- नियम-कायदों को दरकिनार कर कनिष्ठ को मिली बड़ी जिम्मेदारी…
- वरिष्ठ शिक्षकों को देना पड़ रहा आदेश पालन…‘हॉटलाइन’ से नियुक्ति के आरोप
- नियम ताक पर,कनिष्ठ को कमानःएमसीबी में शिक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
- वरिष्ठ दरकिनार,कनिष्ठ को अधिकारः एमसीबी शिक्षा विभाग में मचा बवाल
- ‘हॉटलाइन’ से पद या नियमों का खेल? एमसीबी में शिक्षक बना बड़ा अधिकारी
- जहां व्याख्याता पीछे और शिक्षक आगेः एमसीबी शिक्षा विभाग में अनोखी व्यवस्था
- एमसीबी में अजीब सुशासनः उच्च वर्ग शिक्षक देगा प्राचार्य को आदेश!
- पद छोटा, जिम्मेदारी बड़ीः एमसीबी में शिक्षा व्यवस्था बनी सवालों के घेरे में
-विशेष रिपोर्ट-
एमसीबी,05 अप्रैल 2026(घटती-घटना)। एमसीबी जिले में शिक्षा विभाग से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है,जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, नियमों की पारदर्शिता और ‘सुशासन’ के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, आरोप है कि जिले में नियम-कायदों को दरकिनार करते हुए एक उच्च वर्ग शिक्षक को शिक्षा विभाग का दूसरा सबसे बड़ा अधिकारी बना दिया गया है, जबकि यह पद सामान्यतः व्याख्याता या प्राचार्य कैडर के लिए निर्धारित माना जाता है,इस निर्णय के बाद जिले के प्राचार्यों और व्याख्याताओं में व्यापक आक्रोश देखा जा रहा है, शिक्षकों का कहना है कि अब उन्हें अपने से कनिष्ठ श्रेणी के शिक्षक के आदेशों का पालन करना पड़ रहा है, जो न केवल सेवा नियमों के खिलाफ है बल्कि उनके आत्मसम्मान और कार्यप्रणाली पर भी असर डाल रहा है।
एमसीबी जिले में शिक्षा विभाग से जुड़ा 22 मार्च 2026 को जारी एक आदेश अब बड़े प्रशासनिक विवाद का केंद्र बन गया है, कलेक्टर एवं जिला मिशन संचालक,समग्र शिक्षा कार्यालय से जारी इस आदेश में कार्य विभाजन इस प्रकार किया गया है, जिससे जिले के प्राचार्यों और व्याख्याताओं में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है, आदेश के अनुसार गौरव कुमार त्रिपाठी (सहायक परियोजना समन्वयक -एपीसी) को कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और शैक्षणिक जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं, जो सामान्यतः वरिष्ठ कैडर—प्राचार्य या व्याख्याता—के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, इस आदेश में जिला शिक्षा अधिकारी सह जिला परियोजना अधिकारी की निगरानी में कार्य करते हुए गौरव कुमार त्रिपाठी को परियोजना संचालन, मॉनिटरिंग,शैक्षणिक गतिविधियों के क्रियान्वयन, दस्तावेजीकरण और विभिन्न योजनाओं के संचालन जैसे अहम कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही जितेंद्र कुमार (प्राचार्य) और अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी निर्धारित की गई है, लेकिन कार्यों की प्रकृति और नियंत्रण की स्थिति को लेकर विवाद खड़ा हो गया है, शिक्षकों का कहना है कि इस आदेश के बाद स्थिति ऐसी बन गई है कि उन्हें अपने से कनिष्ठ श्रेणी के अधिकारी से निर्देश लेना पड़ रहा है, जो सेवा नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था के विपरीत है, आदेश में जिम्मेदारियों का जो विभाजन किया गया है,उससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि पदानुक्रम की अनदेखी कर एक विशेष व्यक्ति को प्रभावी भूमिका में स्थापित किया गया है, अब यह मामला केवल एक आदेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा विभाग की पारदर्शिता,नियमों के पालन और प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
क्यों भड़का आक्रोश? ‘कनिष्ठ देगा आदेश’
