
- बैंक के उपर बार,मंदिर के पास ‘प्रीमियम’ इंतजाम,बैकुंठपुर में विकास का नया मॉडल!
- पैसा जमा करो,पैग उठाओ : बैकुंठपुर में अनोखी ‘वन स्टॉप सुविधा’
- स्कूल,मंदिर और बैंक के बीच वाइन शॉप, किसने बनाई ये ‘परफेक्ट लोकेशन’?
- बैकुंठपुर में विकास या व्यंग्य,जहां बैंक के नीचे बिक रहा ‘नशा’
- धर्म,शिक्षा और शराब का संगम,प्रशासन ने रचा अनोखा ‘मॉडल’
- मंदिर 200 मीटर,स्कूल पास में,फिर कैसे मिली शराब दुकान को मंजूरी?
- लोकेशन या ‘लापरवाही’? बैकुंठपुर में शराब दुकान पर उठे सवाल
- सरकारी दफ्तरों के बीच ‘प्रीमियम नशा’—प्रशासन की चुप्पी क्यों?
- नियमों से इतर लोकेशन? बैकुंठपुर में प्रीमियम वाइन शॉप विवाद में
- लोकेशन चयन पर पारदर्शिता की कमी, प्रशासन पर सवाल
-रवि सिंह-
कोरिया,03 अप्रैल 2026(घटती-घटना)। बैकुंठपुर प्रीमियम शराब दुकान पर व्यंग्यात्मक प्रस्तुति ऊपर बोतल चमके ब्रांडेड, नीचे नोटों की बरसात, बैंक से निकले मेहनत का पैसा, शाम होते ही हो जाए साफ…सिस्टम ऐसा सेट हुआ है,जनता देखे बस तमाशा,दिन में बैंक की लाइन लंबी, रात में ठेके पर भाषा…कोरिया जिले के बैकुंठपुर में विकास की एक नई परिभाषा सामने आई है, यहां अब आम जनता को अलग-अलग जगह भटकने की जरूरत नहीं—पैसा भी जमा करिए और उसी के नीचे से ‘प्रीमियम’ बोतल भी ले जाइए, जी हां, यूको बैंक के नीचे संचालित हो रही प्रीमियम वाइन शॉप ने वन स्टॉप सर्विस का ऐसा मॉडल पेश किया है,जो शायद नीति आयोग को भी प्रेरित कर दे।
आकर्षण के लिए फुल गुब्बारों से सजा प्रीमियम दुकान
शराब प्रेमियों को आकर्षित करने के लिए भी प्रीमियम दुकान में व्यवस्था की गई है,यहां फूल गुब्बारों से मुख्य सीढि़यों को सजाया गया है,मदिरा प्रेमियों को आते ही एक बेहतर एहसास हो,उन्हें स्वागत का भाव समझ में आए ऐसी पूरी कोशिश की गई है,अब समझने वाली यह बात है कि शराब दुकान के आकर्षण के लिए सजावट की क्या जरूरत,जहां इसका सेवन ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है वहां इसकी बिक्री स्थल पर स्वागत बोर्ड समझ से परे है।
चारों ओर सरकारी दफ्तर,बीच में ‘मनोरंजन केंद्र’
अगर आप सोच रहे हैं कि यह दुकान किसी सुनसान जगह पर होगी,तो आप गलत हैं,इसके आसपास ग्रामीण बैंक,पशु चिकित्सालय और समाज कल्याण विभाग का कार्यालय मौजूद है, यानि अगर कोई व्यक्ति बैंक का काम निपटाकर बाहर निकले और उसे अचानक तनाव महसूस हो,तो समाधान कुछ ही कदम दूर है,समाज कल्याण विभाग भी पास में है,शायद यह मान लिया गया हो कि कल्याण का दायरा अब थोड़ा व्यापक हो चुका है।
धर्म और ‘ड्रिंक’ का अद्भुत संगम
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि विप्र समाज के आराध्य भगवान परशुराम के नाम पर बना चौक भी पास ही स्थित है, और अगर श्रद्धालु वहां से आगे बढ़ें, तो करीब 200 मीटर की दूरी पर भगवान भोलेनाथ का मंदिर भी है, अब यह तो आस्था का विषय है कि कोई पहले मंदिर जाए या पहले प्रीमियम दुकान—या फिर दोनों का संतुलन बनाकर चले।
स्कूल के पास ‘व्यावहारिक शिक्षा’ का नया मॉडल
