


- 2023: जब नहर की जमीन पर निर्माण को बताया गया अतिक्रमण
- दस्तावेजों में स्पष्ट था मामला,फिर भी कार्रवाई क्यों अटकी?
- हाई कोर्ट तक पहुंचा विवाद, आदेश के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई
- 2026: अचानक बदली सरकारी राय, जारी हुआ अनापत्ति प्रमाण पत्र
- फाइलों का यू-टर्न : एक ही मामले में चार अलग-अलग फैसले
- मीडिया के खुलासे के बाद बढ़ा दबाव,प्रशासन आया बैकफुट पर
- न्यूज़ का असर: जल संसाधन विभाग ने खुद रद्द किया NOC
- ‘अपरिहार्य कारणों’ का हवाला, लेकिन असली वजह अब भी साफ नहीं
- फिर खड़ा हुआ सवाल—अतिक्रमण है या वैध निर्माण?
- प्रशासनिक विश्वसनीयता पर संकट,जनता में बढ़ा अविश्वास
- स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज,जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग
- राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक लापरवाही—क्या है असली कारण?
- अब आगे क्या: कार्रवाई होगी या फिर फाइलों में दबेगा मामला?
- नहर विवाद बना सिस्टम की परीक्षा,जवाब का इंतजार जारी
-रवि सिंह-
कोरिया, 03 अप्रैल 2026(घटती-घटना)। कोरिया जिले के भांडी क्षेत्र में नहर किनारे निर्माण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल एक स्थानीय जमीन का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक निर्णयों, विभागीय समन्वय, राजनीतिक प्रभाव और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल बनकर सामने आया है, तीन वर्षों में इस मामले ने जिस तरह करवट बदली—अतिक्रमण से वैधता और फिर वैधता से पुनः निरस्तीकरण तक—उसने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
मामले की शुरुआतः2023 में ‘अतिक्रमण’ की पुष्टि
वर्ष 2023 में ग्राम भांडी स्थित नहर किनारे किए गए निर्माण को लेकर स्थानीय स्तर पर शिकायतें सामने आईं, जल संसाधन विभाग और राजस्व विभाग की जांच में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि संबंधित भूमि नहर की है और उस पर किया गया निर्माण अतिक्रमण की श्रेणी में आता है, विभागीय दस्तावेजों और रिपोर्टों में भी इसे अवैध निर्माण माना गया, प्रशासन ने प्रारंभिक स्तर पर अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी, इस दौरान यह मामला केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया।
फाइलों का ‘यू-टर्न’ःअतिक्रमण से अनापत्ति तक
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला पहलू फाइलों का ‘यू-टर्न’ रहा, एक ही मामले में पहले अतिक्रमण की पुष्टि, फिर हटाने की सिफारिश, उसके बाद अनापत्ति जारी और अब पुनः निरस्तीकरण, इस तरह के बदलाव ने प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मीडिया में खुलासा और बढ़ता दबाव
लगातार खबरों के माध्यम से इस पूरे प्रकरण को सामने लाया गया, नहर पर निर्माण की तस्वीरें, विभागीय रिपोर्टों के विरोधाभास, कोर्ट के आदेश के बावजूद कार्रवाई न होना,इन सभी तथ्यों ने जनता के बीच चर्चा को और तेज कर दिया, मीडिया रिपोर्ट्स के बाद प्रशासन पर जवाब देने का दबाव बढ़ा।
न्यूज़ का असर : विभाग ने खुद रद्द किया एनओसी
आखिरकार 23 मार्च 2026 को जल संसाधन विभाग ने बड़ा निर्णय लेते हुए अपने ही जारी किए गए अनापत्ति प्रमाण-पत्र को निरस्त कर दिया, दस्तावेज़ में स्पष्ट उल्लेख है कि 6 फरवरी 2026 को जारी NOC को अपरिहार्य कारणों से रद्द किया जा रहा है,यह निर्णय सीधे तौर पर यह संकेत देता है कि पहले लिया गया फैसला या तो त्रुटिपूर्ण था या फिर परिस्थितियों के दबाव में लिया गया था।
अब फिर वही सवालःआखिर सच क्या है?