जिले के प्राचार्य और व्याख्याताओं का कहना है कि इस आदेश के बाद उन्हें अपने से कनिष्ठ श्रेणी के अधिकारी से निर्देश लेना पड़ रहा है, एक व्याख्याता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा यह सेवा नियमों के खिलाफ है, जिस पद के लिए वर्षों का अनुभव और वरिष्ठता चाहिए, वहां एक उच्च वर्ग शिक्षक को बैठा दिया गया है, शिक्षकों का यह भी कहना है कि इससे न केवल उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंची है, बल्कि कार्यप्रणाली भी प्रभावित हो रही है।
कैसे हुआ पूरा घटनाक्रम? ‘धीरे-धीरे बना प्रभाव’
सूत्रों के अनुसार, यह नियुक्ति अचानक नहीं हुई, बताया जा रहा है कि संबंधित शिक्षक पहले जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में छोटे कार्यों में सहयोग के नाम पर नियमित रूप से उपस्थित रहने लगे, धीरे-धीरे उनकी सक्रियता बढ़ी और फिर उन्हें जिले के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण पद पर स्थापित कर दिया गया, यह पूरा घटनाक्रम कई शिक्षकों को ‘पूर्व नियोजित रणनीति’ का हिस्सा प्रतीत हो रहा है।
‘हॉटलाइन कॉल’ और राजनीतिक दबाव के आरोप-
मामले में सबसे गंभीर आरोप यह सामने आया है कि इस नियुक्ति के पीछे राजधानी से आए एक ‘हॉटलाइन कॉल’ का प्रभाव रहा है, आक्रोशित व्याख्याताओं का दावा है कि संबंधित शिक्षक को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते नियमों को शिथिल कर यह आदेश जारी किया गया, हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि इसमें सच्चाई है, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
कलेक्टर की भूमिका पर भी उठे सवाल
जिला कलेक्टर,जिन्हें आमतौर पर सख्त और नियमों का पालन करने वाला अधिकारी माना जाता है, इस आदेश के बाद सवालों के घेरे में हैं,शिक्षकों का कहना है कि या तो उन्हें पूरी जानकारी नहीं दी गई,या फिर किसी दबाव में यह निर्णय लिया गया,अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन इस विवाद पर क्या रुख अपनाता है।
अन्य पदों पर भी ‘कब्जे’ के आरोप
शिक्षकों का आरोप है कि यह कोई एकल मामला नहीं है,जिले में कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर भी उच्च वर्ग शिक्षकों को बैठाया गया है,जिससे पूरी व्यवस्था असंतुलित हो गई है, स्थिति यह बन गई है कि प्राचार्य, व्याख्याता,वरिष्ठ शिक्षक सभी को कनिष्ठ श्रेणी के कर्मचारियों के निर्देशों का पालन करना पड़ रहा है।
युक्तियुक्तकरण से प्रभावित शिक्षकों में भी असंतोष
इस विवाद का असर उन शिक्षकों पर भी पड़ा है, जिन्हें युक्तियुक्तकरण के तहत दूरस्थ क्षेत्रों में भेजा गया है,उनका कहना है कि यदि ‘जुगाड़ और पहुंच’ के आधार पर पद और पोस्टिंग मिल रही है, तो उन्हें भी समान अवसर मिलना चाहिए,अब उनके बीच यह मांग उठ रही है कि उन्हें भी घर के आसपास पदस्थ किया जाए या फिर पूरे सिस्टम को पारदर्शी बनाया जाए।
सबसे बड़ा सवालः नियम या प्रभाव?
इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या प्रशासनिक नियम अब केवल कागज़ों तक सीमित रह गए हैं? यदि वरिष्ठता और योग्यता को दरकिनार कर नियुक्तियां होंगी, तो शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता प्रभावित होगी,अधिकारियों का मनोबल गिरेगा और सिस्टम में अव्यवस्था बढ़ेगी
व्यवस्था की साख दांव पर
एमसीबी जिले का यह मामला अब केवल एक आदेश का विवाद नहीं रह गया है,बल्कि यह शिक्षा विभाग की विश्वसनीयता और प्रशासनिक पारदर्शिता की परीक्षा बन चुका है, अब देखना यह होगा कि, क्या इस आदेश की समीक्षा होगी? क्या नियमों के अनुसार सुधार किया जाएगा? या फिर एक व्यक्ति के लिए अलग व्यवस्था जारी रहेगी?
अंतिम कटाक्ष
जहां वरिष्ठ खड़े हैं लाइन में… और कनिष्ठ बैठा है कुर्सी पर… वहां सवाल सिर्फ पद का नहीं, पूरी व्यवस्था का होता है।
डिस्क्लेमर
इस समाचार में उल्लिखित आरोप संबंधित शिक्षकों एवं सूत्रों के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं, आधिकारिक पुष्टि प्राप्त नहीं हो सकी है, संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
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