इस वाइन शॉप से थोड़ी दूरी पर एक प्राथमिक स्कूल भी संचालित है, बच्चे अब किताबों में सिर्फ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पढ़ेंगे ही नहीं, बल्कि उसका व्यावहारिक प्रदर्शन भी देख सकेंगे, शिक्षा का यह नया मॉडल शायद नई शिक्षा नीति का अगला अध्याय बन सकता है जहां सिद्धांत और व्यवहार का संतुलन सिखाया जाएगा।
लोकेशन चयनःविज्ञान, कला या ‘चमत्कार’?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस स्थान का चयन कैसे किया गया, क्या कोई विशेष सर्वे हुआ? क्या किसी समिति ने गहन अध्ययन किया? या फिर यह सब संयोग से हो गया? क्योंकि इतनी सटीक लोकेशन चुनना अपने आप में एक कला है—जहां बैंक, मंदिर, स्कूल और सरकारी दफ्तर—ऑल इन वन फ्रेम में आ जाएं।
नियमों की किताबःपढ़ी गई या सीधे बंद कर दी गई?
सामान्यतः शराब दुकानों के लिए कुछ दिशा-निर्देश होते हैं—जैसे स्कूल और धार्मिक स्थलों से दूरी बनाए रखना, लेकिन बैकुंठपुर के इस मामले में ऐसा लगता है कि या तो नियमों की किताब किसी ने पढ़ी ही नहीं, या फिर पढ़कर इग्नोर कर दिया गया, अब यह तय करना मुश्किल है कि यह लापरवाही है या फिर अत्यधिक आत्मविश्वास।
प्रशासन की चुप्पीःरणनीति या असमंजस?
इस पूरे मामले में प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, चुप्पी कभी-कभी बहुत कुछ कह देती है या तो जवाब नहीं है, या जवाब देने की जरूरत नहीं समझी जा रही, स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सब कुछ नियमों के तहत हुआ है, तो प्रशासन को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए।
स्थानीय जनता का आक्रोशः‘प्रीमियम’ विरोध की तैयारी-
क्षेत्र के लोगों में इस फैसले को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है, लोगों का कहना है कि यह न केवल सामाजिक दृष्टि से गलत है, बल्कि आने वाली पीढि़यों पर भी इसका असर पड़ेगा, कुछ लोगों ने इसे संवेदनहीन निर्णय बताया है, तो कुछ इसे प्रशासनिक विफलता मान रहे हैं।
व्यंग्य के पीछे छिपा गंभीर सवाल
अगर व्यंग्य को थोड़ी देर के लिए अलग रखें, तो यह मामला वास्तव में गंभीर है, क्या नियमों का पालन किया गया? क्या स्थानीय लोगों की राय ली गई? क्या संवेदनशील स्थानों का ध्यान रखा गया? ये सवाल केवल बैकुंठपुर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं।
विकास की दिशा या निर्णय की भूल?-
आज विकास शब्द का इस्तेमाल हर फैसले के लिए किया जाता है, लेकिन क्या विकास का मतलब यह है कि सुविधा के नाम पर हर चीज कहीं भी स्थापित कर दी जाए? या फिर विकास का मतलब संतुलन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भी होता है?
जवाब जरूरी है
बैकुंठपुर का यह मामला अब केवल एक वाइन शॉप का मुद्दा नहीं रह गया है, यह प्रशासनिक पारदर्शिता, नियमों के पालन और सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल बन चुका है, अब जरूरत है कि, प्रशासन स्पष्ट रूप से स्थिति बताए, यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई करे, और भविष्य में इस तरह के निर्णय लेते समय स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान रखा जाए, क्योंकि आखिरकार, प्रीमियम शब्द केवल बोतल पर अच्छा लगता है—निर्णयों पर नहीं।
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