एनओसी निरस्त होने के बाद मामला फिर शुरुआती स्थिति में पहुंच गया है, अब सवाल यह है कि क्या निर्माण वास्तव में अतिक्रमण है? यदि हां, तो अब तक हटाया क्यों नहीं गया? और यदि नहीं, तो पहले अतिक्रमण क्यों बताया गया? इन सवालों के जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं हैं।
प्रशासनिक विश्वसनीयता पर बड़ा असर
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई है, जब एक ही मामले में बार-बार निर्णय बदलते हैं, तो यह संदेश जाता है कि निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है,जिम्मेदारी तय नहीं है और बाहरी प्रभाव संभव है, विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में स्पष्ट नीति और जवाबदेही आवश्यक है।
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाःभरोसा डगमगाया
स्थानीय लोगों में इस मामले को लेकर असंतोष और भ्रम की स्थिति है, लोगों का कहना है कि यदि अतिक्रमण था,तो हटाया जाना चाहिए था,यदि वैध था,तो शुरुआत में कार्रवाई क्यों हुई और यदि गलती हुई, तो जिम्मेदार कौन है, कुछ लोगों ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों से गलत संदेश जाता है और अन्य अतिक्रमणकारियों को बढ़ावा मिल सकता है।
कानूनी स्थितिः आगे की राह क्या?
अब जब एनओसी निरस्त हो चुका है,तो प्रशासन के सामने स्पष्ट विकल्प है, अतिक्रमण की पुष्टि कर कार्रवाई करना, न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित करना, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराना यदि ऐसा नहीं हुआ, तो मामला फिर न्यायालय की शरण में जा सकता है।
जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?
सबसे अहम सवाल यही है कि इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदार कौन है? क्या गलत रिपोर्ट तैयार की गई? क्या दबाव में निर्णय लिया गया? या फिर प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही हुई? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह मामला अधूरा ही रहेगा।
सिस्टम की परीक्षा बना नहर विवाद
कोरिया का यह नहर अतिक्रमण मामला अब एक मिसाल बन चुका है जहां एक साधारण जमीन विवाद ने प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया, तीन साल में बदलते फैसलों ने यह दिखा दिया कि, पारदर्शिता की कमी कितनी खतरनाक हो सकती है, और जवाबदेही के बिना सिस्टम कितना कमजोर पड़ जाता है, अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है—क्या सच सामने आएगा, या यह मामला फिर फाइलों में दब जाएगा?
जमीन,दस्तावेज और विवाद की गहराई…
नहर की जमीन पर निर्माण होने के कारण यह मामला संवेदनशील था, नहर भूमि सामान्यतः सार्वजनिक उपयोग और जल प्रवाह के लिए आरक्षित होती है, ऐसे में उस पर स्थायी निर्माण को लेकर नियम सख्त होते हैं, राजस्व अभिलेखों और विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज स्थिति के अनुसार, जिस भूमि पर निर्माण हुआ, वह जल संसाधन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है, यहीं से विवाद गहराया—एक ओर विभागीय रिपोर्ट अतिक्रमण बता रही थी, दूसरी ओर निर्माण पक्ष अपनी वैधता के दस्तावेज प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा था।
मामला पहुंचा न्यायालयःआदेश भी जारी
जैसे-जैसे विवाद बढ़ा, मामला न्यायालय तक पहुंच गया, हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के बाद अतिक्रमण हटाने को लेकर आदेश जारी हुआ,न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि नहर की भूमि पर अवैध निर्माण है,तो उसे हटाया जाना चाहिए,इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई। प्रशासनिक फाइलों में नोटिंग,पत्राचार और रिपोर्ट का सिलसिला चलता रहा,लेकिन अतिक्रमण हटाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया गया।
प्रशासनिक सुस्ती या दबाव? कार्रवाई क्यों रुकी
यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि जब न्यायालय का आदेश भी आ चुका था, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? सूत्रों के अनुसार,विभागों के बीच समन्वय की कमी, जिम्मेदारी तय न होना और संभावित राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं,फाइलों में लगातार बदलाव और अलग-अलग रिपोर्टों ने भी स्थिति को उलझा दिया।
2026 में अचानक बदला रुखः‘अनापत्ति’ का खेल
वर्ष 2026 की शुरुआत में इस मामले में अचानक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जल संसाधन विभाग द्वारा संबंधित निर्माण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया, यह वही निर्माण था जिसे 2023 में अतिक्रमण बताया गया था, इस फैसले ने पूरे मामले को विवादित बना दिया,सवाल उठने लगे कि क्या जमीन की स्थिति बदल गई? क्या नए दस्तावेज सामने आए? या फिर विभागीय स्तर पर कोई दबाव काम कर रहा था?
राजनीतिक और सामाजिक पहलू
मामले में राजनीतिक एंगल से भी इनकार नहीं किया जा रहा है, अलग-अलग समय पर निर्णय बदलना,फाइलों का रुख बदलना,कार्रवाई का टलना इन सबने यह संकेत दिया है कि मामला केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव से भी जुड़ा हो सकता है।
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