीं हो पाएगा। मिश्रा ने आरोप लगाया कि बिना समुचित तैयारी के सत्र प्रारंभ करना छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। धनंजय मिश्रा ने यह भी कहा कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है,जहां पहले से ही संसाधनों की कमी रहती है। वहां किताबें समय पर नहीं पहुंचने से छात्रों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो सकती है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि निजी स्कूलों में वैकल्पिक किताबें थोपे जाने का खतरा बढ़ सकता है,जिससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। अभिभावक संघ के अध्यक्ष ने शासन और शिक्षा विभाग से मांग की है कि जब तक सभी कक्षाओं के लिए एनसीईआरटी की किताबें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो जातीं,तब तक स्कूलों के नियमित संचालन पर पुनर्विचार किया जाए। साथ ही उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए समयबद्ध योजना बनाई जाए,ताकि सत्र शुरू होते ही छात्रों को पूरी शैक्षणिक सामग्री मिल सके। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मुद्दे पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया,तो अभिभावक संघ आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होगा। उनका कहना है कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय में लापरवाही किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है और सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
अंबिकापुर में निजी स्कूलों की
किताब व्यवस्था पर लगे गंभीर आरोप
शहर में निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। पत्रकार दिलीप जायसवाल ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ‘अंबिकापुर के लुटेरे स्कूलों की लिस्ट देखिए,क्योंकि इन स्कूलों का रैकेट ऐसा है कि इनके द्वारा बच्चों को पढ़ाई जाने वाली किताबें कुछ चुनिंदा दुकानों में ही मिलती हैं,जैसे डॉक्टरों द्वारा लिखी दवाइयां उन्हीं के मेडिकल स्टोर में मिलती हैं।‘ उन्होंने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था के कारण अभिभावकों को मजबूरी में उन्हीं निर्धारित दुकानों से महंगी किताबें खरीदनी पड़ती हैं,जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है। श्री जायसवाल ने आगे कहा कि यह एक सुनियोजित तंत्र की तरह काम कर रहा है,जिसमें अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता। हालांकि,उन्होंने यह भी दावा किया कि ‘इन स्कूलों ने जिला प्रशासन और सरकार को खरीद लिया है ‘,लेकिन इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि या प्रमाण सामने नहीं आया है। इस पूरे मामले को लेकर अभिभावकों में भी नाराजगी देखी जा रही है। कई अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबंधन द्वारा एक ही दुकान से किताबें लेने का दबाव बनाया जाता है, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या अभिभावकों को राहत देने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।
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